अर्द्ध वार्षिक परीक्षा / Half Yearly Examination
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type)
प्र.1 संविधान सभा की पहली बैठक कब हुई?
1 Markप्र.2 वे कौनसे अधिकार हैं, जिनका हनन होने पर, व्यक्ति न्यायपालिका की शरण ले सकता है?
प्र.3 भारत में वयस्क मताधिकार की न्यूनतम आयु है –
प्र.4 राज्यपाल की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
प्र.5 भारत के सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार संबंधित है –
- मौलिक (Original): केंद्र-राज्य विवादों को सीधे सुलझाना।
- अपीलीय (Appellate): उच्च न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनना।
- सलाहकारी (Advisory): अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को कानूनी मामलों पर सलाह देना।
प्र.6 “द रिपब्लिक” पुस्तक के लेखक हैं –
प्र.7 ‘राजनीति ने हमें साँप की कुंडली की तरह जकड़ रखा है’, यह कथन किससे संबंधित है?
प्र.8 स्वतंत्रता से संबंधित ‘हानि सिद्धांत’ के प्रतिपादक हैं –
प्र.9 टी.एच. मार्शल ने नागरिकता में कौनसे अधिकार शामिल किए?
प्र.10 मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की गई है –
रिक्त स्थानों की पूर्ति (Detailed Context)
| Q.11 |
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसम्बर, 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया।
विवरण: यह प्रस्ताव संविधान का दर्शन था, जिसे बाद में ‘प्रस्तावना’ (Preamble) का रूप दिया गया।
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| Q.12 |
भारत की राष्ट्रीय विधायिका का नाम संसद (Parliament) है।
विवरण: भारतीय संसद द्विसदनीय है – लोकसभा (निचला सदन) और राज्यसभा (उच्च सदन)।
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| Q.13 |
निवारक नज़रबंदी अधिनियम के तहत नज़रबंदी अधिकतम 3 (तीन) महीने के लिए ही हो सकती है।
विवरण: अनुच्छेद 22(4) के अनुसार। इससे अधिक समय के लिए सलाहकार बोर्ड की अनुमति आवश्यक है।
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| Q.14 |
भारत का उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली में स्थित है।
विवरण: अनुच्छेद 130 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में बैठेगा।
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| Q.15 |
प्राचीन भारतीय समाज में न्याय धर्म (Dharma) के साथ जुड़ा हुआ था।
विवरण: प्राचीन भारत में, राजा का प्राथमिक कर्तव्य ‘धर्म’ की स्थापना करना और उसके अनुसार न्याय करना था।
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| Q.16 |
वे अधिकार जो हमें जन्म से प्राप्त हैं… प्राकृतिक (Natural) अधिकार कहलाते हैं।
विवरण: 17वीं-18वीं सदी के विचारकों (जैसे जॉन लॉक) ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार माना।
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| Q.17 |
सामाजिक न्याय हेतु ‘अज्ञानता का आवरण’ शब्दावली का प्रयोग जॉन रॉल्स (John Rawls) द्वारा किया गया।
विवरण: यह निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक वैचारिक प्रयोग (thought experiment) है।
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| Q.18 |
शरणार्थी और अवैध प्रवासियों को कोई राष्ट्र अपनी सदस्यता / नागरिकता (Membership/Citizenship) देने के लिए तैयार नहीं है।
विवरण: राज्य अपनी सीमाओं और संसाधनों की रक्षा के लिए नागरिकता को सीमित करते हैं।
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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Extended Answers)
प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे?
डॉ. भीमराव अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar)
प्रारूप समिति (Drafting Committee) का गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ था। इसका मुख्य कार्य संविधान का मसौदा तैयार करना था।
बंधुआ मजदूरी किस अधिकार द्वारा प्रतिबंधित है?
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23)
अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार और बेगार (जबरदस्ती श्रम) को प्रतिबंधित करता है।
‘फर्स्ट–पास्ट–द–पोस्ट’ प्रणाली क्या है?
यह वह चुनाव प्रणाली है जिसमें जिस प्रत्याशी को अन्य सभी से अधिक मत मिलते हैं (चाहे बहुमत न भी हो), उसे विजेता घोषित किया जाता है।
उदाहरण: भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव इसी पद्धति से होते हैं।
सरकार के अंग?
