RBSE Class 10th – हिन्दी (Hindi) – Blueprint 2025-26 with Solved Model Paper

RBSE 10th Hindi Model Paper 2026 (Solved & Explained)
Under The Esteemed Guidance of
Shri Susheel Kumar Sharma (Principal)
📚 BHERU DAS 📚
Lecturer, Hindi Literature
gsssjethantri.in

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान

नमूना प्रश्न-पत्र (Model Paper) 2026

विषयः – हिन्दी (कक्षा – 10वीं)

⏳ समयः 3 घण्टे 15 मिनट 📝 पूर्णाङ्कः 80

1. उद्देश्य हेतु अंकभार (Weightage by Objective)

क्र.स. उद्देश्य अंकभार प्रतिशत
1.ज्ञान1721.25
2.अवबोध3240.00
3.ज्ञानोपयोग1316.25
4.कौशल1316.25
5.विश्लेषण56.25
योग80100

2. प्रश्नों के प्रकार अनुसार अंकभार (Weightage by Question Type)

क्र.स. प्रश्नों का प्रकार प्रश्नों की संख्या अंक प्रतिप्रश्न कुल अंक प्रतिशत (अंको का) प्रतिशत (प्रश्नों का) संभावित समय
1.बहुविकल्पात्मक1811822.534.6125
2.रिक्तस्थान061067.511.5410
3.अतिलघुत्तरात्मक1211215.023.0840
4.लघुत्तरात्मक0921822.517.3145
5.दीर्घउत्तरीय0431215.07.6940
6.निबंधात्मक031×6=6
2×4=8
1417.55.7735
योग5280100100195 मिनट

3. विषय वस्तु का अंकभार (Content Weightage)

संकेत (Key): MCQ (1) रिक्त (1) अतिलघु (1) लघु (2) दीर्घ (3) निबंध (4-6)
विषय वस्तु (Content Area) अंक प्रश्नों का विवरण (Questions Detail)
1. क्षितिज (गद्य)185 MCQ 2 अतिलघु 2 लघु 1 दीर्घ
2. क्षितिज (पद्य)155 MCQ 2 अतिलघु 2 लघु 1 दीर्घ
3. कृतिका112 MCQ 3 लघु 1 दीर्घ
4. व्यावहारिक व्याकरण106 रिक्त 2 लघु
5. रचना-पत्र41 निबंध (पत्र)
6. निबन्ध61 निबंध (लेख)
7. संक्षिप्तीकरण एवं पल्लवन41 निबंध (संक्षेप)
8. अपठित गद्यांश66 MCQ
9. अपठित पद्यांश66 अतिलघु
कुल योग8052 प्रश्न
1. निम्नलिखित बहुविकल्पात्मक प्रश्नों के उत्तर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए (1 × 12 = 12):
(i)भौगोलिक शब्द में कौनसा प्रत्यय हैं?
(अ) इत
(ब) इक
(स) अक
(द) आक
✅ उत्तर: (ब) इक
अवधारणा (Concept): प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो मूल शब्द के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता या परिवर्तन लाते हैं।
नियम: जब ‘इक’ प्रत्यय लगता है, तो शब्द के पहले स्वर में वृद्धि (Adivriddhi) होती है। ‘भूगोल’ (उ) + इक = ‘भौगोलिक’ (औ)। इसी प्रकार: समाज + इक = सामाजिक।
(ii)‘निराकर’ शब्द किस उपसर्ग से बना है?
(अ) निः
(ब) निर्
(स) निस्
(द) निर
✅ उत्तर: (द) निर
अवधारणा (Concept): उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो मूल शब्द के आरंभ (शुरुआत) में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन लाते हैं।
व्याख्या: निर् (उपसर्ग) + आकार (मूल शब्द) = निराकार। ‘र्’ में ‘आ’ जुड़ने से ‘रा’ बनता है। इसका अर्थ है ‘जिसका कोई आकार न हो’।
(iii)व्यक्ति जो पेट भरा और तन ढ़का होने पर भी सो नहीं पाता, होता है-
(अ) असन्तुष्ट व्यक्ति
(ब) साधु
(स) सभ्य व्यक्ति
(द) संस्कृत व्यक्ति
✅ उत्तर: (द) संस्कृत व्यक्ति
पाठ ‘संस्कृति’: ‘संस्कृत व्यक्ति’ वह है जिसकी बुद्धि और चेतना उसे चैन से बैठने नहीं देती। वह मानवता के कल्याण के लिए निरंतर नए तथ्यों की खोज में लगा रहता है (जैसे न्यूटन)। ‘सभ्य’ व्यक्ति केवल आविष्कारों का उपभोग करता है।
(iv)निम्नलिखित में से कौनसी रचना मन्नू भण्डारी की नहीं है?
(अ) झूठा सच
(ब) त्रिशंकु
(स) मैं हार गई
(द) एक प्लेट सैलाब
✅ उत्तर: (अ) झूठा सच
साहित्य ज्ञान: ‘झूठा सच’ यशपाल का प्रसिद्ध उपन्यास है जो भारत-पाक विभाजन पर आधारित है। मन्नू भण्डारी की रचनाएँ हैं: ‘मैं हार गई’, ‘यही सच है’, ‘त्रिशंकु’, ‘आपका बंटी’ आदि।
(v)लेखक ने बालगोबिन की संगीत साधना का चरमोत्कर्ष किस दिन देखा?
(अ) आषाढ की रिमझिम में
(ब) सन्त संमागम में
(स) गर्मियों का साँझ में
(द) पुत्र की मृत्यु पर
✅ उत्तर: (द) पुत्र की मृत्यु पर
कबीरपंथी दर्शन: बालगोबिन भगत का मानना था कि मृत्यु के बाद आत्मा (विरहिणी) अपने परमात्मा (प्रेमी) से मिलती है। इसलिए पुत्र की मृत्यु पर शोक मनाने के बजाय उन्होंने उत्सव मनाया और गीत गाए, जो उनकी साधना का चरम उत्कर्ष था।
(vi)गोपियों द्वारा उद्धव को अन्त में कौनसा धर्म याद दिलाया जाना प्रदर्शित है?
(अ) राजधर्म
(ब) प्रेम धर्म
(स) मित्र धर्म
(द) ज्ञान धर्म
✅ उत्तर: (अ) राजधर्म
संदर्भ: सूरदास के पदों में, गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि एक सच्चे राजा का धर्म (राजधर्म) यह है कि वह अपनी प्रजा को न सताए। कृष्ण ने उन्हें त्यागकर अपना राजधर्म नहीं निभाया।
(vii)‘अट नहीं रही है’ कविता में किस मास की मादकता का वर्णन किया गया है?
(अ) फागुन
(ब) चैत्र
(स) श्रावण
(द) आषाढ़
✅ उत्तर: (अ) फागुन
संदर्भ: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘अट नहीं रही है’ में फागुन (फाल्गुन) महीने की सुंदरता का वर्णन है। इस समय वसंत ऋतु होती है, प्रकृति में नए पत्ते और फूल आते हैं, और शोभा इतनी अधिक होती है कि वह समा नहीं पाती।
(viii)संगतकार का कार्य होता है-
(अ) मुख्य गायक के साथ स्वर मिलाकर उसके स्वर को बल प्रदान करना
(ब) मुख्य गायक से संगीत सीखना
(स) मुख्य गायक की अनुपस्थिति में गायन करना
(द) मुख्य गायक की सेवा करना
✅ उत्तर: (अ) मुख्य गायक के साथ स्वर मिलाकर उसके स्वर को बल प्रदान करना
भावार्थ: संगतकार मुख्य गायक का सहायक होता है। जब मुख्य गायक का स्वर ऊंचाइयों पर जाकर टूटने लगता है, तो संगतकार अपनी गूँज मिलाकर उसे सहारा देता है और बिखरने से बचाता है। यह उसकी मनुष्यता है।
(ix)भोलानाथ एवं उसके दोस्तों का कौनसी शरारत महँगी पड़ी?
(अ) दोस्तों के साथ स्कूल से बंक मारना
(ब) चूहों के बिल में पानी डालना
(स) बरातियों को चिढ़ाना
(द) मूसन तिवाड़ी के साथ बद्तमीजी करना
✅ उत्तर: (ब) चूहों के बिल में पानी डालना
घटना: ‘माता का अँचल’ पाठ में बच्चे चूहों के बिल में पानी डालते हैं। उन्हें लगा चूहे निकलेंगे, लेकिन साँप (Nag) निकल आया। डरकर भागने में वे गिर पड़े और घायल हो गए।
(x)‘मैं क्यों लिखता हूँ’ पाठ के आधार पर बताइए कि आलसी लोग किस दबाव के बिना नहीं लिख पाते?
(अ) माता-पिता का दबाव
(ब) आन्तरिक दबाव
(स) बाहरी दबाव
(द) सरकारी दबाव
✅ उत्तर: (स) बाहरी दबाव
लेखन प्रेरणा: लेखक अज्ञेय के अनुसार, सच्चा लेखन ‘आंतरिक विवशता’ (Internal Compulsion) से होता है। लेकिन जो लोग आलसी होते हैं, वे केवल बाहरी दबाव (जैसे संपादकों का आग्रह या आर्थिक आवश्यकता) होने पर ही लिखते हैं।
(xi)‘साना-साना हाथ जोड़ि…’ पाठ की लेखिका गंतोक में सुबह आँख खुलते ही बालकनी की और क्यों दौड़ी?
(अ) चिड़िया को पकड़ने के लिए
(ब) कंचनजंघा देखने के लिए
(स) सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल देखने के लिए
(द) तीस्ता नदी को देखने के लिए
✅ उत्तर: (ब) कंचनजंघा देखने के लिए
संदर्भ: लेखिका मधु कांकरिया को बताया गया था कि मौसम साफ होने पर गंगटोक से हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा दिखाई देती है। वे उसे देखने के लिए उत्साहित थीं, लेकिन बादलों के कारण नहीं देख पाईं।
(xii)‘तिम्रो माया सैंधे मलाई सताऊँछ’ पंक्ति का तात्पर्य है-
(अ) माया से ही मलाई मिलती है
(ब) तीन मोड़ के बाद सात पर्वत हैं
(स) तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रुलाता है
(द) मलाई के लिए मुझे सताओ मत
✅ उत्तर: (स) तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रुलाता है
अर्थ: यह एक नेपाली लोकगीत की पंक्ति है जिसका हिंदी अनुवाद है “तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रुलाता/सताता है”। यह पहाड़ी जीवन की संवेदना को दर्शाता है।
2. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (1 × 6 = 6):
(i)जिस क्रिया का फल कर्त्ता को छोड़कर कर्म पर पड़े वह सकर्मक क्रिया कहलाती है।
अवधारणा (Concept – क्रिया): जिस शब्द से किसी कार्य के करने या होने का बोध हो, उसे ‘क्रिया’ कहते हैं।

कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद हैं:
1. सकर्मक क्रिया (Transitive Verb): जब क्रिया का फल (प्रभाव) कर्ता को छोड़कर ‘कर्म’ पर पड़ता है।
पहचान: क्रिया के साथ ‘क्या’, ‘किसे’ या ‘किसको’ लगाकर प्रश्न करने पर उत्तर मिलता है।
उदाहरण: ‘राम आम खाता है।’ (यहाँ ‘खाने’ का फल ‘आम’ पर पड़ रहा है)।

2. अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb): जब क्रिया का फल सीधा ‘कर्ता’ पर पड़ता है और कर्म की आवश्यकता नहीं होती।
उदाहरण: ‘पक्षी उड़ते हैं।’ (‘उड़ने’ का फल सीधा ‘पक्षी’ पर है)।
(ii)वे विशेषण, जो किसी पदार्थ के गुण, दोष, रूप, रंग, आकार आदि का बोध कराते है, उन्हे गुणवाचक विशेषण कहते है।
अवधारणा (Concept – विशेषण): संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्दों को ‘विशेषण’ कहते हैं।
विशेषण के 4 प्रमुख भेद हैं:
1. गुणवाचक: गुण, दोष, रंग, आकार आदि (उदा० काला, सुंदर, लंबा, ईमानदार)।
2. संख्यावाचक: संख्या का बोध (उदा० चार, कुछ, पहला)।
3. परिमाणवाचक: माप-तौल का बोध (उदा० दो लीटर, थोड़ा दूध)।
4. सार्वनामिक (संकेतवाचक): जब सर्वनाम संज्ञा से पहले आकर विशेषण का काम करे (उदा० वह लड़का)।
(iii)वे शब्द जिनके स्वरूप में लिंग, वचन, काल आदि से कोई परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अविकारी शब्द कहते है।
अवधारणा (Concept – अव्यय/अविकारी): जिन शब्दों पर लिंग, वचन, कारक या काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वे सदैव एक जैसे रहते हैं, उन्हें ‘अविकारी’ या ‘अव्यय’ कहते हैं।
इसके 4 मुख्य भेद हैं:
1. क्रिया-विशेषण: क्रिया की विशेषता (उदा० धीरे-धीरे, आज, कल)।
2. संबंधबोधक: संज्ञा/सर्वनाम के बाद आकर संबंध बताना (उदा० के पास, के ऊपर)।
3. समुच्चयबोधक: दो वाक्यों/शब्दों को जोड़ना (उदा० और, किंतु, इसलिए)।
4. विस्मयादिबोधक: भाव (हर्ष, शोक) प्रकट करना (उदा० अरे!, वाह!)।
(iv)सर्वनाम के छह (6) भेद होते है।
अवधारणा (Concept – सर्वनाम): संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं।
सर्वनाम के 6 भेद:
1. पुरुषवाचक: (मैं, तुम, वह) – वक्ता, श्रोता या अन्य के लिए।
2. निश्चयवाचक: (यह, वह) – निश्चित वस्तु का बोध।
3. अनिश्चयवाचक: (कोई, कुछ) – अनिश्चितता का बोध।
4. संबंधवाचक: (जो-सो, जिसकी-उसकी) – संबंध बताना।
5. प्रश्नवाचक: (कौन, क्या) – प्रश्न पूछने के लिए।
6. निजवाचक: (स्वयं, खुद, अपने-आप) – कर्ता के अपनेपन के लिए।
(v)‘स्वागत’ शब्द में यण संधि है।
अवधारणा (Concept – संधि): दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को संधि कहते हैं।
मुख्य भेद: स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि।
स्वर संधि के 5 भेद हैं:
1. दीर्घ: (अ+अ=आ)
2. गुण: (अ+इ=ए, अ+उ=ओ)
3. वृद्धि: (अ+ए=ऐ, अ+ओ=औ)
4. यण: (इ+अ=य, उ+अ=व) → उदाहरण: सु + आगत = स्वागत (उ का व)।
5. अयादि: (ए+अ=अय, ओ+अ=अव)।
(vi)रात-दिन शब्द में द्वन्द्व समास है।
अवधारणा (Concept – समास): दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से नए शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं।
प्रमुख भेद:
1. अव्ययीभाव: प्रथम पद प्रधान/अव्यय (यथाशक्ति)।
2. तत्पुरुष: दूसरा पद प्रधान, कारक चिह्नों का लोप (राजपुत्र)।
3. कर्मधारय: विशेषण-विशेष्य संबंध (नीलकमल)।
4. द्विगु: प्रथम पद संख्यावाचक (चौराहा)।
5. द्वन्द्व: दोनों पद प्रधान, बीच में ‘और’ (माता-पिता, रात-दिन)।
6. बहुव्रीहि: अन्य पद प्रधान (दशानन = रावण)।
3. अपठित गद्यांश (Unseen Passage) – 6 अंक
गद्यांश: भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं त्याग और सेवा। आप इन धाराओं में तीव्रता उत्पन्न कीजिए और शेष सब अपने आप ठीक हो जायेगा। तुम काम में लग जाओ फिर देखोगे, इनती शक्ति आयेगी कि तुम उसे संभाल न सकोगे। दूसरों के लिए रती-भर सोचने से धीरे-धीरे हदय में सिंह का सा बल आ जाता है। तुम लोगों से मैं इतना स्नेह करता हूँ, परन्तु यदि तुम लोग दूसरों के लिए परिश्रम करते-करते मर भी जाओ, तो भी यह, देखकर मुझे प्रसन्नता ही होगी। केवल वही व्यक्ति सबकी अपेक्षा उत्तम रूप से कार्य करता है, जो पूर्णतया निःस्वार्थ है।

