कक्षा 12वीं इतिहास नोट्स: अध्याय 4 – विचारक, विश्वास और इमारतें – CBSE/RBSE/NCERT/RSCERT

कक्षा 12वीं इतिहास नोट्स: अध्याय 4 – विचारक, विश्वास और इमारतें – CBSE/RBSE/NCERT/RSCERT
अध्याय 4 – विचारक, विश्वास और इमारतें

अध्याय 4 – विचारक, विश्वास और इमारतें (लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.)

यह काल (c. 600 BCE – 600 CE), जिसे प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व का मध्य भाग भी कहा जाता है, विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण वैचारिक मोड़ माना जाता है। इस दौरान दार्शनिकों [philosophers] ने अस्तित्व [existence] और ब्रह्मांडीय व्यवस्था [cosmic order] के रहस्यों को समझने के गहन प्रयास किए। इन विचारों को मौखिक परंपराओं, लिखित ग्रंथों, और वास्तुकला [architecture] तथा मूर्तिकला [sculpture] जैसे भौतिक रूपों में व्यक्त किया गया।

संवादात्मक विकास: बौद्ध धर्म, जैन धर्म और ब्राह्मणवादी परंपराएं अकेले विकसित नहीं हुईं; वे एक-दूसरे के साथ निरंतर तर्क-वितर्क [debates] और संवादों [dialogues] के माध्यम से विकसित हुईं, जिससे एक समृद्ध बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ।

ऐतिहासिक स्रोत: इस काल को समझने के लिए इतिहासकार बौद्ध ग्रंथों (जैसे त्रिपिटक), जैन ग्रंथों (जैसे आगम साहित्य), और ब्राह्मणवादी ग्रंथों (जैसे उपनिषद, पुराण, धर्मसूत्र) का उपयोग करते हैं। इसके अलावा, साँची और अमरावती जैसे स्मारकों [monuments], मूर्तियों, और अभिलेखों [inscriptions] से भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

1. साँची: संरक्षण और पुरातात्विक महत्व

साँची का महास्तूप

स्थान: साँची कनकखेड़ा [Sanchi Kanakhera], भोपाल (मध्य प्रदेश) के पास एक पहाड़ी पर स्थित है, जो बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक है।

खोज और संरक्षण का इतिहास

प्रारंभिक रुचि (19वीं शताब्दी): 1818 में एक ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर द्वारा खोजे जाने के बाद, इन खंडहरों ने यूरोपीय विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया। अलेक्जेंडर कनिंघम [Alexander Cunningham], जो बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर-जनरल बने, ने यहाँ कई सप्ताह बिताकर व्यापक सर्वेक्षण किया, रेखाचित्र बनाए और अभिलेखों का अनुवाद किया।

विदेशी मांग और संरक्षण: 19वीं सदी में फ्रांसीसी और कुछ अंग्रेज, दोनों ही साँची के सर्वोत्तम संरक्षित पूर्वी तोरण द्वार [eastern gateway] को अपने-अपने देशों के संग्रहालयों में ले जाना चाहते थे।

भोपाल की बेगमों का निर्णायक योगदान: भोपाल की शासिकाओं, शाहजहाँ बेगम [Shahjehan Begum] और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तान जहाँ बेगम [Sultan Jehan Begum], ने विवेकपूर्ण निर्णय लिए। उन्होंने यूरोपीय लोगों को प्लास्टर-कास्ट की सटीक प्रतियों [plaster-cast copies] से संतुष्ट किया, जिससे मूल तोरण द्वार स्थल पर ही बना रहा। उन्होंने स्थल के संरक्षण [preservation] के लिए भी महत्वपूर्ण धन प्रदान किया।

जॉन मार्शल और ASI का योगदान:

प्रसिद्ध पुरातत्वविद् सर जॉन मार्शल [Sir John Marshall], जो ASI के डायरेक्टर-जनरल थे, ने साँची पर अपने महत्वपूर्ण अकादमिक खंड सुल्तान जहाँ को समर्पित किए, जिन्होंने स्थल पर एक संग्रहालय और अतिथि गृह के निर्माण के लिए भी धन दिया था।

महत्व: साँची का बचना उसके सौभाग्य (रेलवे ठेकेदारों और बिल्डरों की नजर से बचना) और भोपाल की बेगमों तथा ASI द्वारा लिए गए बुद्धिमान संरक्षण निर्णयों का परिणाम था। आज यह आरंभिक बौद्ध धर्म [early Buddhism] के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है और भारत में पुरातात्विक संरक्षण के सफलतम उदाहरणों में से एक है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल: साँची को 1989 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था, जो इसके सार्वभौमिक सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देता है।
  • अशोक का व्यक्तिगत संबंध: बौद्ध ग्रंथ ‘महावंस’ के अनुसार, सम्राट अशोक ने साँची में मूल स्तूप का निर्माण करवाया था। उनका इस स्थान से गहरा संबंध था क्योंकि उनकी पत्नी, देवी, पास के शहर विदिशा की एक व्यापारी की बेटी थीं, और कहा जाता है कि अशोक ने उनसे यहीं विवाह किया था।
  • संरचनात्मक विकास: अशोक द्वारा निर्मित मूल स्तूप (ईंटों का बना) छोटा था। शुंग काल (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.) में इसे पत्थर से ढककर लगभग दोगुना बड़ा कर दिया गया और इसके चारों ओर वेदिका (रेलिंग) का निर्माण किया गया। तोरण द्वार सातवाहन काल (लगभग पहली शताब्दी ई.पू.) में जोड़े गए।
  • तीन मुख्य स्तूप: साँची में तीन मुख्य स्तूप हैं। महास्तूप (स्तूप संख्या 1) में बुद्ध के अवशेष थे। स्तूप संख्या 2 में अशोककालीन बौद्ध धर्म प्रचारकों के अवशेष हैं। स्तूप संख्या 3 में बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों, सारिपुत्त और महामोग्गलान के अवशेष रखे गए थे, जो इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को और पुष्ट करता है।
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2. वैचारिक पृष्ठभूमि: यज्ञ, प्रश्न और बहसें