- विधायिका (Legislature): कानून बनाना।
- कार्यपालिका (Executive): कानूनों को लागू करना।
- न्यायपालिका (Judiciary): कानूनों की व्याख्या और विवाद सुलझाना।
मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति?
भारत के राष्ट्रपति द्वारा।
परंपरागत रूप से, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश (CJI) नियुक्त किया जाता है।
समानता के तीन आयाम?
- राजनीतिक: वोट देने का अधिकार।
- सामाजिक: भेदभाव का अभाव।
- आर्थिक: समान काम के लिए समान वेतन।
‘अहस्तक्षेप का लघुत्तम क्षेत्र’ क्या है?
नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty) के तहत, यह व्यक्ति का वह निजी क्षेत्र है जिसमें राज्य या बाहरी सत्ता को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह क्षेत्र ‘पवित्र’ माना जाता है।
अधिकार किसे कहते हैं?
अधिकार वे ‘हकदारियाँ’ या दावे हैं जिन्हें: (1) व्यक्ति अपने विकास के लिए जरूरी मानता है, (2) समाज वैध मानता है, और (3) राज्य कानून द्वारा संरक्षित करता है।
सार्वभौमिक नागरिकता का अर्थ?
इसका अर्थ है कि किसी देश के सभी वयस्क निवासियों को, चाहे उनका धर्म, जाति, लिंग या क्षेत्र कुछ भी हो, राज्य की पूर्ण और समान सदस्यता मिलनी चाहिए।
‘हिंद स्वराज’ के लेखक?
महात्मा गांधी
1909 में लिखित यह पुस्तक स्वराज (Self-rule) और आधुनिक सभ्यता पर गांधीजी के विचारों का प्रमुख दस्तावेज है।
लघु एवं निबंधात्मक प्रश्न (Comprehensive Explanations)
संविधान के कार्य (Functions of Constitution) – विस्तृत
संविधान किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
- 1. समन्वय और विश्वास: संविधान बुनियादी नियमों का एक समूह उपलब्ध कराता है जिससे समाज के विभिन्न वर्गों (धर्म, जाति) के बीच भरोसा और सहयोग बना रहे।
- 2. निर्णय लेने की शक्ति: यह तय करता है कि समाज में कानून बनाने की अंतिम शक्ति किसके पास होगी (जैसे- भारत में संसद)। यह सरकार के गठन की प्रक्रिया भी बताता है।
- 3. सरकार पर सीमाएँ: संविधान सरकार की शक्तियों को सीमित करता है ताकि वह तानाशाही न कर सके। ‘मौलिक अधिकार’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं, जिनका हनन सरकार भी नहीं कर सकती।
- 4. आकांक्षाओं को पूरा करना: यह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है जिससे वह जनता की आकांक्षाओं (जैसे गरीबी उन्मूलन, समानता) को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज बना सके।
भारतीय निर्वाचन आयोग के कार्य (Functions of Election Commission)
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग (Election Commission) एक स्वायत्त संस्था है। इसके प्रमुख कार्य हैं:
- 1. मतदाता सूची तैयार करना (Electoral Rolls): यह सुनिश्चित करना कि सभी पात्र नागरिकों के नाम सूची में हों और गलत नाम हटाए जाएं। यह हर चुनाव से पहले सूची अपडेट करता है।
- 2. चुनाव कार्यक्रम तय करना: चुनाव की घोषणा, नामांकन की तारीख, मतदान और मतगणना की तारीख तय करना आयोग का विशेषाधिकार है।
- 3. आचार संहिता (Model Code of Conduct): चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू करना ताकि सत्ताधारी दल सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग न कर सके।
- 4. दलों को मान्यता देना: राजनीतिक दलों को पंजीकृत करना और उन्हें राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल का दर्जा और चुनाव चिह्न (Election Symbols) आवंटित करना।
भारत में चुनाव की पद्धतियाँ (Election Methods in India)
भारत में लोकतंत्र के अलग-अलग स्तरों के लिए दो विशिष्ट चुनाव प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं:
1. फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (FPTP)
(सर्वाधिक मत से जीत की प्रणाली)
इस प्रणाली में पूरे देश को छोटे भौगोलिक क्षेत्रों (निर्वाचन क्षेत्रों) में बांटा जाता है। हर क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है। जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं (भले ही 50% से कम हों), वह जीत जाता है।
उपयोग: लोकसभा और विधानसभा चुनाव।
2. समानुपातिक प्रतिनिधित्व (PR)
(Proportional Representation)
यह एक जटिल प्रणाली है जिसमें एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) का उपयोग होता है। इसमें जीतने के लिए एक निश्चित कोटे (Quota) की आवश्यकता होती है। यह अल्पसंख्यकों को बेहतर प्रतिनिधित्व देता है।
उपयोग: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, और राज्यसभा चुनाव।
राष्ट्रपति के विशेषाधिकार (Discretionary Powers of President)
यद्यपि भारत का राष्ट्रपति एक संवैधानिक प्रमुख है जो मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करता है, फिर भी उसके पास कुछ विशेष स्थितियाँ हैं जहाँ वह स्व-विवेक का प्रयोग करता है:
-
1.