(i) भारत के राष्ट्रीय आदर्श है? उत्तर: (ब) त्याग और सेवा

(ii) दूसरों के लिए सोचने से हदय में किस प्रकार का बल आ जाता है? उत्तर: (स) सिंह-सा (शेर जैसा साहस)

(iii) ‘स्वार्थी’ शब्द का विपरीतार्थक शब्द गद्यांश में से छाँटकर बताइए। उत्तर: (स) निःस्वार्थ

(iv) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। उत्तर: भारत के राष्ट्रीय आदर्श / त्याग और सेवा का महत्त्व

(v) लेखक को क्या देखकर प्रसन्नता होगी? उत्तर: यदि लोग दूसरों के लिए परिश्रम करते-करते अपना बलिदान भी दे दें।

(vi) कौनसा व्यक्ति उत्तम रूप से कार्य करता है? उत्तर: जो पूर्णतया निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है।

4. अपठित पद्यांश (Unseen Poem) – 6 अंक
पद्यांश:
उषा की लाली में अभी से गए निखर
हिमगिरि के कनक-शिखर
आगे बढ़ा शिशु-रवि
बदली छवि, बदली छवि
देखता रह गया अपलक कवि
डर था प्रतिपल अपरूप यह जादुई आभा
जाए न बिखर, जाए न बिखर

(i) पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए? उत्तर: उषा की लाली / प्राकृतिक सुषमा

(ii) पद्यांश में किस समय का वर्णन हुआ है? उत्तर: सूर्योदय (उषा काल) का।

(iii) कवि को क्या डर लग रहा था? उत्तर: कि यह जादुई आभा (सुंदरता) कहीं बिखर कर नष्ट न हो जाए।

(iv) कविता में कवि ने हिमगिरी किसे कहा है? उत्तर: (अ) हिमालय

(v) हिमगिरी के शिखर किससे निखर गए है? उत्तर: (स) उषा की लाली से

(vi) कविता में रवि को किस के समान बताया है? उत्तर: (द) शिशु (बाल सूर्य)

5. पठित गद्यांश (Textbook Passage) – 3 अंक
गद्यांश 1: आसाढ़ की रिमझिम है। समूचा गाँव खेतों में उत्तर पड़ा है। कहीं हल चल रहे हैः कहीं रोपनी हो रही है। धान के पानी भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं। औरतें कलेवा लेकर मेंड़ पर बैठी हैं। आसमान बादल से घिरा, धूप का नाम नहीं। ठंडी पुरवाई चल रही। ऐसे ही समय आपके कानों में एक स्वर-तरंग झंकार-सी कर उठी। यह क्या है- यह कौन है ! यह पूछना न पड़ेगा। बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लिथड़े, अपने खेत में रोपनी कर रहे हैं। उनकी अँगुली एक-एक धान के पौधे को पंक्तिबद्ध, खेत में बिठा रही है। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को ऊपर, स्वर्ग की और भेज रहा है और कुछ को इस पृथ्वी की मिट्टी पर खड़े लोगों के कानों की ओर।

(i) आसाढ़ मास में प्राकृतिक वातावरण कैसा होता है? उत्तर: आसमान बादलों से घिरा होता है, धूप नहीं होती और ठंडी पुरवाई चलती है।

(ii) आसाढ़ की रिमझिम में गाँव के लोग क्या करते हैं? उत्तर: लोग खेतों में हल चलाते हैं और धान की रोपनी करते हैं।

(iii) किसके संगीत के स्वर की तरंग स्वर्ग की ओर एवं लोगों के कानों की ओर आ रही है? उत्तर: बालगोबिन भगत के संगीत की।

अथवा / OR
गद्यांश 2: प्रभात फेरियाँ, हड़ताले, जुलूस, भाषण हर शहर का चरित्र था और पूरे दमखम और जोश-खरोश के साथ इन सबसे जुड़ना हर युवा का उन्माद। मैं भी युवा थी और शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया था। स्थिति यह हुई कि एक बबण्डर शहर में मचा हुआ था और एक घर में। पिताजी की आजादी की सीमा यही तक थी कि उनकी उपस्थिति में घर में आए लोगों के बीच उर्दू-बैठूं, जानूँ-समझें। हाथ उठा-उठा कर नारे लगाती, हड़ताले करवाती, लड़को के साथ शहर की सड़के नापती लड़की को अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था तो किसी की दी हुई आजादी के दायरे में चलना मेरे लिए।

(i) स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं की क्या भूमिका थी? उत्तर: युवा पूरे जोश-खरोश के साथ प्रभात फेरियों, हड़तालों और जुलूसों में भाग लेते थे।

(ii) शीला अग्रवाल की जोशीली बातो का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा? उत्तर: लेखिका की रगों में बहता खून लावे में बदल गया (क्रांतिकारी विचार प्रबल हो गए)।

(iii) लेखिका ने स्वत्रतंत्रता संग्राम में कैसे सहभागिता निभाई? उत्तर: नारे लगाकर, हड़तालें करवाकर और जुलूसों में भाग लेकर।

6. पठित पद्यांश (Textbook Poem) – 3 अंक
पद्यांश 1:
फसल क्या है ?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपान्तर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का !