2.1 वैश्विक मोड़ का काल (Mid-first millennium BCE)

यह काल गंगा घाटी में नए राज्यों [new kingdoms] और शहरों के विकास तथा सामाजिक-आर्थिक जीवन में हो रहे बदलावों का साक्षी था। यह एक गहन वैचारिक मंथन का दौर था। इतिहासकार इसे ‘एक्सियल एज’ (Axial Age) भी कहते हैं।

विश्व स्तर पर प्रमुख विचारक: यह केवल भारत तक सीमित नहीं था। इसी दौर में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में कोंग ज़ी (कन्फ्यूशियस), ग्रीस में सुकरात, प्लेटो और अरस्तू, तथा भारत में महावीर और गौतम बुद्ध जैसे चिंतकों ने मानवता के सबसे गहरे सवालों पर विचार किया। इन सभी ने जीवन के अर्थ, व्यक्ति और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के बीच संबंध को समझने का प्रयास किया।

2.2 यज्ञ की वैदिक परंपरा

चिंतन की यह नई धाराएँ पुरानी वैदिक परंपरा के संदर्भ में विकसित हुईं, जो ऋग्वेद [Rigveda] (c. 1500–1000 BCE) पर आधारित थी।

उद्देश्य: ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र, सोम जैसे कई देवताओं की स्तुति में भजन (hymns) हैं। इन यज्ञों के दौरान लोग मवेशी, पुत्र, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु जैसी भौतिक कामनाओं के लिए प्रार्थना करते थे।

यज्ञों का विकास: प्रारंभ में, यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे। बाद में (उत्तर वैदिक काल, c. 1000 BCE–500 BCE), यह परंपरा अधिक जटिल हो गई और कुछ यज्ञ घर के मुखिया द्वारा अपने परिवार के कल्याण के लिए व्यक्तिगत रूप से किए जाने लगे। राजसूय [rajasuya] और अश्वमेध [ashvamedha] जैसे अधिक जटिल और भव्य यज्ञ केवल राजा या सरदार ही कर सकते थे, जिन्हें करने के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।

2.3 नए प्रश्न और वैचारिक बहसें

उपनिषदों [Upanishads] (c. 6th century BCE से रचित) में इन यज्ञों के महत्व पर सवाल उठने लगे। इन ग्रंथों में जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना, पुनर्जन्म [rebirth], और कर्म [karma] (व्यक्ति के पिछले कर्मों का उसके वर्तमान और भविष्य पर प्रभाव) जैसे दार्शनिक विषयों पर गहन चिंतन मिलता है।

ज्ञान की खोज: ये चिंतक परम सत्य [ultimate reality] की प्रकृति (ब्रह्म [Brahman]) और व्यक्ति की आत्मा [Atman] के बीच संबंध को समझने का प्रयास कर रहे थे।
बहस का महत्व: बौद्ध ग्रंथों में 64 तक संप्रदायों [sects] का उल्लेख है, जो जीवंत बौद्धिक बहसों को दर्शाता है। शिक्षक अपने दर्शन के अनुयायी बनाने के लिए यात्रा करते थे और कुटागारशाला [kutagarashala] (नुकीली छत वाली झोपड़ी) या उपवनों [groves] में सजीव चर्चाएँ [lively discussions] करते थे।
वेदों के प्रभुत्व को चुनौती

महावीर और बुद्ध जैसे विचारकों ने वेदों के अधिकार [authority of the Vedas] पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्ति अपने प्रयासों से सांसारिक दुखों से मुक्ति [liberation] पा सकता है। यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विपरीत था, जहाँ व्यक्ति की स्थिति जन्म के आधार पर निर्धारित होती थी। इसे ही व्यक्तिगत अभिकरण [individual agency] पर जोर देना कहा जाता है।

2.4 वैकल्पिक परंपराएँ: नियतिवाद और भौतिकवाद

इन परंपराओं के ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इनकी जानकारी हमें मुख्य रूप से बौद्ध और जैन ग्रंथों से मिलती है।

आजीविक (Ajivikas – नियतिवादी): इसके संस्थापक मक्खलि गोसाल [Makkhali Gosala] थे। उनका मानना था कि सब कुछ पूर्वनिर्धारित [predetermined] है (नियति [Niyati])। व्यक्ति के कर्मों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि सुख और दुख की मात्रा पहले से ही तय है।

