Bharat Choudhary 🇮🇳
इतिहास (कक्षा 12वीं)
History (Class 12th)
📋 परीक्षा की योजना (Examination Blueprint)
1. उद्देश्य हेतु अंकभार (Objective-wise Distribution)
| क्र.सं. | उद्देश्य (Objective) | अंकभार (Marks) | प्रतिशत (Percentage) |
|---|---|---|---|
| 1 | ज्ञान (Knowledge) | 24 | 30% |
| 2 | अवबोध (Understanding) | 24 | 30% |
| 3 | ज्ञानोपयोग (Application) | 16 | 20% |
| 4 | कौशल (Skills) | 8 | 10% |
| 5 | विश्लेषण (Analysis) | 8 | 10% |
| योग (Total) | 80 | 100% | |
2. प्रश्नों के प्रकार अनुसार अंकभार (Question Type Distribution)
| क्र.सं. | प्रश्नों का प्रकार | प्रश्नों की संख्या | अंक प्रति प्रश्न | कुल अंक | प्रतिशत (अंकों का) | संभावित समय (मिनट) |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | बहुविकल्पात्मक (MCQ) | 18 | 1 | 18 | 22.5% | 24 |
| 2 | रिक्त स्थान (Fill in the Blanks) | 6 | 1 | 6 | 7.5% | 6 |
| 3 | अतिलघुत्तरात्मक (Very Short Answer) | 12 | 1 | 12 | 15% | 24 |
| 4 | लघुत्तरात्मक (Short Answer) | 10 | 2 | 20 | 25% | 50 |
| 5 | दीर्घउत्तरीय (Long Answer) | 4 | 3 | 12 | 15% | 40 |
| 6 | निबंधात्मक (Essay Type) | 3 | 4 | 12 | 15% | 51 |
| योग (Total) | 53 | – | 80 | 100% | 195 | |
3. अध्याय-वार अंकभार (Chapter-Wise Weightage)
| क्र.सं. S.No. |
अध्याय Chapter |
अंक Marks |
प्रश्नों का विवरण Question Distribution |
|---|---|---|---|
| 1 | ईंट, मनके तथा अस्थियां Bricks, Beads and Bones |
7 | 1 MCQ 1 निबंध 2 अतिलघु |
| 2 | राजा, किसान और नगर Kings, Farmers and Towns |
6 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 लघु |
| 3 | बंधुत्व, जाति तथा वर्ग Kinship, Caste and Class |
6 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 लघु |
| 4 | विचारक, विश्वास और इमारतें Thinkers, Beliefs and Buildings |
7 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 लघु 1 दीर्घ* |
| 5 | यात्रियों के नजरिए Through the Eyes of Travellers |
6 | 2 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 लघु |
| 6 | भक्ति सूफी परंपराएं Bhakti-Sufi Traditions |
7 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 निबंध* |
| 7 | एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर An Imperial Capital: Vijayanagara |
6 | 1 MCQ 1 अतिलघु 1 लघु 1 दीर्घ |
| 8 | किसान, जमींदार और राज्य Peasants, Zamindars and the State |
6 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 दीर्घ* |
| 9 | उपनिवेशवाद और देहात Colonialism and the Countryside |
6 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 लघु |
| 10 | विद्रोही और राज Rebels and the Raj |
6 | 1 MCQ 1 रिक्त 1 अतिलघु 1 लघु |
| 11 | महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन Mahatma Gandhi and the National Movement |
7 | 1 अतिलघु 2 लघु 1 दीर्घ* |
| 12 | संविधान का निर्माण Framing the Constitution |
6 | 1 रिक्त 2 लघु 1 दीर्घ* |
| 13 | मानचित्र कार्य Map Work |
4 | 1 निबंध* |
| योग (Total) | 80 | कुल प्रश्न: 53 | Total Questions: 53 | |
Note: “*” indicates questions with OR options. Options are available in Section C and D.
📝 नमूना प्रश्न-पत्र (Model Question Paper)
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
- प्रश्नों के उत्तर दी गई उत्तर पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आंतरिक खंड है उनके उत्तर एक साथ ही लिखें।
- प्रश्न का उत्तर लिखने से पूर्व प्रश्न का क्रमांक अवश्य लिखें।
When was Pataliputra made the capital of Magadha?
For which of the following purpose did Asoka appoint special officers called ‘dhamma mahamatta’?
Which of the following rulers rebuilt Sudarshna lake?
What were those castes called which were associated with the same occupation or professions?
- श्रेणी = व्यवसाय आधारित संगठन
- अग्रहार = ब्राह्मणों को दी गई भूमि
- हलवाहा/उल्वर = किसान/कृषक
In which year was Sanchi discovered?
The coconut and the paan have been described by which of the following travellers?
Which language did Al-Biruni use in his writings?
Who was the guru who showed Kabir the path of devotion?
- रामानंद → कबीर, रैदास
- वल्लभाचार्य → सूरदास
- चैतन्य महाप्रभु → बंगाल में भक्ति आंदोलन
The People of which of the following places were addressed by the name ‘Parashika’?
If you want to see the Brihadishvara Temple in India, you will have to visit which of the following places?
What does ‘Kudirai chettis’ mean in the context of the Vijayanagara Empire?
Indo-persian sources during the mughal period used the term ‘Muzarian’ for which of the following?
- मुजरियान = किसान
- जमींदार = भू-राजस्व एकत्र करने वाले
- मुकद्दम = गांव का मुखिया
- पटवारी = गांव का लेखाकार
In which century did Giovanni Careri visit India?
What was Ryotwari?
- स्थायी बंदोबस्त (1793) – बंगाल, बिहार, उड़ीसा – जमींदारों से
- रैयतवाड़ी (1820) – मद्रास, बंबई – सीधे किसान से
- महालवाड़ी (1833) – उत्तर प्रदेश, पंजाब – गांव समुदाय से
Where was colonial rule first established in India?
Who painted the ‘Relief of Lucknow’ in 1859?
Under the leadership of which British commander did the army liberate Lucknow?
He had not been appointed the king’s first minister in order to preside over the liquidation of the British Empire. Which British prime minister made this statement?
- विंस्टन चर्चिल (1940-45) – भारतीय स्वतंत्रता के विरोधी
- क्लेमेंट एटली (1945-51) – भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर; इनके कार्यकाल में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की (1947)
There is evidence in the Khetri area for what archaeologists call the __________ Culture.
Women were allowed to retain the gifts they received on the occasion of their marriage as ___________.
- स्त्रीधन – विवाह के समय मिले उपहार
- दायभाग – पिता की संपत्ति में हिस्सा (कुछ परंपराओं में)
Travelling overland through central Asia __________ reached Sind in 1333.
In 1976 __________ was recognised as a site of national importance.
In the early nineteenth century, Buchanan travelled through the __________ hills.
In popular images, Rani __________ is often depicted in military attire, riding a horse and holding a sword in one hand.
- रानी लक्ष्मीबाई – झांसी
- नाना साहब – कानपुर
- तात्या टोपे – ग्वालियर
- बहादुर शाह जफर – दिल्ली
- कुंवर सिंह – बिहार
- बेगम हजरत महल – लखनऊ
In which language were the Jataka tales written?
Mention any one characteristic of patrilineal system.
Inheritance of property from father to son.
Name the foster mother of Buddha who became the first woman to be ordained as a bhikkhuni?