(i) काव्यांश में किन मानवीय मूल्यों की ओर संकेत किया गया है? उत्तर: इसमें मानव श्रम (किसानों की मेहनत) और प्रकृति के सहयोग के महत्त्व की ओर संकेत किया गया है।

(ii) खेतों में लहलहाती हुई फसल को देखकर मानव मन से क्या चित्र उभरता है? उत्तर: यह चित्र उभरता है कि फसल केवल पौधा नहीं, बल्कि नदियों, मिट्टी, धूप, हवा और मानव श्रम का सम्मिलित रूप है।

(iii) ‘रूपान्तर है सूरज की किरणों का’ पंक्ति का आशय लिखिए? उत्तर: इसका आशय है कि फसल सूरज की ऊर्जा (प्रकाश संश्लेषण) को अपने अंदर ग्रहण करके ही बढ़ती है और अन्न का रूप लेती है।

अथवा / OR
पद्यांश 2:
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसो, ज्यौं करूई ककरी।
सू तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सुर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।

(i) गोपियों ने कृष्ण की तुलना किससे और क्यों की है? उत्तर: हारिल पक्षी की लकड़ी से। जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने मन-वचन-कर्म से कृष्ण को पकड़ रखा है।

(ii) गोपियों का उद्धव द्वारा दिया गया योग संदेश कैसा प्रतीत होता है? उत्तर: कड़वी ककड़ी (करूई ककरी) के समान अरुचिकर और व्यर्थ।

(iii) काव्यांश में रेखांकित पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। उत्तर: गोपियाँ कहती हैं कि योग साधना तो उन लोगों को सौंपनी चाहिए जिनका मन ‘चकरी’ की तरह चंचल है। हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है।