लोकायत (Lokayatas – भौतिकवादी): इन्हें भौतिकवादी माना जाता है। अजित केसकम्बलिन् [Ajita Kesakambalin] जैसे विचारकों ने दावा किया कि दान, यज्ञ या परलोक जैसी कोई चीज नहीं है। मानव शरीर चार तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से बना है, और मृत्यु पर ये तत्व विघटित [disintegrate] हो जाते हैं। उन्होंने परोपकार और त्याग की बात को “मूर्खों का सिद्धांत” [doctrine of fools] कहकर खारिज कर दिया।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • उपनिषद का अर्थ और अवधारणा: ‘उपनिषद’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘समीप बैठना’। यह गुरु के चरणों के पास बैठकर प्राप्त किए गए गूढ़ ज्ञान को संदर्भित करता है। इन्हें ‘वेदांत’ (वेदों का अंत) भी कहा जाता है क्योंकि वे वैदिक कर्मकांडों से हटकर ज्ञान और दर्शन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) और ‘तत्त्वमसि’ (वह तुम हो) जैसे महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हैं।
  • श्रमण परंपरा बनाम ब्राह्मण परंपरा: ‘श्रमण’ का अर्थ है ‘जो श्रम करता है’ (आध्यात्मिक मुक्ति के लिए)। यह एक व्यापक आंदोलन था जिसमें बौद्ध, जैन, आजीविक और कई अन्य चिंतक शामिल थे। यह परंपरा ब्राह्मणवादी यज्ञ-केंद्रित, जन्म-आधारित वर्ण व्यवस्था और वेदों के अधिकार का विरोध करती थी। श्रमणों ने तपस्या, ध्यान, अहिंसा और व्यक्तिगत प्रयास से मोक्ष पर जोर दिया।
  • छः आस्तिक दर्शन (षड्दर्शन): ब्राह्मणवादी परंपरा के भीतर भी, यज्ञों से परे दार्शनिक चिंतन विकसित हुआ, जो छः रूढ़िवादी दर्शनों में संहिताबद्ध हुआ: सांख्य (कपिल), योग (पतंजलि), न्याय (गौतम), वैशेषिक (कणाद), पूर्व मीमांसा (जैमिनी), और उत्तर मीमांसा या वेदांत (बादरायण)। ये सभी दर्शन वेदों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं।

3. जैन धर्म: अहिंसा और तपस्या का मार्ग

तीर्थंकर: जैन परंपरा के अनुसार, महावीर अंतिम तीर्थंकर थे। तीर्थंकर [tirthankaras] वे शिक्षक होते हैं जो पुरुषों और महिलाओं को अस्तित्व की नदी के पार मार्गदर्शन करते हैं। वर्धमान महावीर [Vardhamana Mahavira] (c. 6th century BCE) को 24वाँ और अंतिम तीर्थंकर माना जाता है।

मूल दर्शन: जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि पूरा संसार सजीव [animated] है; यहाँ तक कि पत्थर, चट्टानों और पानी में भी जीवन होता है। अहिंसा [Non-injury], यानी जीवित प्राणियों को चोट न पहुँचाना, जैन दर्शन का केंद्रीय तत्व है। पुनर्जन्म का चक्र कर्म द्वारा निर्धारित होता है, और कर्म के बंधन से मुक्ति [liberation] के लिए कठोर तपस्या [asceticism] और प्रायश्चित [penance] आवश्यक है। मोक्ष प्राप्ति के लिए संसार का त्याग (संन्यास) अनिवार्य माना गया है।

पाँच महाव्रत (Five Vows)

जैन साधुओं और साध्वियों के लिए पाँच व्रत अनिवार्य हैं: हत्या न करना (अहिंसा), चोरी न करना (अस्तेय), झूठ न बोलना (सत्य), ब्रह्मचर्य [celibacy] का पालन करना, और संपत्ति का त्याग करना (अपरिग्रह)।

📚 अतिरिक्त जानकारी: जैन धर्म का प्रसार

जैन धर्म धीरे-धीरे भारत के कई हिस्सों में फैल गया। बौद्ध धर्म की तरह, जैन विद्वानों ने भी प्राकृत, संस्कृत और तमिल जैसी विभिन्न भाषाओं में साहित्य की रचना की। इन ग्रंथों को सदियों तक मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में पांडुलिपियों के रूप में सावधानीपूर्वक संरक्षित किया गया।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • दिगंबर और श्वेतांबर: महावीर की मृत्यु के लगभग दो सौ साल बाद, मगध में पड़े भीषण अकाल के कारण जैन संघ में विभाजन हो गया। भद्रबाहु के नेतृत्व में कई भिक्षु दक्षिण भारत चले गए, जबकि स्थूलभद्र के नेतृत्व में कुछ मगध में ही रहे। जब दक्षिण से भिक्षु लौटे, तो उनके बीच मतभेद पैदा हो गए। जो वस्त्रों का पूर्ण त्याग करते थे, वे दिगंबर (‘आकाश-वस्त्रधारी’) कहलाए, और जो सफेद वस्त्र पहनते थे, वे श्वेतांबर (‘श्वेत-वस्त्रधारी’) कहलाए।
  • त्रिरत्न और स्याद्वाद: जैन धर्म में मोक्ष का मार्ग तीन सिद्धांतों पर आधारित है, जिन्हें त्रिरत्न कहा जाता है: सम्यक् दर्शन (सही विश्वास), सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान), और सम्यक् चरित्र (सही आचरण)। इसके अलावा, जैन दर्शन स्याद्वाद (सापेक्षता का सिद्धांत) और अनेकांतवाद (अनेक दृष्टिकोणों का सिद्धांत) के लिए जाना जाता है, जो यह मानता है कि सत्य जटिल है और इसे किसी एक दृष्टिकोण से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
  • प्रथम तीर्थंकर और जैन संगीतियाँ: प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (या आदिनाथ) थे, जिनका उल्लेख ऋग्वेद जैसे ब्राह्मणवादी ग्रंथों में भी मिलता है। दो प्रमुख जैन संगीतियाँ हुईं: पहली पाटलिपुत्र में (जिसमें श्वेतांबरों ने भाग लिया और 12 अंगों का संकलन किया) और दूसरी वल्लभी (गुजरात) में (512 ई. में), जहाँ जैन ग्रंथों को अंतिम रूप से संकलित किया गया।
  • संरक्षण और प्रमुख केंद्र: जैन धर्म को मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग के राजा खारवेल और पश्चिमी भारत के चालुक्य वंश जैसे शासकों से संरक्षण प्राप्त हुआ। कर्नाटक में श्रवणबेलगोला, राजस्थान में माउंट आबू (दिलवाड़ा मंदिर), और गुजरात में पालिताना प्रमुख जैन तीर्थ स्थल हैं।