Who is called ‘Zimmi’?
Non-Muslims living in Islamic state who practiced their religion by paying tax (jizya).
Why did the availability of gold coins decrease in the sixth century CE? Explain.
Due to decline of Roman Empire, Indo-Roman trade decreased, reducing gold imports.
How did Bernier describe the Mughal Empire?
A despotic monarchy where all land belongs to the emperor and there is absence of private property.
Which ruler assumed the title ‘establisher of the Yavana kingdom’?
What do you understand by ‘Jins-i-kamil’?
Superior crops like wheat, rice, sugarcane on which higher tax was levied.
Who were called Havladar and Gatidar?
Smaller zamindars or revenue collectors working under big zamindars in Bengal.
Which painter painted the painting ‘In memoriam’?
‘The first Round Table Conference proved futile’. Write one reason why?
Congress boycotted the conference and did not participate.
For how many years did the Constituent Assembly decide to continue using English in government work?
Analyse the figures on the seals obtained from the Indus civilisation.
सिंधु सभ्यता की मुहरों पर विभिन्न आकृतियां उत्कीर्ण हैं:
- पशु आकृतियां: बैल, हाथी, बाघ, भैंस, एक सींग वाला पशु (यूनिकॉर्न) सबसे आम हैं
- मानव आकृति: योग मुद्रा में बैठी आकृति जिसे ‘पशुपति’ कहा जाता है
- लिपि: अधिकांश मुहरों पर सिंधु लिपि के चिह्न हैं जो अभी तक पढ़े नहीं गए हैं
- उपयोग: ये मुहरें व्यापार, पहचान और धार्मिक उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त होती थीं
मुहरें स्टीटाइट (सेलखड़ी) पत्थर से बनी होती थीं और उन पर उत्कृष्ट शिल्पकारी का प्रमाण मिलता है।
Mention any two similarities between the geographical location of cities of the 6th century BC and the geographical location of modern Indian cities.
दो प्रमुख समानताएं:
- नदी तटों पर स्थिति: छठी शताब्दी ई.पू. के नगर जैसे पाटलिपुत्र (गंगा), काशी (गंगा), उज्जैन (शिप्रा) नदियों के किनारे बसे थे। आधुनिक नगर भी – दिल्ली (यमुना), कोलकाता (हुगली), वाराणसी (गंगा) नदी तटों पर स्थित हैं। नदियां जल आपूर्ति, व्यापार और परिवहन की सुविधा प्रदान करती हैं।
- व्यापारिक मार्गों पर स्थिति: प्राचीन नगर उत्तरापथ और दक्षिणापथ जैसे व्यापारिक मार्गों पर स्थित थे। आधुनिक शहर भी प्रमुख राजमार्गों, रेलवे जंक्शनों और हवाई अड्डों के पास विकसित होते हैं, जो व्यापार और संचार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
On what basis can you say that mothers were important in ancient India?
प्राचीन भारत में माताओं का महत्व निम्न आधारों पर सिद्ध होता है:
- मातृका परंपरा: कुछ गोत्रों और वंशों की पहचान माता के नाम से होती थी, जैसे सात्यकि जो यादवी-पुत्र (यादवी का पुत्र) कहलाते थे
- स्त्रीधन का अधिकार: माताएं अपनी संपत्ति पर अधिकार रखती थीं और इसे अपनी संतान को दे सकती थीं
- धार्मिक महत्व: पुत्र का नाम कभी-कभी माता के नाम पर रखा जाता था, जैसे कुंती-पुत्र (कुंती के पुत्र)
- सामाजिक सम्मान: महाभारत जैसे ग्रंथों में माताओं – कुंती, गांधारी – को उच्च सम्मान दिया गया है
Name two great thinkers of the world and their countries during the first millennium BCE.
प्रथम सहस्राब्दि ई.पू. के दो महान चिंतक:
- महात्मा बुद्ध (गौतम बुद्ध) – भारत (563-483 ई.पू.)
उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की और मध्यम मार्ग, चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। - कन्फ्यूशियस – चीन (551-479 ई.पू.)
उन्होंने नैतिक दर्शन, सामाजिक संबंधों और सुशासन पर शिक्षा दी। उनकी शिक्षाओं ने चीनी संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।
अन्य महान चिंतक: सुकरात, प्लेटो, अरस्तू (ग्रीस), महावीर (भारत), जरथुस्त्र (फारस)
How is Al-Biruni’s description of the caste system different from the present day caste system?
अल-बिरूनी का विवरण (11वीं सदी):
- उसने चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का उल्लेख किया
- वर्ण व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था का आधार बताया
- ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान और शूद्रों को सबसे निम्न स्थान दिया
- अस्पृश्यता और जाति-आधारित व्यवसायों का वर्णन किया
वर्तमान जाति व्यवस्था:
- संवैधानिक रूप से जाति-आधारित भेदभाव प्रतिबंधित है
- अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था
- व्यवसाय का चुनाव जाति पर आधारित नहीं, स्वतंत्र है
- अंतर-जातीय विवाह और सामाजिक गतिशीलता बढ़ी है
Compare the works of Raya and Nayaka in the context of Vijayanagara Empire.
| पहलू | राय (Raya/King) | नायक (Nayaka/Chief) |
|---|---|---|
| स्थिति | सर्वोच्च शासक, सम्राट | राय के अधीन सैन्य प्रमुख और क्षेत्रीय शासक |
| प्रशासन | पूरे साम्राज्य का शासन, नीति निर्धारण | विशिष्ट क्षेत्र (नायकत्व) का प्रशासन |
| सैन्य कार्य | सर्वोच्च सेनापति, युद्ध का निर्णय | सेना बनाए रखना, किलों की सुरक्षा |
| राजस्व | सभी राजस्व का अंतिम अधिकारी | अपने क्षेत्र से राजस्व एकत्र कर राय को भेजना |
| निष्ठा | स्वतंत्र शासक | राय के प्रति वफादार, उपहार और सेना प्रदान करना |
संबंध: नायक राय की सत्ता को मजबूत करते थे और बदले में स्वायत्तता प्राप्त करते थे। यह प्रणाली सामंती व्यवस्था जैसी थी।
Why did the zamindars default on revenue payments after the permanent Settlement? Explain.
स्थायी बंदोबस्त (1793) के बाद जमींदारों के राजस्व चूक के कारण:
- अत्यधिक कर दर: राजस्व की दर बहुत ऊंची (भूमि के उत्पाद का 10/11वां भाग) निर्धारित की गई थी, जो चुकाना कठिन था
- कठोर समय सीमा: सूर्यास्त कानून (Sunset Law) के तहत निर्धारित तिथि पर राजस्व न देने पर जमींदारी नीलाम हो जाती थी
- कृषि संकट: सूखा, बाढ़ या फसल खराब होने पर भी कर माफ नहीं होता था
- किसानों से वसूली में कठिनाई: गरीब किसानों से कर वसूलना मुश्किल था
- विलासी जीवनशैली: कई जमींदार शहरों में रहते थे और विलासितापूर्ण जीवन जीते थे, जिससे उनके खर्च बढ़ते थे
परिणाम: 1793-1820 के बीच बंगाल में बड़ी संख्या में जमींदारियां नीलाम हो गईं।
‘The nationalist movement in the twentieth century drew inspiration from the events of 1857’. Explain.