7हालदार साहब ने कैप्टन चश्मे वाले को सामने खड़ा देखते ही क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की? (‘नेताजी का चश्मा’)
उत्तर: हालदार साहब कैप्टन को देखकर अवाक् रह गए। उनके मन में ‘कैप्टन’ नाम से किसी फौजी या बलिष्ठ व्यक्ति की छवि थी, लेकिन सामने एक बूढ़ा, मरियल और लंगड़ा व्यक्ति था, जिसके सिर पर गांधी टोपी और आँखों पर काला चश्मा था। उसके एक हाथ में संदूकची और दूसरे हाथ में बाँस पर टंगे चश्मे थे। उसकी निर्धनता और शारीरिक अक्षमता के बावजूद देशप्रेम के जज्बे को देखकर हालदार साहब का हृदय सम्मान से भर उठा और वे नतमस्तक हो गए।
8‘लखनवी अंदाज’ कहानी में लेखक ने ‘पतनशील सामन्ती वर्ग’ पर कटाक्ष किया है। कथन को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक यशपाल ने नवाब साहब के खीरा खाने के कृत्रिम ढंग के माध्यम से पतनशील सामंती वर्ग (Feudal Class) की बनावटी जीवनशैली पर व्यंग्य किया है। नवाब साहब ने खीरे को बड़े जतन से धोया, काटा और नमक-मिर्च बुरका, लेकिन उसे खाया नहीं। केवल सूंघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया और डकार लेकर तृप्ति का अभिनय किया। यह दिखाता है कि सामंती वर्ग अपनी झूठी शान-शौकत (‘रईसी’) के प्रदर्शन के लिए वास्तविकता (भूख मिटाना) को भी नकार देता है, जो उनके खोखलेपन का प्रमाण है।
9बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा गया है? (‘नौबत खाने में इबादत’)
उत्तर: भारतीय संस्कृति में शहनाई को ‘मंगल ध्वनि’ का वाद्य माना जाता है क्योंकि यह विवाह, जन्मोत्सव और मांगलिक आयोजनों में अनिवार्य रूप से बजाई जाती है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने इस लोक वाद्य को शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने 80 वर्षों तक काशी में गंगा तट पर बैठकर सुर की साधना की। उनकी शहनाई वादन में अद्भुत मिठास और प्रभाव था, जिससे वे शहनाई के पर्याय बन गए। इसी अद्वितीय योगदान के कारण उन्हें इस मंगल ध्वनि का ‘नायक’ (हीरो) कहा गया है।
10‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ काव्यांश के आधार पर वीर योद्धा की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: लक्ष्मण जी के अनुसार, सच्चा वीर योद्धा (शूरवीर) वह है जो युद्धभूमि में अपना पराक्रम (शौर्य) सिद्ध करता है, केवल बातों से अपनी वीरता का बखान नहीं करता। वीर पुरुष धैर्यवान (धीर) और गंभीर होते हैं, वे कभी क्रोध में अपशब्द (गाली) नहीं बोलते। वे क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए कभी भी निहत्थे, ब्राह्मण, गाय या कमजोरों पर हथियार नहीं उठाते। उनकी वीरता उनके कर्मों में झलकती है, अहंकारपूर्ण वचनों में नहीं।
11आत्मकथा सुनाने का अभी समय नहीं है। कवि ने ऐसा क्यों कहा? (‘आत्मकथ्य’)
उत्तर: कवि जयशंकर प्रसाद विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि उनके जीवन में कोई ऐसी महान उपलब्धि नहीं है जो दूसरों के लिए प्रेरणा बने। उनका जीवन तो कष्टों, अभावों और प्रवंचनाओं (धोखा) से भरी एक ‘खाली गागर’ (Reeti Gagar) के समान है। वे अपने सोए हुए दुखों और व्यक्तिगत पीड़ा को कुरेदकर फिर से हरा नहीं करना चाहते। वे अपनी साधारणता में ही मौन रहना बेहतर समझते हैं, इसलिए कहते हैं कि अभी आत्मकथा लिखने का उचित समय नहीं आया है।
12‘दंतुरित मुस्कान’ मृतक में भी जान डालने में समर्थ होती है, कथन में निहित भाव को समझाइए।
उत्तर: इस कथन का भाव यह है कि शिशु की निश्छल और दंतुरित (नए-नए दाँतों वाली) मुस्कान में अद्भुत संजीवनी शक्ति होती है। जब कोई व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों से हारकर हताश, निराश और ‘मृतक’ (भावना शून्य) हो जाता है, तब बच्चे की प्यारी मुस्कान उसे फिर से जीवन जीने की प्रेरणा देती है। यह मुस्कान कठोर से कठोर हृदय (पाषाण) को भी पिघलाकर जल (करुणा) बना देती है और उदास मन में फिर से उल्लास और सरसता का संचार कर देती है।
13लेखक के साथियों ने मूसन तिवारी को क्या कहकर चिढ़ाया और उसका क्या परिणाम हुआ? (‘माता का अँचल’)
उत्तर: बैजू के नेतृत्व में लेखक (भोलानाथ) और उनके साथियों ने बुड्ढे मूसन तिवारी को कम दिखता था, इसलिए उन्हें चिढ़ाते हुए गाया- “बुढ़वा बेईमान मांगे करेला का चोखा”। इस शरारत का परिणाम यह हुआ कि मूसन तिवारी ने पाठशाला जाकर गुरुजी से शिकायत कर दी। गुरुजी ने चार सिपाहियों को भेजकर बच्चों को पकड़वाया। बैजू तो भाग गया, लेकिन भोलानाथ पकड़ में आ गए और उनकी जमकर पिटाई हुई। बाद में बाबूजी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें गुरुजी से छुड़ाया।
14लेखक ने जीव अपव्यय के बारे में क्या अनुमान लगाया? (‘मैं क्यों लिखता हूँ’)
उत्तर: लेखक (अज्ञेय) ने हिरोशिमा की सड़क पर एक जले हुए पत्थर पर पड़ी हुई मानव छाया को देखा। उस छाया को देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि जब अणुबम का विस्फोट हुआ होगा, तब वह व्यक्ति उस पत्थर के पास खड़ा रहा होगा। विस्फोट से निकली प्रचण्ड ऊष्मा और रेडियोधर्मी विकिरण ने उसे तुरंत जलाकर भाप बना दिया होगा और पत्थर को झुलसा दिया, जिससे वहां केवल उसकी काली छाया (Shadow) रह गई। इस दृश्य ने लेखक को विज्ञान के दुरुपयोग से होने वाले मानवता और अनगिनत जीव-जंतुओं के निरर्थक विनाश (अपव्यय) की भयावहता का अहसास कराया।
अथवा / OR
लेखक के अनुसार, प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा क्या अधिक महत्वपूर्ण है?
उत्तर: लेखक के अनुसार, ‘प्रत्यक्ष अनुभव’ (Direct Experience) की अपेक्षा ‘अनुभूति’ (Realization/Sensibility) अधिक महत्वपूर्ण है। प्रत्यक्ष अनुभव तो बाहरी होता है, जो आँखों के सामने घटित होता है। लेकिन अनुभूति एक गहरी, आंतरिक प्रक्रिया है। जब तक अनुभव संवेदना और कल्पना के माध्यम से लेखक के हृदय में समा नहीं जाता और वह स्वयं उस पीड़ा को भोगता नहीं है, तब तक सृजन संभव नहीं है। अनुभूति ही वह क्षण है जब बाहरी सत्य लेखक का अपना ‘भोगा हुआ यथार्थ’ बन जाता है, और यही आंतरिक आकुलता उसे लिखने के लिए विवश करती है।
15‘अपनी खिचड़ी अलग पकाना’ मुहावरे का अर्थ लिखकर वाक्य में प्रयोग कीजिए।
अर्थ: सबसे अलग-थलग रहना / किसी के साथ न मिलना-जुलना / अपने मनमानी करना / सामूहिक कार्यों में सहयोग न देना。
वाक्य प्रयोग: हमारे मोहल्ले में जब भी कोई उत्सव होता है, तो वर्मा जी उसमें शामिल नहीं होते, वे तो हमेशा अपनी खिचड़ी अलग पकाते हैं
अथवा / OR
‘अंधों में काना राजा’ लोकोक्ति का अर्थ एवं वाक्य प्रयोग।
अर्थ: मूर्खों या अज्ञानियों के बीच अल्पज्ञानी (थोड़ा जानने वाला) भी विद्वान माना जाता है / गुणहीनों के बीच थोड़े गुण वाला व्यक्ति श्रेष्ठ समझा जाता है。
वाक्य प्रयोग: पूरे गाँव में कोई भी अंग्रेजी नहीं जानता था, लेकिन सुरेश थोड़ी-बहुत अंग्रेजी बोल लेता था, इसलिए वह गाँव वालों के लिए अंधों में काना राजा बना हुआ है।
16‘वो लगडा क्या जाएगा फौज में। पागल है पागल!’ – पान वाले का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह कथन ‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के पानवाले का है, जो समाज की एक संवेदनहीन और व्यंग्यपूर्ण मानसिकता को उजागर करता है।
1. देशभक्ति का उपहास: जब हालदार साहब ने चश्मे वाले के बारे में पूछा कि क्या वह कोई ‘कैप्टन’ (फौजी) था, तो पानवाले ने व्यंग्य से यह जवाब दिया। वह कैप्टन की सच्ची देशभक्ति और नेताजी के प्रति सम्मान को समझने के बजाय, उसे ‘पागलपन’ मानता था।
2. शारीरिक अक्षमता पर कटाक्ष: ‘लंगड़ा’ शब्द का प्रयोग अत्यंत अपमानजनक था। यह दर्शाता है कि पानवाला केवल शारीरिक बल को महत्व देता है, मन की शक्ति और त्याग को नहीं। उसके लिए एक विकलांग व्यक्ति का देश के लिए कुछ करना हंसी का पात्र था।
3. उदासीन नागरिकता: पानवाला स्वयं स्वस्थ था लेकिन देश के लिए कुछ नहीं करता था। वह उन लोगों का प्रतिनिधि है जो अपनी कमियों को छिपाने के लिए देशभक्तों का मजाक उड़ाते हैं। यह दृष्टिकोण अत्यंत निंदनीय और नकारात्मक है।
अथवा / OR
मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? ‘संस्कृति’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: भदंत आनंद कौसल्यायन ने ‘संस्कृति’ पाठ में संस्कृति और सभ्यता के बीच सूक्ष्म अंतर बताया है। उनके अनुसार, संस्कृति का मूल आधार मानव कल्याण (Human Welfare) और लोकोपकार की भावना है।
जिस बुद्धि और योग्यता (आविष्कार शक्ति) से मनुष्य का हित होता है, जैसे सुई-धागे का आविष्कार (तन ढकने के लिए) या आग का आविष्कार (पेट भरने के लिए), वह ‘संस्कृति’ है।
किंतु, यदि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग आत्म-विनाश के साधनों (जैसे परमाणु बम, घातक हथियार) के निर्माण में करता है, जिससे मानवता का अहित होता है, तो लेखक उसे संस्कृति नहीं, बल्कि ‘असंस्कृति’ (Un-culture) कहते हैं। असंस्कृति हमेशा विध्वंसक होती है और यदि इसे रोका नहीं गया, तो यह पूरी सभ्यता के पतन का कारण बन सकती है। इसलिए मानव कल्याण के विपरीत किया गया कोई भी आविष्कार असंस्कृति है।
17‘अट नहीं रही है’ कविता में कवि ने प्रकृति की व्यापकता का वर्णन किन रूपों में किया है?
उत्तर: कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘अट नहीं रही है’ कविता में फागुन मास (वसंत ऋतु) की सुंदरता को सर्वव्यापी (Omnipresent) और मादक रूप में चित्रित किया है। प्रकृति की शोभा इतनी अधिक है कि वह धरती के पात्र में समा नहीं पा रही है।
1. प्राकृतिक सुषमा: चारों ओर हरियाली है। पेड़ों की डालियाँ कहीं लाल (कोमल) तो कहीं हरे पत्तों से लद गई हैं। फूलों की बहार से पूरा वातावरण रंगीन हो गया है।
2. सुगंधित वातावरण: फूलों की भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुल गई है, जिससे ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं ‘सांस’ ले रही हो। यह सुगंध घर-घर में भर गई है।
3. मन की उड़ान: प्रकृति का यह रूप इतना आकर्षक है कि मन पक्षी की तरह आकाश में पंख फैलाकर उड़ने को आतुर हो जाता है।
4. सम्मोहन: सुंदरता इतनी व्यापक है कि कवि चाहकर भी अपनी आँखें उससे हटा नहीं पा रहा है। धरती का कोना-कोना इस शोभा से आप्लावित है।
अथवा / OR
‘किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्धि पाने वाले लोगों को अनके लोग तरह-तरह से अपना योगदान देते हैं। ‘संगीतकार’ कविता के आधार समझाइए।
उत्तर: मंगलेश डबराल की कविता ‘संगतकार’ यह शाश्वत सत्य उजागर करती है कि किसी भी व्यक्ति की सफलता केवल उसकी अपनी नहीं होती, उसके पीछे कई अदृश्य सहयोगियों (Unsung Heroes) का त्याग और समर्पण होता है।
कविता में, संगतकार अपनी आवाज़ को जानबूझकर मुख्य गायक की आवाज़ से नीचा रखता है ताकि मुख्य गायक का प्रभाव बना रहे। यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि ‘मनुष्यता’ है। वह मुख्य गायक को बिखरने से बचाता है और उसके अकेलेपन को दूर करता है।
इसी तरह जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी – जैसे खेल में कोच और साथी खिलाड़ी, राजनीति में कार्यकर्ता, सिनेमा में तकनीशियन और मेकअप आर्टिस्ट, या युद्ध में सैनिक – ये सभी ‘संगतकार’ की भूमिका निभाते हैं। ये लोग अपनी प्रसिद्धि की परवाह किए बिना मुख्य व्यक्ति (नायक) को शिखर पर पहुँचाने में आधारस्तंभ का कार्य करते हैं। उनका योगदान अपरिहार्य है।
18“कितना कम लेकर में समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती है।” साना-साना हाथ जोड़ि पाठ के आधार पर समझाइए।
उत्तर: लेखिका मधु कांकरिया ने यह मार्मिक टिप्पणी सिक्किम की पहाड़ी मजदूरनी महिलाओं (Pahadi Laborer Women) के संघर्षमय जीवन को देखकर की है।
1. कम लेना (Minimal Consumption): ये महिलाएं अत्यंत अभावों में जीती हैं। कड़कड़ाती ठंड में भी वे साधारण कपड़े पहनती हैं और बहुत कम सुविधाओं का उपभोग करती हैं। बदले में उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है, जिससे उनका जीवनयापन मुश्किल से होता है।
2. अधिक लौटाना (Maximum Contribution): इसके विपरीत, इनका योगदान समाज और देश के लिए अमूल्य है। वे अपनी पीठ पर बच्चों को (डोको में) लादकर, जान जोखिम में डालकर पहाड़ों को काटती हैं और दुर्गम रास्ते बनाती हैं। इन्हीं रास्तों के कारण पर्यटन संभव होता है, सेना सीमा तक पहुँच पाती है और देश की अर्थव्यवस्था व सुरक्षा सुदृढ़ होती है। उनका यह मूक त्याग और श्रम-साधना समाज पर एक बड़ा ऋण है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। वे सच्चे अर्थों में समाज निर्माता हैं।
अथवा / OR
“मैं क्यों लिखता हूँ? पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक को कौन-कौनसी बाते लिखने के लिए प्रेरित करती है।
उत्तर: लेखक अज्ञेय के अनुसार, लेखन प्रक्रिया केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक प्रक्रिया है। उन्हें लिखने के लिए मुख्य रूप से दो कारक प्रेरित करते हैं:
1. आंतरिक विवशता (Inner Compulsion / अनुभूति): यह सबसे प्रमुख और मौलिक कारण है। जब लेखक के मन में कोई सत्य, विचार या संवेदना इतनी तीव्र हो जाती है कि वह उसे बेचैन करने लगती है, तो उसे व्यक्त करके ही उसे शांति मिलती है। यह ‘स्वंत: सुखाय’ होता है। जैसे हिरोशिमा की घटना ने लेखक को अंदर तक झकझोर दिया, और वह कविता के रूप में फूट पड़ी।
2. बाहरी दबाव (External Pressure): कई बार लेखक बाहरी कारणों से भी लिखता है। इसमें शामिल हैं – संपादकों का आग्रह, प्रकाशकों का तकाजा, पाठकों की मांग, या सबसे व्यावहारिक कारण – आर्थिक आवश्यकता (Economic Necessity)। यद्यपि लेखक मानता है कि श्रेष्ठ साहित्य वही है जो आंतरिक अनुभूति से निकले, लेकिन कई बार बाहरी दबाव भी अनुशासन बनाने में सहायक होता है।
19जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
व्यक्तित्व (Personality): छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तक और ‘ब्रह्मा’ कहे जाने वाले जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 में वाराणसी (काशी) के प्रतिष्ठित ‘सुंघनी साहू’ परिवार में हुआ। उनका व्यक्तित्व अत्यंत सौम्य, गंभीर और स्वाभिमानी था। अल्पायु में ही माता-पिता और बड़े भाई के निधन के कारण उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों और संघर्षों का सामना करना पड़ा, जिसकी छाप उनकी रचनाओं में गहरी वेदना के रूप में दिखाई देती है।