4. बौद्ध धर्म: मध्यम मार्ग और धम्म

सिद्धार्थ से बुद्ध तक

सिद्धार्थ [Siddhartha], जो बाद में बुद्ध कहलाए, शाक्य कबीले के मुखिया के पुत्र थे। उन्हें जीवन के कठोर सत्यों से दूर एक সুরক্ষিত महल में पाला गया था।

चार महान दृश्य: महल के बाहर अपनी पहली यात्रा के दौरान उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक शव, और अंत में एक शांत और संतुष्ट संन्यासी [homeless mendicant] को देखा। इन दृश्यों ने उन्हें मानवीय पीड़ा और जीवन की क्षणभंगुरता [transience of life] का गहरा एहसास कराया, जिससे उन्होंने सत्य की खोज में महल छोड़ने का निर्णय लिया।

ज्ञान (Enlightenment): कई वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद उन्हें लगा कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना सही मार्ग नहीं है। उन्होंने मध्य मार्ग [path of moderation] अपनाया और बोधगया में एक पीपल के पेड़ (बोधि वृक्ष) के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद वे बुद्ध (प्रबुद्ध व्यक्ति) कहलाए और अपना शेष जीवन धम्म, यानी धर्म के मार्ग का उपदेश देते हुए बिताया।

4.1 बुद्ध की शिक्षाएँ (सुत्त पिटक से संकलित)

बुद्ध ने चमत्कारों या अलौकिक शक्तियों के बजाय तर्क और विवेक [reason and persuasion] पर जोर दिया।

चार आर्य सत्य (Four Noble Truths): (1) संसार में दुःख (dukkha) है, (2) हर दुःख का कारण (इच्छा और लालसा) है, (3) दुःख का निवारण संभव है, (4) इस निवारण का एक मार्ग है (अष्टांगिक मार्ग)।

मूल दर्शन:

  • क्षणिकवाद (Anicca): संसार नित्य परिवर्तनशील है, कुछ भी स्थायी नहीं है।
  • अनात्मन (Anatta): संसार में कोई स्थायी, अविनाशी आत्मा या सार [essence] नहीं है।
  • दुःख (Dukkha): दुःख मानवीय अस्तित्व का एक अंतर्निहित हिस्सा है।

मुक्ति (Nibbana): अहंकार [ego] और इच्छा [desire] को समाप्त करके दुःखों के चक्र से मुक्ति पाना ही निब्बान है। यह व्यक्तिगत प्रयास [individual effort] से ही संभव है।

नैतिकता: बुद्ध ने सामाजिक जगत को दैवीय नहीं, बल्कि मानव निर्मित [human creation] माना। इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को अधिक मानवीय और नैतिक होने की सलाह दी। उन्होंने सभी प्राणियों के प्रति करुणा [karuna] (दया) और मेत्ता [metta] (आपसी सद्भाव) पर जोर दिया।

4.2 बौद्ध ग्रंथ: त्रिपिटक

बुद्ध ने मौखिक रूप से शिक्षा दी। उनकी मृत्यु के बाद, उनके शिष्यों ने वैशाली में एक परिषद (बुजुर्ग भिक्षुओं की सभा) में उनकी शिक्षाओं को संकलित किया।

त्रिपिटक (Tipitaka – Three Baskets):

  • विनय पिटक: संघ (मठवासी व्यवस्था) में रहने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियम और विनियम।
  • सुत्त पिटक: बुद्ध की मुख्य शिक्षाएँ और संवाद।
  • अभिधम्म पिटक: धर्म के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विषय।

भाषा और प्रसार: सबसे पुराने ग्रंथ पाली [Pali] में हैं; बाद में संस्कृत में भी ग्रंथ रचे गए। फा शियान [Fa Xian] और ह्वेन त्सांग [Xuan Zang] जैसे चीनी तीर्थयात्रियों ने भारत से बौद्ध ग्रंथों को एकत्र किया और उनके अनुवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

4.3 संघ: संगठन और सामाजिक समावेश

संघ [Sangha] बुद्ध द्वारा स्थापित एक संगठन था जिसमें धम्म के शिक्षक (भिक्खु) रहते थे।

प्रवेश और समानता: शुरुआत में केवल पुरुषों को अनुमति थी। बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद [Ananda] के आग्रह पर, उन्होंने महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति दी। बुद्ध की सौतेली माँ, महाप्रजापति गौतमी [Mahapajapati Gotami], पहली भिक्खुनी [bhikkhuni] बनीं।

थेरीगाथा: यह सुत्त पिटक का एक अनूठा हिस्सा है, जिसमें भिक्खुनियों द्वारा रचे गए श्लोक हैं, जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा और उपलब्धियों को दर्शाते हैं।