1857 के विद्रोह ने 20वीं सदी के राष्ट्रवादी आंदोलन को निम्न प्रकार प्रेरित किया:
- स्वतंत्रता का प्रतीक: 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना गया। वीर सावरकर ने इसे “First War of Independence” कहा
- वीर नायकों की स्मृति: रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब, बहादुर शाह जफर राष्ट्रवादियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने
- हिंदू-मुस्लिम एकता: 1857 में हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा, यह साम्प्रदायिक सद्भाव का उदाहरण बना
- ब्रिटिश विरोध: यह दिखाया कि भारतीय ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित होकर लड़ सकते हैं
- साहित्य और कला: राष्ट्रवादी कवियों ने 1857 के नायकों पर कविताएं लिखीं जो जनमानस को प्रेरित करती थीं
‘Autobiographies also contribute to knowledge of the past’. Explain the statement.
आत्मकथाएं इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं:
- व्यक्तिगत अनुभव: आत्मकथाओं में लेखक अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव बताते हैं जो इतिहास को जीवंत बनाते हैं
- सामाजिक-सांस्कृतिक झलक: ये तत्कालीन समाज, रीति-रिवाज, शिक्षा व्यवस्था की जानकारी देती हैं। उदाहरण – जवाहरलाल नेहरू की “मेरी कहानी” (An Autobiography)
- राजनीतिक घटनाक्रम: राजनेताओं की आत्मकथाएं महत्वपूर्ण निर्णयों, आंदोलनों के पीछे की सोच को समझने में मदद करती हैं
- विचारधारा: लेखक के विचार, मूल्य और दृष्टिकोण को जानने का साधन
उदाहरण: महात्मा गांधी की “सत्य के प्रयोग”, डॉ. बी.आर. अंबेडकर की रचनाएं भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
सीमाएं: आत्मकथाएं व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकती हैं, इसलिए अन्य स्रोतों से भी जांच आवश्यक है।
Separate electorates are a “poison that has entered the body politic of our country”. Analyze Sardar Patel’s statement.
सरदार वल्लभभाई पटेल का यह कथन पृथक निर्वाचिका के खतरों को रेखांकित करता है:
पृथक निर्वाचिका का अर्थ: विभिन्न धर्मों/समुदायों के लिए अलग मतदाता सूची। मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को, हिंदू केवल हिंदू उम्मीदवारों को वोट दे सकते थे।
पटेल के विरोध के कारण:
- राष्ट्रीय एकता में बाधा: यह समुदायों को अलग-अलग करता है, साझा राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करता है
- साम्प्रदायिकता को बढ़ावा: धर्म के आधार पर राजनीति होने से हिंदू-मुस्लिम विभाजन बढ़ा और अंततः देश का विभाजन हुआ
- विभाजन का कारण: 1909 के मिंटो-मॉर्ले सुधार में शुरू की गई पृथक निर्वाचिका ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और 1947 के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया
- लोकतंत्र के विरुद्ध: यह धर्म को राजनीति में लाता है, जो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के विरुद्ध है
संविधान सभा का निर्णय: पटेल और अन्य नेताओं के प्रयासों से संविधान में पृथक निर्वाचिका को समाप्त कर दिया गया और संयुक्त निर्वाचिका को अपनाया गया।
How is Jainism’s principle of non-violence relevant in world politics and society today?
जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत:
जैन धर्म में अहिंसा सर्वोच्च सिद्धांत है। इसका अर्थ केवल शारीरिक हिंसा का त्याग नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को हानि न पहुंचाना है। महावीर स्वामी ने कहा “अहिंसा परमो धर्मः” (अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है)।
वर्तमान विश्व राजनीति में प्रासंगिकता:
- शांतिपूर्ण विवाद समाधान: अंतर्राष्ट्रीय विवादों को युद्ध के बजाय वार्ता और कूटनीति से सुलझाना। संयुक्त राष्ट्र की शांति वार्ताएं इसी सिद्धांत पर आधारित हैं
- परमाणु निरस्त्रीकरण: अहिंसा सिद्धांत परमाणु हथियारों की दौड़ को रोकने और निरस्त्रीकरण की मांग को मजबूत करता है
- मानवाधिकार: अहिंसा से प्रेरित मानवाधिकार आंदोलनों ने दुनिया में लोकतंत्र और न्याय को बढ़ावा दिया है
- आतंकवाद विरोध: आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध की आवश्यकता
समाज में प्रासंगिकता:
- सामाजिक न्याय आंदोलन: मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नागरिक अधिकार आंदोलन अहिंसा पर आधारित था
- पर्यावरण संरक्षण: जैन सिद्धांत सभी जीवों के प्रति करुणा सिखाता है। आज पर्यावरण आंदोलन, पशु अधिकार और वेगनवाद इससे प्रेरित हैं
- सहिष्णुता और सह-अस्तित्व: बहुसांस्कृतिक समाजों में अहिंसा विभिन्न धर्मों-संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आधार है
- हिंसा मुक्त समाज: घरेलू हिंसा, बाल शोषण, और सामाजिक हिंसा के खिलाफ जागरूकता
महात्मा गांधी का योगदान: गांधीजी ने जैन अहिंसा से प्रेरित होकर सत्याग्रह विकसित किया जिससे भारत को स्वतंत्रता मिली। उनके सिद्धांतों ने नेल्सन मंडेला, दलाई लामा जैसे नेताओं को प्रेरित किया।
निष्कर्ष: 21वीं सदी में युद्ध, आतंकवाद, और सामाजिक विभाजन के दौर में जैन अहिंसा सिद्धांत विश्व शांति, मानवता और सतत विकास का मार्ग दिखाता है।
बुद्ध की शिक्षाएं वर्तमान समाज में किस प्रकार उपयोगी हैं? 3 Marks
How are Buddha’s teachings useful in present society?
बुद्ध की प्रमुख शिक्षाएं:
- चार आर्य सत्य: (1) जीवन दुःखमय है (2) दुःख का कारण तृष्णा है (3) दुःख का निवारण संभव है (4) दुःख निवारण का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है
- अष्टांगिक मार्ग: सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीव, व्यायाम, स्मृति, समाधि
- मध्यम मार्ग: अति तपस्या और अति भोग दोनों का त्याग
वर्तमान समाज में उपयोगिता:
- मानसिक स्वास्थ्य:
- ध्यान (Meditation) और माइंडफुलनेस तनाव, अवसाद और चिंता को कम करते हैं
- पश्चिमी देशों में बौद्ध ध्यान तकनीकें मानसिक चिकित्सा में प्रयुक्त होती हैं
- भौतिकवाद से मुक्ति:
- तृष्णा (लालच) को दुःख का कारण बताना आज अत्यधिक उपभोक्तावाद के युग में प्रासंगिक है
- सादा जीवन, उच्च विचार की शिक्षा
- नैतिक जीवन:
- सम्यक वाणी, कर्म और आजीव का सिद्धांत ईमानदारी और नैतिकता सिखाता है
- व्यावसायिक नैतिकता और कॉर्पोरेट जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण
- अहिंसा और करुणा:
- सभी प्राणियों के प्रति करुणा – पशु अधिकार, शाकाहार आंदोलन
- हिंसा और युद्ध के विरुद्ध शांतिपूर्ण समाधान
- समानता:
- बुद्ध ने जाति, लिंग, वर्ग का भेद नहीं माना – सामाजिक समानता की नींव
- महिलाओं को भिक्खुनी संघ में शामिल किया – लैंगिक समानता
- पर्यावरण संरक्षण:
- प्रकृति और सभी जीवों के प्रति सम्मान
- टिकाऊ जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा
निष्कर्ष: आधुनिक दुनिया में तनाव, हिंसा, असमानता और पर्यावरण संकट के बीच बुद्ध की शिक्षाएं शांति, संतुलन और सतत विकास का मार्ग दिखाती हैं।
Explain the statement ‘Many new crops from different parts of the world reached the Indian Subcontinent in the seventeenth century’.