कृतित्व (Works):
काव्य: ‘कामायनी’ (महाकाव्य – खड़ी बोली का गौरव ग्रंथ), ‘आँसू’ (विरह काव्य), ‘लहर’, ‘झरना’, ‘प्रेम पथिक’।
नाटक: वे ऐतिहासिक नाटकों के सम्राट माने जाते हैं। प्रमुख नाटक: ‘चंद्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘अजातशत्रु’।
उपन्यास: ‘कंकाल’, ‘तितली’, ‘इरावती’ (अपूर्ण)।
कहानी संग्रह: ‘आकाशदीप’, ‘आंधी’, ‘इंद्रजाल’, ‘प्रतिध्वनि’।
शैली: उनकी भाषा तत्सम प्रधान, अलंकृत और चित्रात्मक है।
अथवा / OR
रामवृक्ष बेनीपुरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
व्यक्तित्व (Personality): रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1899 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ। वे एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी विचारक और यशस्वी पत्रकार थे। मात्र 10वीं पास करने के बाद वे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और अपने जीवन के कई वर्ष जेलों में बिताए। उनका निधन 1968 में हुआ।

कृतित्व (Works):
उपाधि: अपनी जादुई लेखन शैली के कारण उन्हें हिंदी साहित्य में ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
रेखाचित्र (Sketches): ‘माटी की मूरतें’ (अमर कृति), ‘लाल तारा’।
संस्मरण: ‘जंजीरें और दीवारें’, ‘मील के पत्थर’।
नाटक: ‘अंबपाली’ (प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक)।
उपन्यास: ‘पतितों के देश में’।
यात्रा वृतांत: ‘पैरों में पंख बांधकर’।
शैली: उनकी भाषा अत्यंत सजीव, सरल और प्रवाहमयी है। वे छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी बात कहने और शब्दों से चित्र खींचने में माहिर थे।
20निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबन्ध लिखिए (6 अंक):

विकल्प:
1) मोबाइल फोन: छात्र के लिए वरदान या अभिशाप
2) पर्यावरण संरक्षण और युवा
3) आत्मनिर्भर भारत


(1) मोबाइल फोन: छात्र के लिए वरदान या अभिशाप

(i) प्रस्तावना:
विज्ञान ने मानव जीवन को सुगम बनाने के लिए अनेक अद्भुत आविष्कार किए हैं, जिनमें ‘मोबाइल फोन’ सबसे क्रांतिकारी और प्रभावशाली है। प्रारंभ में इसका आविष्कार केवल संचार (बातचीत) के लिए हुआ था, लेकिन आज यह ‘स्मार्टफोन’ के रूप में हमारी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका है। छात्रों के जीवन में इसका प्रवेश एक बड़ी बहस का विषय है कि यह उनके लिए वरदान है या अभिशाप।

(ii) मोबाइल फोन का बढ़ता प्रभाव:
21वीं सदी डिजिटल क्रांति की सदी है। विशेष रूप से कोरोना काल के बाद शिक्षा जगत में आमूलचूल परिवर्तन आया है। कल तक जो मोबाइल स्कूलों में प्रतिबंधित था, आज वह शिक्षा का मुख्य माध्यम बन गया है। आज स्कूल के होमवर्क से लेकर कॉलेज के प्रोजेक्ट्स तक, सब कुछ मोबाइल पर निर्भर है। यह छात्रों की जेब में रखा हुआ एक चलता-फिरता विश्वकोश (Encyclopedia) है।

(iii) मोबाइल फोन का लाभ (वरदान):
यदि सदुपयोग किया जाए, तो मोबाइल छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है:
ज्ञान का असीमित भंडार: इंटरनेट के माध्यम से छात्र दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी पल भर में प्राप्त कर सकते हैं। ‘गूगल’ और ‘यूट्यूब’ ने सीखने की प्रक्रिया को बहुत आसान बना दिया है।
ऑनलाइन शिक्षा: ई-लर्निंग ऐप्स, पीडीएफ नोट्स और एजुकेशनल वीडियो ने दूर-दराज के छात्रों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ कराई है।
संपर्क और सुरक्षा: मोबाइल के जरिए छात्र अपने शिक्षकों और अभिभावकों से निरंतर जुड़े रहते हैं। किसी भी आपात स्थिति में यह सुरक्षा का सबसे त्वरित साधन है।
कौशल विकास: छात्र कोडिंग, भाषा सीखने या अन्य कौशल विकास के कोर्स घर बैठे कर सकते हैं।