सामाजिक संरचना: संघ की कार्यप्रणाली गणों और संघों की परंपरा पर आधारित थी, जहाँ निर्णय आपसी सहमति से लिए जाते थे। संघ में राजा, धनी, गरीब, दास, और शिल्पकार जैसे विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल हुए। एक बार संघ में शामिल होने के बाद, सभी पुरानी सामाजिक पहचानों को त्याग दिया जाता था, और वे आध्यात्मिक रूप से समान माने जाते थे।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path): यह दुःख निरोध का मार्ग है, जिसमें आठ तत्व शामिल हैं: सम्यक् दृष्टि (सही समझ), सम्यक् संकल्प (सही इरादा), सम्यक् वाणी (सही वचन), सम्यक् कर्म (सही कार्य), सम्यक् आजीविका (सही जीविका), सम्यक् व्यायाम (सही प्रयास), सम्यक् स्मृति (सही सजगता), और सम्यक् समाधि (सही एकाग्रता)।
  • प्रतीत्यसमुत्पाद (Dependent Origination): यह बौद्ध धर्म का एक केंद्रीय और गहन सिद्धांत है, जो बताता है कि सभी सांसारिक घटनाएँ कारणों और स्थितियों की एक श्रृंखला पर निर्भर होकर उत्पन्न होती हैं। कुछ भी स्वतंत्र या स्थायी रूप से अस्तित्व में नहीं है। इसका सार है: “इसके होने से यह होता है; इसके न होने से यह नहीं होता।”
  • बौद्ध संगीतियाँ (Councils): बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षाओं को संरक्षित और मानकीकृत करने के लिए चार प्रमुख बौद्ध संगीतियाँ हुईं। पहली संगीति राजगृह में (अजातशत्रु के संरक्षण में) हुई, जिसमें सुत्त और विनय पिटक का संकलन हुआ। दूसरी संगीति वैशाली में (कालाशोक के संरक्षण में) हुई। तीसरी संगीति पाटलिपुत्र में (अशोक के संरक्षण में) हुई, जिसमें अभिधम्म पिटक जोड़ा गया। चौथी संगीति कश्मीर में (कनिष्क के संरक्षण में) हुई, जिसमें महायान संप्रदाय का उदय स्पष्ट हुआ।

5. स्तूप: पवित्र टीले

5.1 उत्पत्ति और उद्देश्य

प्राचीन काल से ही कुछ स्थानों को पवित्र माना जाता था, जिन्हें चैत्य (Chaityas) कहा जाता था। इनमें अनोखी चट्टानें, पेड़ या अंत्येष्टि टीले [funerary mounds] शामिल थे।

स्तूप [Stupas] ऐसे पवित्र टीले हैं जहाँ बुद्ध से जुड़े अवशेष [relics] (जैसे उनके शारीरिक अवशेष या उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुएँ) दफनाए गए थे। समय के साथ, स्तूप बुद्ध और बौद्ध धर्म दोनों के प्रतीक बन गए।

अशोक का योगदान: बौद्ध ग्रंथ अशोकावदान [Ashokavadana] के अनुसार, सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को महत्वपूर्ण शहरों में वितरित किया और उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया। भरहुत, साँची और सारनाथ के स्तूप इसी काल के माने जाते हैं।

5.2 निर्माण और संरचना

स्तूप की वास्तुकला

स्तूप की संरचना एक साधारण अर्ध-गोलाकार मिट्टी के टीले से विकसित हुई, जिसे बाद में और अधिक जटिल बनाया गया।

संरचनात्मक तत्व:

  • अंडा (Anda): स्तूप का अर्ध-वृत्ताकार मिट्टी का टीला, जो पृथ्वी का प्रतीक है।
  • हर्मिका (Harmika): अंडा के शिखर पर देवताओं के निवास का प्रतीक एक छज्जे जैसी संरचना।
  • यष्टि और छतरी (Yashti and Chhatri): हर्मिका से निकलने वाला एक मस्तूल (yashti) जिसके ऊपर एक, दो या तीन छत्रियाँ (chhatri) होती थीं, जो बुद्ध, धम्म और संघ का प्रतीक थीं।
  • रेलिंग और तोरण द्वार (Railing and Gateway): टीले को घेरने वाली एक वेदिका (रेलिंग) पवित्र स्थान को सामान्य दुनिया से अलग करती थी। चार प्रमुख दिशाओं में भव्य तोरण द्वार बनाए जाते थे।

पूजा विधि: उपासक पूर्वी तोरण द्वार से प्रवेश करते थे और स्तूप के चारों ओर दक्षिणावर्त दिशा [clockwise direction] में परिक्रमा (प्रदक्षिणा [pradakshina]) करते थे, जो आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण करता था।

वित्त पोषण: स्तूपों के निर्माण के लिए दान राजाओं (जैसे सातवाहन), श्रेणियों (जैसे हाथीदाँत का काम करने वाले शिल्पकार), और आम पुरुषों तथा महिलाओं द्वारा दिया जाता था, जिसका उल्लेख अक्सर अभिलेखों में मिलता है।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • जातक कथाओं का चित्रण: स्तूपों की वेदिकाओं और तोरण द्वारों पर अक्सर जातक कथाओं के दृश्य उकेरे जाते थे। जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं, जिनमें वे विभिन्न पशु-पक्षियों या मनुष्यों के रूप में जन्म लेकर परोपकार के कार्य करते थे। ये कहानियाँ आम लोगों को नैतिक शिक्षा देने का एक लोकप्रिय माध्यम थीं।
  • चैत्य और विहार: स्तूपों के अलावा, बौद्ध वास्तुकला में दो अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएँ हैं: चैत्य (पूजा-हॉल, अक्सर एक छोर पर स्तूप के साथ) और विहार (भिक्षुओं के रहने के लिए मठ)। ये संरचनाएँ अक्सर चट्टानों को काटकर बनाई जाती थीं, जैसे कि अजंता, एलोरा और कार्ले की गुफाएँ।
  • स्तूप के प्रकार: स्तूपों को उनमें रखे अवशेषों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है: शारीरिक स्तूप (बुद्ध या किसी अर्हत के शारीरिक अवशेषों पर), पारिभोगिक स्तूप (बुद्ध द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं पर, जैसे भिक्षापात्र), और उद्देशिक स्तूप (बुद्ध के जीवन की घटनाओं से जुड़े स्थानों पर स्मारक के रूप में)।
  • स्तूप का ब्रह्मांडीय प्रतीकवाद: स्तूप की संरचना को ब्रह्मांड के एक मॉडल के रूप में भी देखा जाता है। इसका आधार पृथ्वी का, गुंबद (अंडा) आकाश का, और यष्टि विश्व की धुरी (Axis Mundi) का प्रतीक है जो पृथ्वी को स्वर्ग से जोड़ती है।