भूमिका: 16वीं-17वीं सदी में यूरोपीय नाविकों द्वारा अमेरिका की खोज और व्यापारिक मार्गों के विस्तार से विश्व के विभिन्न भागों के बीच फसलों और पौधों का आदान-प्रदान हुआ। इसे “कोलंबियाई विनिमय” (Columbian Exchange) कहते हैं।
भारत में आई नई फसलें:
| फसल | मूल स्थान | प्रभाव |
|---|---|---|
| मक्का (Maize) | दक्षिण अमेरिका | पहाड़ी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण खाद्यान्न बना |
| आलू (Potato) | दक्षिण अमेरिका (पेरू) | पहाड़ी और ठंडे क्षेत्रों में प्रमुख भोजन |
| टमाटर (Tomato) | मेक्सिको | भारतीय व्यंजनों में क्रांति |
| मिर्च (Chilli) | मध्य और दक्षिण अमेरिका | काली मिर्च का सस्ता विकल्प, मसालों में क्रांति |
| अनानास (Pineapple) | ब्राजील | फलों में विविधता |
| पपीता (Papaya) | मध्य अमेरिका | पोषण और औषधीय उपयोग |
| काजू (Cashew) | ब्राजील | व्यापारिक फसल, गोवा में बड़े पैमाने पर |
| तंबाकू (Tobacco) | उत्तरी अमेरिका | व्यापारिक फसल (हालांकि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक) |
इन फसलों के आने के माध्यम:
- पुर्तगाली व्यापारी: पुर्तगाली गोवा, कोच्चि और अन्य तटीय क्षेत्रों में बसे थे और उन्होंने अमेरिकी फसलें लाईं
- समुद्री व्यापार मार्ग: यूरोपीय जहाज अमेरिका से एशिया आते समय बीज और पौधे लाते थे
- धार्मिक मिशनरी: ईसाई मिशनरी भी नई फसलें लेकर आए
प्रभाव:
- कृषि में विविधता: नई फसलों से भारतीय कृषि अधिक विविध और समृद्ध हुई
- खाद्य सुरक्षा: मक्का और आलू ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा बढ़ाई
- भारतीय व्यंजनों में परिवर्तन: मिर्च, टमाटर, आलू के बिना आज के भारतीय खाने की कल्पना असंभव है
- आर्थिक लाभ: काजू, तंबाकू जैसी नकदी फसलें व्यापार के नए अवसर लाईं
- पोषण में सुधार: विटामिन और खनिजों से भरपूर नई सब्जियां और फल
निष्कर्ष: 17वीं सदी में विश्व व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारत में नई फसलें लाईं जिन्होंने भारतीय कृषि, खानपान और अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से बदल दिया। आज ये फसलें भारतीय जीवन का अभिन्न अंग हैं।
“मुगल भारत में कृषि संबंधों की हमारी दास्तान तब तक अधूरी रहेगी जब तक गांवों में रहने वाले एक ऐसे तबके की बात न कर लें जिसकी कमाई तो खेती से आती थी लेकिन जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सेदारी नहीं करते थे।” कथन की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
Explain the statement ‘Our story of agrarian relations in Mughal India will not be complete without referring to a class of people in the countryside that lived off agriculture but did not participate directly in the processes of agricultural production’.
संदर्भ: यह कथन मुगलकालीन ग्रामीण समाज की जटिलता को दर्शाता है। खेती करने वाले किसानों के अलावा भी कई लोग थे जो कृषि पर आश्रित थे लेकिन खेत में काम नहीं करते थे।
ऐसे लोगों की श्रेणियां:
- जमींदार वर्ग:
- ये भू-स्वामी थे जो किसानों से भू-राजस्व वसूलते थे
- स्वयं खेती नहीं करते थे, लेकिन भूमि से आय प्राप्त करते थे
- कभी-कभी कई गांवों के मालिक होते थे
- ग्रामीण प्रशासनिक अधिकारी:
- मुकद्दम: गांव का मुखिया जो राजस्व एकत्र करने में मदद करता था
- पटवारी: गांव का लेखाकार जो भूमि के रिकॉर्ड रखता था
- चौकीदार: गांव की सुरक्षा करता था
- इन्हें वेतन के स्थान पर जागीर या भूमि दी जाती थी
- कारीगर और दस्तकार:
- बढ़ई, लोहार, कुम्हार, जुलाहे जो किसानों को सेवाएं देते थे
- इन्हें अनाज में भुगतान मिलता था (जजमानी व्यवस्था)
- गांव की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण लेकिन खेती में सीधी भूमिका नहीं
- धार्मिक व्यक्ति:
- पुजारी, मौलवी जो धार्मिक सेवाएं देते थे
- उन्हें भी कृषि उत्पाद में हिस्सा मिलता था
- साहूकार और व्यापारी:
- किसानों को कर्ज देते थे
- कृषि उत्पादों का व्यापार करते थे
- कृषि से अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते थे
आर्थिक संबंध:
- ये सभी वर्ग कृषि उत्पाद के वितरण में हिस्सेदार थे
- किसान जो उत्पादन करता था, उसका एक बड़ा हिस्सा राजस्व, कर्ज, सेवाओं के बदले में इन वर्गों को जाता था
- कभी-कभी किसान के पास अपने उत्पाद का केवल 1/3 भाग ही बचता था
सामाजिक पदानुक्रम:
- जमींदार और प्रशासनिक अधिकारी उच्च स्थिति रखते थे
- कारीगर मध्यम स्थिति में
- खेतिहर मजदूर सबसे नीचे
महत्व: इन वर्गों को समझे बिना मुगल कृषि अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं मिलती। वे दिखाते हैं कि:
- ग्रामीण समाज केवल किसानों का नहीं था, बल्कि जटिल सामाजिक-आर्थिक संरचना थी
- कृषि उत्पाद का वितरण असमान था
- ग्रामीण शक्ति संबंध और वर्ग विभाजन को समझना जरूरी है
निष्कर्ष: मुगल भारत में कृषि केवल खेती करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक जटिल सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था थी जिसमें कई वर्गों की भूमिका और हितों का संतुलन था।
What is the significance of Gandhi’s public voice and private writings in understanding his contribution to the national movement? Describe.