पुनर्विचार का अधिकार:
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की किसी भी सलाह को एक बार पुनर्विचार (Reconsideration) के लिए वापस लौटा सकता है। यह सरकार को अपनी गलती सुधारने का मौका देता है।
-
2.
वीटो शक्ति (जेबी वीटो / Pocket Veto):
संसद द्वारा पारित विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए। राष्ट्रपति विधेयक को न तो मंजूरी दे और न ही लौटाए, बल्कि अनिश्चित काल के लिए अपनी मेज पर रख ले, तो इसे पॉकेट वीटो कहते हैं (धन विधेयक को छोड़कर)।
-
3.
प्रधानमंत्री की नियुक्ति (त्रिशंकु संसद में):
जब चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो राष्ट्रपति अपने विवेक से निर्णय लेता है कि किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए जो सदन में विश्वास मत हासिल कर सके।
लोकसभा, राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली क्यों है?
संसदीय लोकतंत्र में, जनता द्वारा सीधे चुने गए सदन (लोकसभा) के पास अधिक शक्तियाँ होती हैं। इसके प्रमुख कारण हैं:
1. धन विधेयक (Money Bill) पर एकाधिकार
बजट या धन संबंधी विधेयक केवल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं। राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है या सुझाव दे सकती है, लेकिन लोकसभा उन सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
2. कार्यपालिका पर नियंत्रण (No Confidence Motion)
मंत्रीपरिषद केवल लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। सरकार को हटाने का प्रस्ताव (अविश्वास प्रस्ताव) केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है। राज्यसभा सरकार की आलोचना कर सकती है, लेकिन उसे हटा नहीं सकती।
3. संयुक्त अधिवेशन (Joint Session)
साधारण विधेयक पर मतभेद होने पर संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है। चूंकि लोकसभा की सदस्य संख्या (543) राज्यसभा (245) से दुगुनी से अधिक है, इसलिए लोकसभा की ही जीत होती है।
न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
परिभाषा: न्यायिक पुनरावलोकन न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता (Constitutional validity) की जाँच कर सकती है।
महत्व:
- यह संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखता है।
- यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखता है।
- यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।
परिणाम: यदि न्यायालय पाता है कि कोई कानून संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो वह उसे अवैध (Null and Void) घोषित कर सकता है और उसे लागू होने से रोक सकता है।
मानव अधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा (UDHR)
संदर्भ: 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने ‘मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ (Universal Declaration of Human Rights) को अपनाया।
उद्देश्य: द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद, विश्व समुदाय ने यह महसूस किया कि सभी मनुष्यों के कुछ बुनियादी अधिकार होते हैं जो किसी देश की सरकार द्वारा दिए नहीं जाते, बल्कि वे मनुष्य होने के नाते प्राप्त होते हैं।
महत्व: इसमें जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, और शिक्षा जैसे अधिकारों को शामिल किया गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का आधार है। इसी कारण 10 दिसंबर को प्रतिवर्ष ‘मानवाधिकार दिवस’ मनाया जाता है।
हम समानता को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं? (Promoting Equality)
समानता स्थापित करने के लिए सरकार और समाज तीन मुख्य रणनीतियाँ अपना सकते हैं:
- 1. औपचारिक समानता की स्थापना (Formal Equality): सबसे पहले, विशेषाधिकारों को समाप्त करना होगा। कानून और संविधान के माध्यम से धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को सख्ती से रोका जाना चाहिए। (जैसे- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14-18)।