6. अमरावती और संरक्षण की नैतिकता

अमरावती की खोज: 1796 में, एक स्थानीय राजा ने अमरावती (आंध्र प्रदेश) में एक मंदिर बनाने के लिए स्तूप के खंडहरों का उपयोग करने का प्रयास किया। इसके बाद, 1854 में, गुंटूर के कमिश्नर वाल्टर इलियट [Walter Elliot] ने स्थल का दौरा किया और कई मूर्तिकला पैनलों को अपने साथ मद्रास ले गए (जिन्हें आज “इलियट मार्बल्स” कहा जाता है)।

विनाश और संरक्षण की बहस

1850 के दशक तक, अमरावती के नक्काशीदार स्लैबों को कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, मद्रास में इंडिया ऑफिस और लंदन के संग्रहालयों में ले जाया जा रहा था। इस प्रक्रिया में अमरावती का स्तूप अपनी पूरी महिमा से वंचित हो गया।

पुरातत्वविद् एच.एच. कोल [H.H. Cole] ने इस नीति का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कलाकृतियों को उनके मूल स्थान से हटाना एक “आत्मघाती और अक्षम्य नीति” है। उन्होंने दृढ़ता से इन सीटू [in situ] (कलाकृतियों को उनके मूल स्थान पर संरक्षित करना) की वकालत की।

साँची का अस्तित्व: सौभाग्य से, साँची 1818 में खोजा गया था, जब संरक्षण की नीतियाँ बेहतर हो रही थीं। इसके तोरण द्वार स्थल पर ही बने रहे, जबकि अमरावती का महाचैत्य अब केवल एक छोटा टीला मात्र है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • सातवाहन और इक्ष्वाकु वंश का संरक्षण: अमरावती का स्तूप सातवाहन शासकों के संरक्षण में फला-फूला। बाद में उनके उत्तराधिकारी, इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने भी इसका विस्तार करवाया। यह साँची से भी बड़ा और अधिक भव्य माना जाता था, और इसकी वेदिका सफेद संगमरमर की बनी थी जिस पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं के दृश्य उत्कृष्ट रूप से उकेरे गए थे।
  • महायान केंद्र और कला शैली: अमरावती महायान बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था, और इसकी कला में बोधिसत्वों का चित्रण प्रमुखता से मिलता है। इसकी कला शैली की विशेषता है- आकृतियों की त्रिभंग मुद्रा (शरीर का तीन स्थानों से मुड़ना), गतिशीलता और कथात्मक दृश्यों का प्रभावी चित्रण, जहाँ अक्सर एक ही पैनल में कहानी के कई दृश्यों को एक साथ दिखाया जाता है।
  • कलाकृतियों का वर्तमान स्थान और प्रभाव: आज, अमरावती की अधिकांश उत्कृष्ट मूर्तियां ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन और सरकारी संग्रहालय, चेन्नई में प्रदर्शित हैं। अमरावती कला शैली का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेष रूप से श्रीलंका और जावा (इंडोनेशिया) की बौद्ध कला पर भी दिखाई देता है।

7. मूर्तिकला और प्रतीकात्मकता

7.1 बुद्ध का प्रतीकात्मक चित्रण

प्रारंभिक बौद्ध कला में, मूर्तिकारों ने बुद्ध को सीधे मानव रूप में चित्रित करने से परहेज किया। इसके बजाय, उन्होंने उनकी उपस्थिति को दर्शाने के लिए विभिन्न प्रतीकों का उपयोग किया:

  • खाली सीट (रिक्त सिंहासन): बुद्ध के ध्यान और ज्ञान की अवस्था को दर्शाती है।
  • स्तूप: उनके महापरिनिब्बान [mahaparinibbana] (मृत्यु के बाद अंतिम मुक्ति) का प्रतीक है।
  • धर्म चक्र (पहिया): सारनाथ में दिए गए उनके पहले उपदेश का प्रतीक है।
  • बोधिवृक्ष: जिस पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान [enlightenment] प्राप्त हुआ।

7.2 लोकप्रिय रूपांकन और परंपराएँ

स्तूपों पर मिली कई मूर्तियाँ सीधे बौद्ध विचारों से प्रेरित नहीं थीं, बल्कि उस समय की लोकप्रिय मान्यताओं और परंपराओं को दर्शाती थीं।