भूमिका: महात्मा गांधी ने अपने विचारों को सार्वजनिक भाषणों, लेखों और निजी पत्राचार दोनों माध्यमों से व्यक्त किया। दोनों ही राष्ट्रीय आंदोलन में उनके योगदान को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
1. सार्वजनिक स्वर (Public Voice) का महत्व:
- जनमत निर्माण:
- गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’, ‘हरिजन’, ‘नवजीवन’ जैसे समाचार पत्रों में नियमित लेख लिखे
- इन लेखों ने लाखों लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा
- स्वराज, स्वदेशी, सत्याग्रह जैसे विचारों का प्रचार किया
- आंदोलनों की घोषणा:
- असहयोग आंदोलन (1920), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930), भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की घोषणाएं
- लोगों को एकजुट करने और कार्यक्रम बताने का माध्यम
- भाषण और अभिभाषण:
- जनसभाओं में दिए गए भाषण – जैसे दांडी मार्च के समय
- सीधे जनता से संवाद, भावनात्मक जुड़ाव
- ब्रिटिश सरकार को संदेश:
- वायसराय को खुले पत्र
- गोलमेज सम्मेलनों में भाषण
- राजनीतिक मांगों को स्पष्ट करना
2. निजी लेखन (Private Writings) का महत्व:
- आत्मकथा – ‘सत्य के प्रयोग’:
- गांधीजी के व्यक्तित्व विकास की झलक
- दक्षिण अफ्रीका के अनुभव और सत्याग्रह की उत्पत्ति
- उनके आंतरिक संघर्ष, संदेह और विकास
- निजी पत्राचार:
- नेहरू, पटेल, आज़ाद जैसे नेताओं को पत्र – राजनीतिक रणनीति
- आश्रमवासियों को पत्र – सामाजिक सुधार विचार
- विदेशी मित्रों को पत्र – अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण
- ये पत्र उनके निजी विचार, आशंकाएं, आशाएं दर्शाते हैं
- डायरी और नोट्स:
- रोजमर्रा के विचार और चिंतन
- निर्णय लेने की प्रक्रिया
- आश्रम पत्रिकाएं:
- ‘साबरमती आश्रम’ की पत्रिकाओं में रचनात्मक कार्यक्रम
- ग्रामीण पुनर्निर्माण, खादी, शिक्षा पर लेख
3. दोनों का तुलनात्मक महत्व:
| पहलू | सार्वजनिक स्वर | निजी लेखन |
|---|---|---|
| उद्देश्य | जनमत बनाना, आंदोलन चलाना | व्यक्तिगत विचार, मार्गदर्शन |
| दर्शक | आम जनता, सरकार | निकट सहयोगी, परिवार |
| भाषा | औपचारिक, प्रभावशाली | अनौपचारिक, व्यक्तिगत |
| विषय | राजनीतिक मुद्दे, रणनीति | आंतरिक संघर्ष, दर्शन |
| ऐतिहासिक मूल्य | आंदोलन की दिशा, जन प्रभाव | गांधी का वास्तविक व्यक्तित्व |
4. एकीकृत समझ:
दोनों स्रोतों को मिलाकर हमें गांधीजी की संपूर्ण तस्वीर मिलती है:
- सार्वजनिक लेखन = नेता गांधी (राजनेता, आंदोलनकारी)
- निजी लेखन = मानव गांधी (विचारक, आध्यात्मिक व्यक्ति)
- दोनों का संयोजन = महात्मा गांधी (संपूर्ण व्यक्तित्व)
उदाहरण:
- दांडी मार्च (1930): सार्वजनिक पत्र वायसराय को + निजी पत्र सरदार पटेल को = संपूर्ण रणनीति की समझ
- भारत छोड़ो (1942): सार्वजनिक भाषण “करो या मरो” + निजी चिंताएं हिंसा के बारे में = निर्णय की जटिलता
निष्कर्ष: गांधीजी के सार्वजनिक और निजी लेखन दोनों ही राष्ट्रीय आंदोलन में उनके अद्वितीय योगदान को समझने के लिए आवश्यक हैं। सार्वजनिक स्वर से हम उनकी राजनीतिक रणनीति और जन प्रभाव समझते हैं, जबकि निजी लेखन उनके आंतरिक विचार और वास्तविक व्यक्तित्व को प्रकट करता है। दोनों मिलकर गांधी को केवल एक नेता से बढ़कर एक संपूर्ण मानव और विचारक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी जी के योगदान को समझने के लिए सरकारी रिकॉर्ड्स एवं समकालीन अखबारों का क्या महत्व है? वर्णन कीजिए। 3 Marks
What is the importance of government records and contemporary newspapers in understanding Gandhiji’s contribution to the national movement? Describe.
भूमिका: महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान को समझने के लिए सरकारी रिकॉर्ड और समकालीन अखबार दो परस्पर पूरक और अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं। ये दोनों स्रोत विभिन्न दृष्टिकोणों से गांधीजी के कार्यों, रणनीतियों और प्रभाव को प्रस्तुत करते हैं।
1. सरकारी रिकॉर्ड्स का महत्व:
- गुप्तचर रिपोर्ट्स (Intelligence Reports): ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी की हर गतिविधि, भाषण, यात्रा और बैठक पर विस्तृत गुप्तचर रिपोर्ट तैयार कीं। ये रिपोर्ट्स गांधी के दैनिक कार्यों, उनकी योजनाओं और जनता पर उनके प्रभाव का प्रमाणिक दस्तावेजीकरण प्रदान करती हैं।
- पुलिस रिकॉर्ड और FIRs: विभिन्न आंदोलनों जैसे असहयोग आंदोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान हुई गिरफ्तारियों, प्रदर्शनों और जनसभाओं का विवरण। ये रिकॉर्ड आंदोलन के विस्तार और जन-भागीदारी को मापने में सहायक हैं।
- वायसराय और गवर्नरों की गोपनीय रिपोर्ट: Lord Irwin, Lord Willingdon, और Lord Linlithgow की गोपनीय रिपोर्ट्स में गांधी की राजनीतिक रणनीति, बातचीत की कला और समझौतों का विस्तृत विश्लेषण मिलता है। इनसे ब्रिटिश प्रशासन की चिंताओं और गांधी के प्रभाव का पता चलता है।
- न्यायालय रिकॉर्ड और मुकदमों के दस्तावेज:
- 1922 का चौरी-चौरा मामला और गांधी का प्रसिद्ध न्यायालयी बयान
- 1930 के दांडी मार्च और नमक कानून भंग के मामले
- गांधी-इर्विन समझौता (1931) के दस्तावेज
- व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940-41) से संबंधित कानूनी रिकॉर्ड
- Home Department Files: भारत सरकार के गृह विभाग की फाइलें गांधी के बारे में नीतिगत निर्णयों, रणनीतियों और ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रियाओं को दर्शाती हैं।
2. समकालीन अखबारों का महत्व:
- गांधीजी द्वारा संपादित अखबार:
- यंग इंडिया (1919-32): अंग्रेजी साप्ताहिक – गांधी के राजनीतिक विचार, असहयोग और सविनय अवज्ञा की विस्तृत व्याख्या
- हरिजन (1933-48): अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक सुधार पर केंद्रित
- नवजीवन (1919-32): गुजराती साप्ताहिक – स्थानीय जनता तक गांधी के विचारों का प्रसार
- राष्ट्रवादी भारतीय अखबार:
- अमृत बाजार पत्रिका, द हिन्दू, बॉम्बे क्रॉनिकल
- हिंदी में – आज, प्रताप, वर्तमान
- इन अखबारों में आंदोलनों की रिपोर्टिंग, गांधी के भाषणों का प्रकाशन और जनता की प्रतिक्रिया
- ब्रिटिश अखबार:
- The Times of India, The Statesman: भारत में ब्रिटिश दृष्टिकोण
- The Times (London), Manchester Guardian: अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य, गांधी का वैश्विक प्रभाव
- ब्रिटिश प्रेस में गांधी की छवि और यूरोपीय जनमत पर प्रभाव का अध्ययन
- क्षेत्रीय भाषा के अखबार: स्थानीय आंदोलनों की विस्तृत रिपोर्टिंग, ग्रामीण क्षेत्रों में गांधी के प्रभाव, चंपारण (1917), खेड़ा (1918), बारडोली (1928) जैसे स्थानीय आंदोलनों का दस्तावेजीकरण।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रेस: अमेरिकी (New York Times) और अन्य देशों के अखबारों में गांधी के अहिंसक आंदोलन की अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा और प्रभाव।
3. दोनों स्रोतों का तुलनात्मक महत्व:
- संतुलित दृष्टिकोण: सरकारी रिकॉर्ड विरोधी पक्ष का दृष्टिकोण देते हैं जबकि अखबार जन-भावना को प्रतिबिंबित करते हैं
- तथ्यात्मक सत्यापन: दोनों स्रोतों के आपसी मिलान से घटनाओं की प्रामाणिकता की पुष्टि होती है
- विविध परिप्रेक्ष्य: एक ही घटना के बारे में शासक और शासित दोनों के दृष्टिकोण मिलते हैं
निष्कर्ष: सरकारी रिकॉर्ड और समकालीन अखबार दोनों मिलकर गांधीजी के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान की संपूर्ण, बहुआयामी और संतुलित समझ प्रदान करते हैं। ये स्रोत न केवल तथ्यात्मक जानकारी देते हैं बल्कि उस युग के राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वातावरण को भी समझने में सहायक हैं।
The Constituent Assembly declared Hindi as the official language. What was the debate surrounding this? Explain.
पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा को भारत की राजभाषा तय करनी थी। यह एक अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा था जिस पर तीव्र बहस हुई।
भाषा प्रश्न की जटिलता:
- भारत में 100+ भाषाएं, 1000+ बोलियां
- संविधान ने 14 भाषाओं को मान्यता दी (अब 22)
- कोई एक भाषा सर्वमान्य नहीं थी
बहस के मुख्य पक्ष:
1. हिंदी समर्थक पक्ष:
- तर्क:
- हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भारतीय भाषा (उत्तर भारत में)
- देवनागरी लिपि वैज्ञानिक और सीखने में आसान
- राष्ट्रवादी भावना – स्वदेशी भाषा, अंग्रेजी से मुक्ति
- प्राचीन संस्कृत से निकट संबंध
- समर्थक: पुरुषोत्तमदास टंडन, राजेंद्र प्रसाद, संपूर्णानंद
- नारा: “हिंदी, हिन्दू, हिंदुस्तान”
2. हिंदी विरोधी पक्ष (मुख्यतः दक्षिण भारतीय):
- तर्क:
- हिंदी दक्षिण भारत में नहीं बोली जाती – तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम प्रमुख
- हिंदी थोपने से गैर-हिंदी भाषियों का शोषण
- नौकरियों में हिंदी भाषियों को लाभ, दक्षिण भारतीयों को नुकसान
- “हिंदी साम्राज्यवाद” का डर – उत्तर भारतीयों का दक्षिण पर वर्चस्व
- विरोधी नेता: टी.टी. कृष्णमाचारी (मद्रास), शंकर राव देव (हैदराबाद)
- चेतावनी: कृष्णमाचारी ने कहा कि हिंदी थोपने से देश टूट सकता है
3. अंग्रेजी समर्थक पक्ष:
- तर्क:
- अंग्रेजी पहले से प्रशासन, शिक्षा, न्यायालयों में प्रयुक्त
- अंतर्राष्ट्रीय भाषा – विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार के लिए आवश्यक
- सभी शिक्षित भारतीय अंग्रेजी जानते हैं – तटस्थ भाषा
- भाषाई विवाद से बचने का तरीका
- समर्थक: फ्रैंक एंथनी (एंग्लो-इंडियन समुदाय)
4. समझौतावादी पक्ष:
- नेहरू, सरदार पटेल ने मध्यम मार्ग का समर्थन किया
- हिंदी + अंग्रेजी + क्षेत्रीय भाषाओं का सह-अस्तित्व
बहस के मुख्य बिंदु:
| मुद्दा | हिंदी पक्ष | विरोधी पक्ष |
|---|---|---|
| राष्ट्रवाद | भारतीय भाषा राष्ट्रीय गौरव | सभी भारतीय भाषाएं समान रूप से राष्ट्रीय |
| व्यावहारिकता | हिंदी बहुसंख्यकों की भाषा | अंग्रेजी पहले से स्थापित |
| समानता | हिंदी सीखी जा सकती है | हिंदी थोपना असमानता पैदा करेगा |
| राजनीति | उत्तर भारत का प्रभुत्व | क्षेत्रीय स्वायत्तता |
संविधान का अंतिम समझौता (सितंबर 1949):
- अनुच्छेद 343:
- संघ की राजभाषा हिंदी होगी, देवनागरी लिपि में
- संख्याओं का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप (1, 2, 3…)
- अनुच्छेद 343(3) – अंग्रेजी को 15 साल का समय:
- 26 जनवरी 1950 से 15 वर्षों तक (1965 तक) अंग्रेजी का उपयोग जारी
- इस अवधि में हिंदी को विकसित और प्रसारित करना
- अनुच्छेद 344:
- राजभाषा आयोग की स्थापना
- 5 वर्ष बाद राष्ट्रपति सिफारिशों पर विचार करेंगे
- अनुच्छेद 345-347:
- राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने का अधिकार
- तमिलनाडु ने तमिल, बंगाल ने बंगाली को चुना
- 8वीं अनुसूची:
- 14 भाषाओं को मान्यता (अब 22)
- हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, आदि
1965 का संकट और राजभाषा अधिनियम:
- 1965 में 15 साल पूरे होने पर हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाना था
- तमिलनाडु में हिंसक विरोध प्रदर्शन, आत्मदाह के मामले
- राजभाषा अधिनियम 1963 (संशोधन 1967):
- अंग्रेजी अनिश्चितकाल तक जारी रहेगी
- हिंदी + अंग्रेजी दोनों राजभाषा
- यह व्यवस्था आज तक जारी है
त्रिभाषा फार्मूला (Three Language Formula):
शिक्षा में समझौता:
- हिंदी भाषी राज्य: हिंदी + अंग्रेजी + एक दक्षिण भारतीय भाषा
- गैर-हिंदी राज्य: क्षेत्रीय भाषा + हिंदी + अंग्रेजी
बहस का महत्व और प्रभाव:
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया: सभी पक्षों को सुना गया, जबरदस्ती नहीं की गई
- राष्ट्रीय एकता: बहस ने दिखाया कि भाषा पहचान का मुद्दा है, इसे संवेदनशीलता से निपटाना जरूरी है
- संघवाद का सिद्धांत: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संतुलन
- बहुलवादी समाज: भारत की भाषाई विविधता को स्वीकार किया गया
- राजनीतिक प्रभाव:
- द्रविड़ आंदोलन को बल मिला
- DMK पार्टी का उदय (तमिलनाडु)
- क्षेत्रीय दलों की राजनीति मजबूत हुई
आज की स्थिति:
- हिंदी राजभाषा है लेकिन अंग्रेजी का व्यापक उपयोग
- सर्वोच्च न्यायालय, संसद, प्रशासन में दोनों भाषाएं
- राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभुत्व
- बहस अभी भी जारी – हिंदी दिवस पर विवाद, नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूला
निष्कर्ष: भाषा प्रश्न पर संविधान सभा की बहस भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का उदाहरण है। हिंदी को राजभाषा बनाते हुए भी अन्य भाषाओं का सम्मान और अंग्रेजी को जारी रखने का निर्णय व्यावहारिकता और राष्ट्रीय एकता का संतुलन दर्शाता है। यह दिखाता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में समझौता और सह-अस्तित्व ही सफलता का मार्ग है।
संविधान सभा ने केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के अधिकारों को निश्चित करने के लिए कौन सी सूचियाँ बनाई? समझाइये। 3 Marks
Which lists did the Constituent Assembly prepare to determine the powers of the Central Government and the State Governments? Explain.