- 2. विभेदक बर्ताव द्वारा समानता (Equality through Differential Treatment): कभी-कभी समान व्यवहार करना ही काफी नहीं होता। उदाहरण के लिए, विकलांगों के लिए रैंप बनाना या महिलाओं को रात की पाली में सुरक्षा देना। यह ‘अलग व्यवहार’ है लेकिन इसका उद्देश्य समानता लाना है।
- 3. सकारात्मक कार्यवाही (Affirmative Action): सदियों से शोषित और वंचित समुदायों (जैसे दलित, आदिवासी) के लिए केवल कानून बनाना काफी नहीं है। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण, छात्रवृत्ति और छात्रावास जैसी विशेष सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
भारत में नागरिकता प्राप्ति के प्रावधान (Modes of Acquiring Citizenship)
नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार भारतीय नागरिकता निम्नलिखित 5 तरीकों से प्राप्त की जा सकती है:
- जन्म से (By Birth): 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति (कुछ अपवादों के साथ) भारत का नागरिक होगा।
- वंश से (By Descent): भारत के बाहर जन्मा व्यक्ति यदि उसके जन्म के समय उसके माता या पिता भारतीय नागरिक थे।
- पंजीकरण द्वारा (By Registration): भारतीय मूल के व्यक्ति या भारतीय नागरिक से विवाह करने वाले व्यक्ति आवेदन करके नागरिकता पा सकते हैं (कुछ वर्षों के निवास के बाद)।
- देशीकरण द्वारा (By Naturalization): कोई विदेशी नागरिक जो लंबे समय (जैसे 12 वर्ष) से भारत में रह रहा हो और भारतीय भाषा जानता हो, वह आवेदन कर सकता है।
- क्षेत्र समाविष्टि द्वारा (By Incorporation of Territory): यदि कोई नया भू-भाग (जैसे पहले गोवा या सिक्किम) भारत का हिस्सा बनता है, तो वहां के निवासी अपने आप भारतीय नागरिक बन जाते हैं।
‘अधिकार राज्य की सत्ता पर प्रतिबंध लगाते हैं’ – व्याख्या
यह कथन सीमित सरकार (Limited Government) की अवधारणा को दर्शाता है।
- अधिकार राज्य (सरकार) को बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
- उदाहरण के लिए, ‘जीवन का अधिकार’ राज्य को यह आदेश देता है कि वह कानून की प्रक्रिया के बिना किसी की जान न ले।
- ‘वाक् स्वतंत्रता’ राज्य को रोकती है कि वह नागरिकों की आलोचना को न दबाए।
इस प्रकार, अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य जनता का रक्षक बने, न कि भक्षक। वे बहुमत की तानाशाही से अल्पसंख्यकों और व्यक्तियों की रक्षा करते हैं।
सामाजिक न्याय (Social Justice) – अवधारणा
अर्थ: सामाजिक न्याय का अर्थ है एक ऐसे समाज का निर्माण जहाँ संसाधनों, अवसरों और सम्मान का वितरण न्यायपूर्ण हो। यह केवल ‘कानून के समक्ष समानता’ तक सीमित नहीं है।
प्रमुख तत्व:
- जाति, धर्म, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का अंत।
- समाज के सबसे कमजोर और पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC/Women) को ऊपर उठाने के लिए विशेष प्रयास।
- संसाधनों (भूमि, धन) का ऐसा पुनर्वितरण जिससे आर्थिक असमानता कम हो।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय’ को प्रमुख लक्ष्य माना गया है।
रॉल्स का न्याय सिद्धांत (Rawls’ Theory of Justice)
अमेरिकी दार्शनिक जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक ‘A Theory of Justice’ में निष्पक्ष न्याय का सिद्धांत दिया।
अज्ञानता का आवरण (Veil of Ignorance)
रॉल्स कहते हैं कि यदि हमें समाज के लिए नियम बनाने को कहा जाए, तो हम अक्सर अपने हित (अमीर, गरीब, प्रतिभाशाली) के बारे में सोचते हैं।
लेकिन, अगर हम खुद को ‘अज्ञानता के आवरण’ में रखें—जहाँ हमें यह नहीं पता कि नए समाज में हमारा जन्म अमीर घर में होगा या गरीब, हम स्वस्थ होंगे या विकलांग—तो हम सबसे खराब स्थिति (Worst-off position) के बारे में सोचेंगे।
निष्कर्ष: इस डर से कि हम सबसे गरीब हो सकते हैं, हम ऐसे नियम बनाएंगे जो समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को भी अधिकतम लाभ और सुरक्षा दें। यही ‘निष्पक्ष न्याय’ है।
राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) – अर्थ एवं व्यवहार
राजनीतिक सिद्धांत क्या हैं?