(iv) मोबाइल फोन से हानि (अभिशाप):
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इसका दुरुपयोग छात्रों के भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो रहा है:
एकाग्रता में कमी: पढ़ाई करते समय बार-बार सोशल मीडिया (Instagram, Facebook) के नोटिफिकेशन आना छात्रों का ध्यान भटकाता है।
समय की बर्बादी: रील देखने, चैटिंग करने और ऑनलाइन गेमिंग की लत में छात्र अपने कीमती घंटे बर्बाद कर देते हैं, जिससे उनका शैक्षणिक स्तर गिरता है।
स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव: लगातार स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने से आँखों की रोशनी कमजोर होना, सिरदर्द, अनिद्रा और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।
नैतिक पतन: इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील और हिंसक सामग्री छात्रों के कोमल मन को दूषित कर रही है, जिससे वे अपराध की ओर भी उन्मुख हो सकते हैं।

(v) उपसंहार:
निष्कर्षतः, मोबाइल फोन अपने आप में केवल एक यंत्र है; वह न तो अच्छा है और न ही बुरा। उसका ‘वरदान’ या ‘अभिशाप’ होना पूरी तरह से उपयोगकर्ता के विवेक पर निर्भर करता है। यह आग की तरह है—जिससे खाना भी पकाया जा सकता है और हाथ भी जलाया जा सकता है। छात्रों को आत्म-अनुशासन के साथ इसका उपयोग केवल अपनी प्रगति के लिए करना चाहिए, न कि समय बर्बाद करने के लिए। तकनीक को हमारा गुलाम होना चाहिए, मालिक नहीं।

(2) पर्यावरण संरक्षण और युवा

(i) प्रस्तावना:
‘पर्यावरण’ शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है हमारे चारों ओर का वह घेरा जो हमें जीवन प्रदान करता है। हवा, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे और जीव-जंतु मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है। लेकिन वर्तमान में मनुष्य के लालच ने इस जीवनदायी पर्यावरण को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की आवश्यकता है।

(ii) पर्यावरण संरक्षण की समस्या:
आज हमारी धरती बीमार है। अनियंत्रित औद्योगीकरण, शहरीकरण और वनों की अंधाधुंध कटाई ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। नदियों का पानी जहरीला हो रहा है, हवा में सांस लेना मुश्किल है और प्लास्टिक कचरे के ढेर लग गए हैं। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (वैश्विक तापन) के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और मौसम का चक्र बदल गया है। ओजोन परत में छेद होना और नई-नई महामारियों का आना इसी पर्यावरण असंतुलन का परिणाम है।

(iii) पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व:
पर्यावरण का संरक्षण केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं मानव अस्तित्व को बचाने का प्रश्न है। यदि पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा, तो न शुद्ध हवा मिलेगी, न पीने योग्य पानी और न ही भोजन। जैव विविधता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ पृथ्वी सौंपने के लिए पर्यावरण संरक्षण अनिवार्य है।

(iv) पर्यावरण संरक्षण के उपाय (युवाओं की भूमिका):
किसी भी देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी होती है। पर्यावरण संरक्षण में युवा वर्ग क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है:
व्यापक वृक्षारोपण: “एक वृक्ष, दस पुत्र समान”। युवाओं को संकल्प लेना चाहिए कि वे हर विशेष अवसर पर एक पौधा लगाएंगे और उसे बड़ा करेंगे।
जन-जागरूकता: युवा सोशल मीडिया, नुक्कड़ नाटकों और रैलियों के माध्यम से समाज को प्रदूषण के खतरों के प्रति जागरूक कर सकते हैं।
प्लास्टिक मुक्त भारत: ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ का पूर्ण बहिष्कार करके और कपड़े के थैलों का उपयोग बढ़ाकर युवा समाज को नई दिशा दे सकते हैं।
जल एवं ऊर्जा संरक्षण: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और सौर ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देने में युवा तकनीकी मदद कर सकते हैं।
स्वच्छता अभियान: अपने आस-पास की सफाई रखकर और कचरा प्रबंधन में सहयोग देकर प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

(v) उपसंहार:
गांधीजी ने कहा था, “प्रकृति के पास हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं।” आज समय की मांग है कि युवा अपनी ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगाएं। हमें प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि पोषण करना होगा। यदि युवा आज जाग गया, तो निश्चित रूप से हम अपनी धरती को फिर से हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बना पाएंगे। “प्रकृति रक्षितः रक्षितः” – अर्थात जो प्रकृति की रक्षा करता है, प्रकृति उसकी रक्षा करती है।

(3) आत्मनिर्भर भारत

(i) प्रस्तावना:
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में निहित होती है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारत को एक सशक्त, समृद्ध और समर्थ विश्व शक्ति बनाने का महासंकल्प है। इसका उद्देश्य भारत को अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय, स्वयं अपनी क्षमताओं से निर्माण करने वाला देश बनाना है। यह अभियान भारत के स्वाभिमान और पुनरुत्थान का प्रतीक है।

(ii) आत्मनिर्भर भारत (संकल्पना):
आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग-थलग होना या वैश्वीकरण का विरोध करना नहीं है। इसका अर्थ है- भारत को इतना सक्षम बनाना कि वह विश्व कल्याण में अपनी भूमिका निभा सके। इसका मूल मंत्र है- “लोकल के लिए वोकल” (Vocal for Local)। यानी हमें न केवल स्थानीय (स्वदेशी) उत्पादों को खरीदना चाहिए, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना चाहिए ताकि वे वैश्विक ब्रांड बन सकें। हमारा लक्ष्य आयात (Import) कम करना और निर्यात (Export) बढ़ाना है।

(iii) आत्मनिर्भर भारत के पाँच स्तम्भ:
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए पाँच प्रमुख आधार स्तंभ बताए हैं:
1. अर्थव्यवस्था (Economy): ऐसी अर्थव्यवस्था जो छोटे-मोटे बदलाव नहीं, बल्कि लंबी छलांग (Quantum Jump) लगाए।
2. अवसंरचना (Infrastructure): आधुनिक बुनियादी ढांचा जो नए भारत की पहचान बने।
3. प्रणाली (System): 21वीं सदी की तकनीक पर आधारित व्यवस्था।
4. जनसांख्यिकी (Demography): दुनिया की सबसे बड़ी और जीवंत युवा शक्ति, जो हमारी ऊर्जा है।
5. मांग (Demand): हमारे पास एक विशाल बाजार और मांग की शक्ति है, जिसका पूरा दोहन जरूरी है।

(iv) आत्मनिर्भरता के उपाय एवं लाभ:
इस अभियान के तहत कृषि, रक्षा, अंतरिक्ष, चिकित्सा और तकनीक के क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। लघु और कुटीर उद्योगों (MSME) को आर्थिक पैकेज देकर मजबूत किया जा रहा है।
लाभ: जब हम अपनी चीजें खुद बनाएंगे, तो देश का पैसा देश में रहेगा। इससे रोजगार के करोड़ों नए अवसर पैदा होंगे। गरीबी दूर होगी और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ेगा। भारत रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा। मेक इन इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।