भूमिका: संविधान सभा ने भारतीय संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करने के लिए अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची के तहत तीन विस्तृत सूचियां तैयार कीं। यह व्यवस्था कैनेडियन मॉडल से प्रेरित थी लेकिन भारतीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित की गई।
1. संघ सूची (Union List) – सूची I:
- विषयों की संख्या: मूल संविधान में 97 विषय थे, वर्तमान में 100 विषय (विभिन्न संशोधनों के बाद)
- विधायी अधिकार: केवल संसद (केंद्र सरकार) को इन विषयों पर कानून बनाने का अनन्य अधिकार है
- प्रमुख विषय:
- रक्षा और सुरक्षा: सेना, नौसेना, वायुसेना, युद्ध और शांति, परमाणु ऊर्जा, हथियार (प्रविष्टि 1-9)
- विदेशी मामले: विदेश नीति, राजनयिक संबंध, संधियां, संयुक्त राष्ट्र (प्रविष्टि 10-14)
- संचार: रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, जलमार्ग, हवाई यातायात, डाक-तार, टेलीफोन (प्रविष्टि 22-31)
- आर्थिक नियंत्रण: मुद्रा निर्माण, सिक्का ढलाई, विदेशी मुद्रा, बैंकिंग, बीमा, शेयर बाजार (प्रविष्टि 36-46)
- अंतर्राज्यीय मामले: अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य, नदियों का नियमन (प्रविष्टि 42)
- नागरिकता: नागरिकता, पासपोर्ट, प्रवेश और प्रवास (प्रविष्टि 17-18)
- चुनाव: संसद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव (प्रविष्टि 72)
- तर्क: ये विषय राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और समान नीति के लिए आवश्यक हैं, इसलिए केंद्र के पास रखे गए
2. राज्य सूची (State List) – सूची II:
- विषयों की संख्या: मूल संविधान में 66 विषय थे, वर्तमान में 61 विषय (कुछ समवर्ती सूची में स्थानांतरित)
- विधायी अधिकार: केवल राज्य विधानसभाओं को अधिकार, लेकिन विशेष परिस्थितियों में संसद भी कानून बना सकती है (अनुच्छेद 249, 250, 252)
- प्रमुख विषय:
- कानून-व्यवस्था: पुलिस (State Police), जेल, सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) – प्रविष्टि 1-3
- स्थानीय प्रशासन: स्थानीय स्वशासन, नगरपालिकाएं, पंचायतें (प्रविष्टि 5)
- स्वास्थ्य: सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पताल, स्वच्छता (प्रविष्टि 6)
- कृषि: कृषि, कृषि शिक्षा, कीट नियंत्रण, पशुपालन (प्रविष्टि 14-15, 18)
- सिंचाई: जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी (प्रविष्टि 17)
- भूमि: भूमि अधिग्रहण, भू-राजस्व, जमींदारी उन्मूलन (प्रविष्टि 18, 42)
- राज्य कर: भूमि कर, मनोरंजन कर, कृषि आय कर, मद्य कर, बिक्री कर (1956 तक)
- तर्क: ये विषय स्थानीय जरूरतों और क्षेत्रीय विविधता से संबंधित हैं, इसलिए राज्यों के पास रखे गए
3. समवर्ती सूची (Concurrent List) – सूची III:
- विषयों की संख्या: मूल संविधान में 47 विषय, वर्तमान में 52 विषय
- विधायी अधिकार: केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं
- विरोध की स्थिति में: केंद्रीय कानून प्रभावी रहेगा और राज्य का कानून उस सीमा तक अमान्य होगा (अनुच्छेद 254)
- राज्य का विशेष प्रावधान: यदि राज्य का कानून राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर ले, तो वह लागू रह सकता है
- प्रमुख विषय:
- शिक्षा: तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा (42वां संशोधन 1976 में जोड़ा गया – प्रविष्टि 25)
- वन: वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण (प्रविष्टि 17A, 17B – 42वां संशोधन)
- आपराधिक कानून: फौजदारी कानून, दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य कानून (प्रविष्टि 1-2)
- नागरिक कानून: विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, उत्तराधिकार (प्रविष्टि 5)
- आर्थिक नियमन: मूल्य नियंत्रण, व्यापार संघ, औद्योगिक विवाद (प्रविष्टि 33-34)
- सामाजिक कल्याण: सामाजिक सुरक्षा, श्रम कल्याण, मातृत्व लाभ (प्रविष्टि 23-24)
- न्यायिक: सिविल प्रक्रिया, न्यायालय की अवमानना, कानूनी व्यवसायी (प्रविष्टि 3, 11-13)
- तर्क: इन विषयों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर समन्वित कार्रवाई आवश्यक है
4. अवशिष्ट विषय (Residuary Powers):
- अनुच्छेद 248: तीनों सूचियों में उल्लिखित न होने वाले विषय केंद्र सरकार (संसद) के अधीन हैं
- उदाहरण: साइबर कानून, इंटरनेट नियमन, GST (101वां संशोधन 2016)
- तर्क: भविष्य में उत्पन्न होने वाले नए विषयों पर निर्णय के लिए
5. संविधान सभा में बहस और तर्क:
- सरदार पटेल का दृष्टिकोण: राष्ट्रीय एकता के लिए मजबूत केंद्र आवश्यक
- के.एम. मुंशी: विभाजन के बाद विघटनकारी शक्तियों पर नियंत्रण के लिए केंद्रीकरण
- आलोचना: कुछ सदस्यों ने अत्यधिक केंद्रीकरण की आशंका व्यक्त की
- समाधान: समवर्ती सूची और राज्य सूची को पर्याप्त शक्तियां देकर संतुलन बनाया गया
6. ऐतिहासिक विकास:
- 42वां संशोधन (1976): शिक्षा, वन, वन्यजीव, माप-तौल को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया
- 101वां संशोधन (2016): GST के लिए विशेष प्रावधान – संघ सूची में प्रविष्टि 84 और राज्य सूची में प्रविष्टि 54
निष्कर्ष: यह त्रि-स्तरीय सूची व्यवस्था भारतीय संघवाद की आधारशिला है। यह राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय विविधता और स्थानीय स्वायत्तता का सम्मान करती है। यह व्यवस्था केंद्र-राज्य संबंधों में स्पष्टता लाती है और विवादों को कम करती है, साथ ही बदलती परिस्थितियों के अनुसार लचीलापन भी प्रदान करती है।
What activities of the Indus people can you infer from the subsistence strategies of the Indus valley civilization?