शालभंजिका (Shalabhanjika): यह एक सुंदर स्त्री की मूर्ति है जो एक पेड़ की डाली को पकड़े हुए है। यह एक शुभ प्रतीक [auspicious symbol] मानी जाती थी, और माना जाता था कि उसके स्पर्श से पेड़ में फूल और फल लग जाते हैं।
जानवर: हाथियों (शक्ति और ज्ञान का प्रतीक), घोड़ों, बंदरों और गायों को अक्सर सजीव दृश्यों [lively scenes] को चित्रित करने के लिए उकेरा गया था, जिनमें से कई जातक कथाओं से लिए गए थे।
गजलक्ष्मी (Gajalakshmi): यह सौभाग्य की देवी हैं, जिन्हें अक्सर दो हाथियों द्वारा जल अभिषेक करते हुए दिखाया गया है। यह प्रतीक बौद्ध और जैन स्मारकों पर भी पाया जाता है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • कला के तीन प्रमुख केंद्र (शैलियाँ): इस काल में मूर्तिकला की तीन प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं: गांधार, मथुरा और अमरावती
  • गांधार शैली: उत्तर-पश्चिम (वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान) में विकसित इस शैली पर यूनानी-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव स्पष्ट है। इसमें बुद्ध को लहराते बालों, मांसपेशियों वाले शरीर और यूनानी देवताओं जैसे वस्त्रों में दिखाया गया है। इसमें स्लेटी बलुआ पत्थर का उपयोग होता था।
  • मथुरा शैली: यह शैली पूर्णतः स्वदेशी थी और इसमें लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर का उपयोग होता था। इसमें बुद्ध को एक मांसल शरीर, मुंडा सिर, पारदर्शी वस्त्रों और एक प्रसन्न मुख मुद्रा में चित्रित किया गया। बुद्ध की पहली मानव मूर्तियाँ संभवतः मथुरा और गांधार में लगभग एक साथ (कुषाण काल में) बनीं। मथुरा कला में जैन तीर्थंकरों और हिंदू देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ बनीं।
  • बुद्ध की मुद्राएँ (Mudras): बुद्ध की मूर्तियों में उनके हाथ विभिन्न मुद्राओं में दिखाए जाते हैं, जिनका प्रतीकात्मक अर्थ होता है। प्रमुख मुद्राएँ हैं: अभय मुद्रा (भय से मुक्ति), धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा (उपदेश देना), भूमिस्पर्श मुद्रा (ज्ञान प्राप्ति के क्षण का साक्षी बनना), और ध्यान मुद्रा (एकाग्रता)।

8. नई धार्मिक परंपराएँ

8.1 महायान बौद्ध धर्म का उदय (c. 1st Century CE onwards)

इस काल तक बौद्ध धर्म में एक बड़ा वैचारिक बदलाव आया, जिससे एक नई परंपरा का उदय हुआ।

उद्धारकर्ता (Saviour) की अवधारणा: बुद्ध को अब केवल एक मानव शिक्षक नहीं, बल्कि एक देवत्व [divinity] और उद्धारकर्ता के रूप में माना जाने लगा जो अनुयायियों को मोक्ष दिला सकता था।

बोधिसत्व (Bodhisattas): यह महायान का एक केंद्रीय विचार है। बोधिसत्व वे अत्यधिक दयालु प्राणी हैं जिन्होंने स्वयं निब्बान प्राप्त करने की क्षमता हासिल कर ली है, लेकिन वे अपनी अर्जित योग्यता [merit] का उपयोग दूसरों की पीड़ा को कम करने और उन्हें मुक्ति दिलाने में मदद करने के लिए करते हैं।

नामकरण: इस नई, अधिक समावेशी धारा को महायान [Mahayana] (“महान वाहन”) कहा गया। पुरानी, अधिक कठोर परंपरा को इसके अनुयायियों द्वारा थेरवाद [Theravada] (“पुराने शिक्षकों का मार्ग”) और महायानियों द्वारा हीनयान [Hinayana] (“लघु वाहन”) कहा गया।

8.2 पौराणिक हिंदू धर्म का विकास

बौद्ध धर्म की तरह, ब्राह्मणवादी परंपरा में भी उद्धारकर्ता की अवधारणाएँ विकसित हुईं, विशेष रूप से वैष्णववाद [Vaishnavism] (विष्णु की पूजा) और शैववाद [Shaivism] (शिव की पूजा) में।

भक्ति (Bhakti): इन परंपराओं में भक्त और देवता के बीच प्रेम और समर्पण [love and devotion] पर जोर दिया गया, जहाँ मोक्ष के लिए यज्ञों के बजाय व्यक्तिगत भक्ति को अधिक महत्वपूर्ण माना गया।

वैष्णववाद और अवतार: वैष्णववाद में, माना जाता है कि जब भी दुनिया में अधर्म और बुराई बढ़ती है, तो विष्णु उसे बचाने के लिए विभिन्न रूपों में अवतार [avatars] लेते हैं। उनके दस अवतारों की कल्पना की गई है।

पुराण (Puranas): मध्य-पहली सहस्राब्दी ईस्वी के आसपास ब्राह्मणों द्वारा संकलित। इनमें देवताओं (विशेषकर विष्णु, शिव और देवियों) की कहानियाँ थीं, जिन्हें सरल संस्कृत श्लोकों में लिखा गया था ताकि वे महिलाओं और शूद्रों [Shudras] के लिए भी सुलभ [accessible] हो सकें।

8.3 मंदिरों का निर्माण

प्रारंभिक मंदिर: देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए पहले मंदिर छोटे, चौकोर कमरों के रूप में बनाए गए थे, जिन्हें गर्भगृह [garbhagriha] कहा जाता था।

विकास: धीरे-धीरे, गर्भगृह के ऊपर एक ऊँची संरचना, जिसे शिखर [shikhara] कहा जाता है, बनाई जाने लगी। मंदिरों में सभा भवन, विशाल दीवारें और प्रवेश द्वार भी जोड़े गए।