यह उन अवधारणाओं (Concepts) और मूल्यों (Values) का व्यवस्थित अध्ययन है जो हमारे राजनीतिक जीवन को आकार देते हैं। यह स्वतंत्रता, समानता, न्याय, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता आदि का अर्थ स्पष्ट करता है और इनकी प्रासंगिकता की जाँच करता है। यह कौटिल्य, अरस्तु से लेकर गांधी और अम्बेडकर तक के विचारों का विश्लेषण करता है।
हमें इनको व्यवहार में कैसे लाना चाहिए?
- तर्कसंगत बहस (Debate): राजनीतिक सिद्धांत हमें सिखाता है कि हम अपने मत (Opinion) को तर्क के साथ रखें और दूसरों के तर्कों को सुनें।
- सहिष्णुता (Tolerance): हमें उन विचारों के प्रति भी सहिष्णु होना चाहिए जिनसे हम असहमत हैं।
- सक्रिय नागरिकता: केवल वोट देना काफी नहीं है; हमें अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
- पूर्वाग्रहों का त्याग: जाति या धर्म के आधार पर बने पूर्वाग्रहों को छोड़कर तार्किक सोच अपनानी चाहिए।
भारतीय संघवाद: शक्ति विभाजन (Distribution of Powers)
संविधान की 7वीं अनुसूची और अनुच्छेद 246 के तहत केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है:
मूलतः 97 विषय (अब 100)
राष्ट्रीय महत्व के विषय जिन पर केवल संसद कानून बना सकती है।
उदाहरण: रक्षा, विदेश मामले, रेलवे, बैंकिंग, संचार।
मूलतः 66 विषय (अब 61)
स्थानीय महत्व के विषय जिन पर राज्य विधानसभा कानून बनाती है।
उदाहरण: पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय शासन, जेल।
मूलतः 47 विषय (अब 52)
साझा हित के विषय। केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। विवाद पर केंद्र का कानून मान्य होगा।
उदाहरण: शिक्षा, वन, विवाह-तलाक, मजदूर संघ।
समानता के तीन आयाम (Three Dimensions of Equality) – विस्तृत
-
1. राजनीतिक समानता (Political Equality):
लोकतांत्रिक समाजों में इसका अर्थ है सभी सदस्यों को समान नागरिकता प्रदान करना। इसमें शामिल हैं:
- वोट देने का समान अधिकार (वयस्क मताधिकार)।
- चुनाव लड़ने और कोई भी सार्वजनिक पद पाने का अधिकार।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन बनाने का अधिकार।
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2. सामाजिक समानता (Social Equality):
इसका उद्देश्य समाज में जन्म, जाति, धर्म, रंग या लिंग के आधार पर भेदभाव को समाप्त करना है।
- सार्वजनिक स्थानों (होटल, कुएं, मंदिर) में प्रवेश की समानता।
- छुआछूत का अंत।
- समाज में सभी को समान गरिमा और महत्व मिलना।
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3. आर्थिक समानता (Economic Equality):
इसका अर्थ पूर्ण धन समानता नहीं है, बल्कि ‘अवसरों की समानता’ है।
- अमीर और गरीब के बीच की खाई कम होनी चाहिए।
- सभी को बुनियादी जरूरतें (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य) उपलब्ध होनी चाहिए।
- समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत।
मौलिक अधिकार एवं नीति-निर्देशक तत्व (Essay)
भारतीय संविधान के भाग-3 में 6 मौलिक अधिकार:
मूल संविधान में 7 अधिकार थे, लेकिन 44वें संशोधन (1978) द्वारा ‘संपत्ति के अधिकार’ को हटा दिया गया। वर्तमान में 6 अधिकार हैं:
अंतिम अधिकार (अनुच्छेद 32) सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अन्य अधिकारों को लागू करने की शक्ति देता है। डॉ. अम्बेडकर ने इसे ‘संविधान की आत्मा’ कहा था।