(v) उपसंहार:
आत्मनिर्भर भारत अभियान 140 करोड़ भारतीयों के सपनों, संकल्पों और पुरुषार्थ का अभियान है। यह हमें चुनौती को अवसर में बदलना सिखाता है। 21वीं सदी भारत की सदी होगी, लेकिन इसके लिए हम सभी नागरिकों को स्वदेशी को अपनाना होगा और नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देना होगा। जब हर भारतवासी ‘स्वदेशी’ का व्रत लेगा, तभी भारत पुनः ‘विश्व गुरु’ के पद पर आसीन हो सकेगा। “सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास” से ही यह सपना साकार होगा।

21पत्र लेखन

(1) शैक्षणिक भ्रमण हेतु प्रार्थना पत्र

सेवा में,

श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,

अलवर।

विषय: शैक्षणिक भ्रमण (Educational Tour) के आयोजन हेतु अनुमति बाबत।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि हम आपके विद्यालय की कक्षा 10वीं के सभी छात्र, अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान में वृद्धि हेतु राजस्थान की राजधानी जयपुर और उसके आस-पास के ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करना चाहते हैं। जैसा कि आप जानते हैं, हमारे सामाजिक विज्ञान और इतिहास के पाठ्यक्रम में आमेर का किला, जंतर-मंतर वेधशाला और हवामहल जैसे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों का वर्णन है।

पुस्तकीय ज्ञान को जब प्रत्यक्ष अनुभव (Practical Knowledge) का साथ मिलता है, तो वह ज्ञान स्थायी और रोचक हो जाता है। “देशाटन” शिक्षा का एक अनिवार्य अंग है। इस भ्रमण से हमें न केवल ऐतिहासिक जानकारी मिलेगी, बल्कि हममें सामूहिकता, अनुशासन और नेतृत्व के गुणों का भी विकास होगा।

अतः आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि छात्रहित को ध्यान में रखते हुए, आगामी शीतकालीन अवकाश में हमारे लिए तीन दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण की अनुमति प्रदान करने और विद्यालय की ओर से एक शिक्षक के मार्गदर्शन में उचित व्यवस्था करवाने की कृपा करें। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भ्रमण के दौरान हम पूर्ण अनुशासन बनाए रखेंगे।

दिनांक: 15 अक्टूबर 20XX

आपका आज्ञाकारी शिष्य

राकेश कुमार

(छात्र प्रतिनिधि)

कक्षा-10 ‘अ’

अथवा / OR

(2) छोटे भाई को शिक्षा का महत्त्व बताते हुए अनौपचारिक पत्र

बी-12, शास्त्री नगर,

जोधपुर।

दिनांक: 20 मार्च 20XX

प्रिय अनुज आशीष,

शुभाशीष और ढेर सारा स्नेह।

मैं यहाँ कुशल हूँ और ईश्वर से तुम्हारी कुशलता की कामना करता हूँ। कल ही पिताजी का पत्र प्राप्त हुआ, जिसे पढ़कर मन थोड़ा व्यथित हुआ। उन्होंने लिखा है कि आजकल तुम्हारा मन पढ़ाई में कम और खेल-कूद, मोबाइल तथा इधर-उधर घूमने में अधिक लग रहा है। अर्द्धवार्षिक परीक्षा में तुम्हारे कम अंक आना इसी लापरवाही का परिणाम है।

प्रिय भाई, तुम्हें अभी यह आभास नहीं है, लेकिन विद्यार्थी जीवन की नींव शिक्षा (Education) पर ही टिकी होती है। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या नौकरी पाने का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को एक सभ्य, संस्कारी और विचारशील नागरिक बनाती है। यह वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधेरे को मिटाकर जीवन की राह दिखाता है। याद रखना, बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। यदि तुमने यह समय मौज-मस्ती में गंवा दिया, तो भविष्य में पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा।

मेरी तुम्हें यही सलाह है कि तुम मोबाइल और टीवी का मोह त्यागकर एक निश्चित समय-सारणी (Time-table) बनाओ और नियमित अध्ययन करो। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम अपनी गलती सुधारोगे और वार्षिक परीक्षा में अच्छे अंक लाकर परिवार का नाम रोशन करोगे। घर में माता-पिता को मेरा चरण स्पर्श कहना।

तुम्हारा शुभचिंतक/बड़ा भाई

कमल

पत्र लेखन के अंक (4 Marks):
प्रारूप (Format): 1 अंक (पता, दिनांक, संबोधन, अभिवादन, अंत)।
विषय वस्तु (Content): 2 अंक (मुख्य बात प्रभावी ढंग से लिखी गई हो)।
भाषा-शैली (Language): 1 अंक (शुद्धता और प्रवाह)।
नोट: अनौपचारिक पत्र (भाई/मित्र) में ‘विषय’ नहीं लिखा जाता।
22संक्षिप्तीकरण / पल्लवन
(1) संक्षिप्तीकरण (Summary Writing):
मूल अवतरण का सार: पृथ्वी को ‘माता’ और स्वयं को उसका ‘पुत्र’ स्वीकार करना ही स्वराज्य की आधारशिला है। जब व्यक्ति अपनी जन्मभूमि को देवतुल्य मानकर उससे गहरा आत्मिक संबंध स्थापित कर लेता है, तो उसके हृदय में राष्ट्रप्रेम स्वतः अंकुरित हो जाता है। ऐसा व्यक्ति स्वप्न में भी देशद्रोह का विचार नहीं कर सकता। इसी पवित्र भावना से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है। इस अवस्था में नागरिक व्यक्तिगत स्वार्थ, सौदेबाजी और शर्तें त्यागकर, निःस्वार्थ भाव से केवल मातृभूमि के प्रति अपने पुनीत कर्तव्यों के पालन को ही अपना धर्म मानते हैं।
शीर्षक: मातृभूमि और राष्ट्रीय एकता / सच्चा स्वराज्य
(नियम: संक्षेपण मूल शब्द का लगभग 1/3 भाग होना चाहिए और इसमें अपनी ओर से कोई नई बात नहीं जोड़नी चाहिए।)
अथवा / OR
(2) पल्लवन (Expansion of Idea):
सूक्ति: “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”
भाव विस्तार: यह सुप्रसिद्ध उक्ति मनुष्य की मानसिक शक्ति, अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के महत्त्व को प्रतिपादित करती है। जीवन एक कुरुक्षेत्र है, जहाँ सुख-दुख, आशा-निराशा और जय-पराजय का द्वंद्व चलता रहता है। किसी भी कार्य में सफलता या असफलता का निर्णय रणभूमि में होने से पहले मनुष्य के ‘मन’ में होता है।
यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कितना भी बलवान और साधन संपन्न क्यों न हो, यदि वह मन से हताश हो जाए और पहले ही हार मान ले, तो उसकी पराजय निश्चित है। निराश मन उसे संघर्ष करने ही नहीं देगा। इसके विपरीत, यदि मन में उत्साह, दृढ़ संकल्प और विजय का विश्वास हो, तो साधनहीन, विकलांग और कमजोर व्यक्ति भी एवरेस्ट जैसी ऊंचाइयों को छू सकता है। गांधीजी, नेपोलियन, अब्राहम लिंकन और अरुणिमा सिन्हा जैसे व्यक्तित्वों ने अपने मनोबल के दम पर ही असंभव को संभव कर दिखाया। अतः सफलता की असली कुंजी बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि हमारे अपने मन के अटूट विश्वास में छिपी है। हमें सदैव सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, क्योंकि मनोबल ही सर्वोपरि बल है

4 Comments

  1. Ankit

    Kay aapna jo blue print class 10 rajsthan 2025-26 ke modal paper btaye hai kay assi modal paper aayga

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