कृत्रिम गुफाएँ (Artificial Caves): कुछ शुरुआती मंदिर चट्टानों को काटकर बनाए गए थे। अशोक ने सबसे पहले आजीविक संन्यासियों के लिए बारबरा गुफाएँ बनवाईं। यह परंपरा एलोरा [Ellora] के कैलाशनाथ मंदिर (8वीं शताब्दी) में अपने चरम पर पहुँची, जिसे एक ही विशाल चट्टान से तराशा गया है।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • हीनयान और महायान में अंतर: हीनयान (थेरवाद) का आदर्श ‘अर्हत’ बनना है, जो व्यक्तिगत प्रयासों से निब्बान प्राप्त करता है। यह बुद्ध को एक महापुरुष मानता है, ईश्वर नहीं। वहीं, महायान का आदर्श ‘बोधिसत्व’ बनना है, जो दूसरों की मुक्ति के लिए कार्य करता है। यह बुद्ध की पूजा और मूर्तिपूजा पर जोर देता है।
  • त्रिमूर्ति और शक्तिवाद: पौराणिक हिंदू धर्म के विकास के साथ, ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (संरक्षक), और शिव (संहारक) की त्रिमूर्ति की अवधारणा प्रमुख हो गई। इसके साथ ही, देवी को परम शक्ति मानने वाली शाक्त परंपरा का भी उदय हुआ, जिसमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों की पूजा की जाती है।
  • मंदिर वास्तुकला की शैलियाँ: गुप्त काल के बाद, भारत में मंदिर वास्तुकला की दो प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं: उत्तर भारत में नागर शैली (जिसकी विशेषता वक्राकार शिखर और पंचायतनรูปแบบ हैं) और दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली (जिसकी विशेषता पिरामिडनुमा विमान, विशाल गोपुरम और बड़े प्रांगण हैं)।

9. अपरिचित कला की व्याख्या की चुनौतियाँ

यूरोपीय तुलना: 19वीं शताब्दी के यूरोपीय विद्वान जब पहली बार भारतीय मूर्तिकला (जैसे कई सिरों या हाथों वाले देवता) से परिचित हुए, तो वे अक्सर इसे समझ नहीं पाते थे। उन्होंने इसे “विचित्र” [grotesque] और भयावह पाया। उन्होंने इसकी तुलना प्राचीन यूनानी मूर्तिकला [ancient Greek sculpture] से की, जिसे वे कला का उच्चतम रूप मानते थे, और इस तुलना में भारतीय कला को अक्सर घटिया [inferior] माना।

गांधार कला की सराहना: उत्तर-पश्चिम के गांधार [Gandhara] क्षेत्र में मिली बुद्ध और बोधिसत्वों की छवियाँ उन्हें अधिक पसंद आईं क्योंकि वे यूनानी शैली से मिलती-जुलती थीं।

महाबलीपुरम का रहस्य: मूर्तिकला को समझने के लिए ग्रंथों पर निर्भरता हमेशा सीधी नहीं होती। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण महाबलीपुरम [Mahabalipuram] (तमिलनाडु) में एक विशाल चट्टानी उभार पर उकेरी गई कलाकृति है। महाबलीपुरम का चट्टानी उभार

इस पैनल पर इतिहासकार विभाजित हैं। कुछ इसे गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण मानते हैं, जिसमें केंद्रीय दरार नदी का प्रतीक है और चारों ओर देवी-देवता और ऋषि-मुनि एकत्रित हैं। वहीं, अन्य विद्वान इसे महाभारत के एक प्रसंग, अर्जुन की तपस्या [Arjuna’s Penance], का चित्रण मानते हैं, जिसमें अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रहे हैं। यह दिखाता है कि एक ही कलाकृति की कई व्याख्याएँ संभव हैं और कला की व्याख्या कितनी जटिल हो सकती है।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • हैगियोग्राफी (Hagiography): बुद्ध जैसे धार्मिक शिक्षकों की जीवनियाँ अक्सर ‘हैगियोग्राफी’ होती हैं, जिसका अर्थ है किसी संत की प्रशंसा में लिखी गई जीवनी। ये ग्रंथ ऐतिहासिक रूप से सटीक होने के बजाय अनुयायियों में श्रद्धा जगाने के उद्देश्य से लिखे जाते हैं। इसलिए, इतिहासकारों को इनमें से तथ्यात्मक जानकारी निकालने में सावधानी बरतनी पड़ती है।
  • औपनिवेशिक दृष्टिकोण और प्राच्यवाद: 19वीं सदी के कई यूरोपीय विद्वानों का दृष्टिकोण औपनिवेशिक मानसिकता और ‘प्राच्यवाद’ (Orientalism) से प्रभावित था। प्राच्यवाद एक ऐसी विचारधारा थी जिसमें पश्चिमी विद्वान पूर्वी संस्कृतियों को exotice, अविकसित और तर्कहीन रूप में देखते थे। उनकी कला की व्याख्या भी इसी पूर्वाग्रह से ग्रसित थी।
  • कला और संदर्भ की महत्ता: किसी भी कलाकृति को उसके मूल सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ के बिना पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता है। यूरोपीय विद्वानों के पास शुरू में इस संदर्भ की कमी थी, जिसके कारण वे भारतीय कला के गहरे प्रतीकवाद (जैसे, कई भुजाएं देवता की अनेक शक्तियों का प्रतीक हैं) और अर्थ को समझने में विफल रहे। आधुनिक कला इतिहासकार अब कलाकृतियों को उनके अपने सांस्कृतिक संदर्भ में समझने पर जोर देते हैं।

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