Or / अथवा मौलिक अधिकार (FR) vs नीति-निर्देशक तत्व (DPSP)
ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मिनर्वा मिल्स केस (1980) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान FR और DPSP के बीच ‘संतुलन’ पर टिका है। मौलिक अधिकार राजनीतिक लोकतंत्र लाते हैं, जबकि निर्देशक तत्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र लाते हैं।
| मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) | नीति-निर्देशक तत्व (DPSP) |
|---|---|
| न्यायसंगत (Justiciable): इनके हनन पर आप सीधे कोर्ट जा सकते हैं। सरकार इन्हें लागू करने के लिए बाध्य है। | गैर-न्यायसंगत (Non-Justiciable): इन्हें लागू न करने पर आप सरकार के खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकते। ये केवल नैतिक निर्देश हैं। |
| नकारात्मक (Negative): ये राज्य को कुछ काम करने से रोकते हैं (जैसे- भेदभाव मत करो)। | सकारात्मक (Positive): ये राज्य को कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते हैं (जैसे- शिक्षा दो, गरीबी हटाओ)। |
| व्यक्तिगत: ये व्यक्ति के कल्याण पर केंद्रित हैं। | सामुदायिक: ये पूरे समाज के कल्याण पर केंद्रित हैं। |
स्वतंत्रता और हानि सिद्धांत (Liberty & Harm Principle)
स्वतंत्रता क्या है?
स्वतंत्रता का अर्थ है ‘प्रतिबंधों का अभाव’ (Absence of constraints) और ‘आत्म-विकास के अवसरों की उपस्थिति’। इसका मतलब मनमानी करना नहीं, बल्कि बिना किसी बाधा के अपनी क्षमता का विकास करना है।
हानि सिद्धांत (J.S. Mill):
जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने निबंध ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने का एकमात्र उचित कारण बताया। उन्होंने कार्यों को दो भागों में बांटा:
- स्व-संबंधी कार्य (Self-regarding Actions): वे कार्य जिनका प्रभाव केवल कर्ता (करने वाले) पर पड़ता है। इसमें राज्य या समाज को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। (जैसे- मैं कौन से कपड़े पहनूं, कौन सी किताब पढूं)।
- पर-संबंधी कार्य (Other-regarding Actions): वे कार्य जिनका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। यदि इन कार्यों से दूसरों को ‘हानि’ (Harm) पहुँचती है, तभी राज्य हस्तक्षेप कर सकता है और स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। (जैसे- तेज आवाज़ में संगीत बजाना जिससे पड़ोसियों को परेशानी हो)।
Or / अथवा सकारात्मक vs नकारात्मक स्वतंत्रता
मुख्य प्रश्न: “वह कौन सा क्षेत्र है जहाँ मैं अपनी मर्जी का मालिक हूँ?”
- यह ‘प्रतिबंधों के अभाव’ पर जोर देती है।
- यह मानती है कि राज्य का हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए।
- यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘पवित्र क्षेत्र’ मानती है।
- उदाहरण: जीवन, संपत्ति और विचार की स्वतंत्रता।
मुख्य प्रश्न: “मेरा शासक कौन है? मैं या कोई और?”
- यह ‘अवसरों की उपलब्धता’ पर जोर देती है।
- यह मानती है कि केवल बंधनों का न होना ही काफी नहीं है, व्यक्ति को विकसित होने के लिए संसाधन (शिक्षा, स्वास्थ्य) चाहिए।
- यह राज्य के हस्तक्षेप का समर्थन करती है ताकि गरीबी और अज्ञानता हटे।
- विचारक: रूसो, मार्क्स, गांधी।