भूमिका:
सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता, 3300-1300 ई.पू.) विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक थी। पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से हम सिंधुवासियों के निर्वाह (subsistence) के विभिन्न तरीकों और उनकी आर्थिक गतिविधियों को समझ सकते हैं।
1. कृषि (Agriculture):
कृषि सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था:
- प्रमुख फसलें:
- गेहूं और जौ – मुख्य अनाज (कालीबंगा से प्राप्त जुते हुए खेत के साक्ष्य)
- दालें – मसूर, मटर, चना
- कपास – बनावाली से कपास के साक्ष्य (कपास की खेती का प्राचीनतम प्रमाण)
- तिल, सरसों – तेल के लिए
- फल और सब्जियां – खजूर, तरबूज
- सिंचाई प्रणाली:
- नहरों और कुओं का उपयोग
- धौलावीरा में जल संग्रहण प्रणाली के साक्ष्य
- वर्षा पर निर्भरता कम, नियोजित जल प्रबंधन
- कृषि उपकरण:
- हल (कालीबंगा में हल की खांचें)
- फावड़े, दरांती (तांबे और कांस्य के)
- बैलगाड़ी का उपयोग
2. पशुपालन (Animal Husbandry):
विभिन्न स्थलों से पशुओं की हड्डियां और मुहरों पर उनके चित्र मिले हैं:
- पालतू पशु:
- मवेशी (बैल, गाय) – कृषि और परिवहन के लिए
- भेड़, बकरी – ऊन और मांस के लिए
- सूअर – मांस के लिए
- कुत्ता और बिल्ली – पालतू जानवर
- गधा और ऊंट – परिवहन के लिए
- संभावित उपयोग:
- दूध, मांस, चमड़ा प्राप्ति
- हड्डियों से उपकरण निर्माण
- खाद के लिए गोबर
- घोड़े का प्रश्न: कुछ स्थलों (सुरकोटडा) से घोड़े की हड्डियां मिली हैं, लेकिन यह विवादास्पद है
3. शिकार और मछली पकड़ना:
- जंगली जानवरों की हड्डियां – हिरण, नीलगाय, जंगली सूअर
- मछली की हड्डियां और कांटे प्रचुर मात्रा में मिले हैं
- हरप्पा से प्राप्त एक मुहर पर मछुआरे का चित्र
- पत्थर के फल (arrowheads) और भाले – शिकार उपकरण
- तटीय स्थलों (लोथल) पर समुद्री मछली पकड़ने के साक्ष्य
4. व्यापार (Trade):
निर्वाह के लिए व्यापार भी महत्वपूर्ण था:
- आंतरिक व्यापार:
- विभिन्न क्षेत्रों से कच्चा माल – तांबा (राजस्थान से), सोना (कर्नाटक से), सीसा और चांदी
- मुहरें – व्यापारिक पहचान और मालिकाना हक के लिए
- बाट और माप – मानकीकृत प्रणाली
- विदेशी व्यापार:
- मेसोपोटामिया से व्यापार – मुहरें मेसोपोटामिया में मिली हैं
- लोथल – बंदरगाह शहर, समुद्री व्यापार का केंद्र
- निर्यात – कपास के कपड़े, मोती, हाथीदांत की वस्तुएं
- आयात – चांदी, सोना, कीमती पत्थर
5. शिल्पकारी और उद्योग:
- धातुकर्म:
- तांबा और कांस्य के औजार, हथियार, बर्तन
- मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध ‘नर्तकी’ की कांस्य मूर्ति
- सोने और चांदी के आभूषण
- मिट्टी के बर्तन:
- चाक पर बने लाल रंग के मिट्टी के बर्तन
- काली पेंटिंग – ज्यामितीय और पशु आकृतियां
- मनका निर्माण:
- कार्नेलियन, जैस्पर, क्वार्ट्ज के मनके
- चानुदड़ो – मनका निर्माण का केंद्र
- सूक्ष्म तकनीक – ड्रिलिंग और पॉलिशिंग
- अन्य शिल्प:
- कपड़ा बुनाई – तकली के साक्ष्य
- मुहर निर्माण – स्टीटाइट पत्थर से
- हाथीदांत और शेल का काम
6. खाद्य भंडारण:
- हरप्पा और मोहनजोदड़ो में विशाल अन्नागार (granaries) के अवशेष
- अनाज भंडारण की सुविधा – अधिशेष उत्पादन का संकेत
- घरों में मिट्टी के बड़े मटके – व्यक्तिगत भंडारण
- यह दर्शाता है कि उत्पादन निर्वाह से अधिक था
7. नगर नियोजन और जल प्रबंधन:
ये निर्वाह रणनीतियों को सहायता देते थे:
- सुनियोजित नगर – ग्रिड पैटर्न में सड़कें
- उन्नत जल निकास प्रणाली – स्वच्छता और जल प्रबंधन
- सार्वजनिक स्नानागार (Great Bath) – सामुदायिक जीवन
- कुएं – प्रत्येक घर या सार्वजनिक कुएं
8. सामाजिक संगठन का अनुमान:
निर्वाह तरीकों से सामाजिक संरचना का अनुमान:
- श्रम विभाजन:
- किसान, पशुपालक, शिल्पकार, व्यापारी – विशिष्टीकरण
- अन्नागारों की उपस्थिति – केंद्रीकृत प्रशासन का संकेत
- संभावित शासक वर्ग:
- बड़े घर और छोटे घर – सामाजिक असमानता
- अधिशेष उत्पाद का संग्रहण और वितरण – प्रशासनिक व्यवस्था
9. धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां:
- मुहरों पर पशुपति (योगी की मुद्रा में) – धार्मिक प्रथाएं
- मातृदेवी की मूर्तियां – प्रजनन और कृषि से संबंध
- पवित्र जानवर – बैल की पूजा संभव
- अग्नि कुंड – यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान
10. पतन के संकेत:
- बाद के चरणों में कृषि उत्पादकता में गिरावट
- जलवायु परिवर्तन – नदियों का सूखना
- अतिचारण और वनों की कटाई
- संभावित पर्यावरणीय संकट
निष्कर्ष:
सिंधु सभ्यता के निर्वाह तरीके एक उन्नत और विविधीकृत अर्थव्यवस्था को दर्शाते हैं। कृषि और पशुपालन मुख्य आधार थे, लेकिन शिकार, मछली पकड़ना, शिल्पकारी और व्यापार भी महत्वपूर्ण थे। सिंधुवासी न केवल आत्मनिर्भर थे बल्कि अधिशेष उत्पादन करते थे जो व्यापार और नगरीय जीवन को बनाए रखता था। उनकी गतिविधियां एक सुसंगठित समाज, उन्नत तकनीक और दूरगामी व्यापारिक संपर्कों का संकेत देती हैं। यह सभ्यता अपने समय की सबसे विकसित सभ्यताओं में से एक थी।
यदि सिंधु सभ्यता की लिपि पढ़ ली जाए, तो भारतीय इतिहास लेखन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? 4 Marks
If the Indus civilization script is deciphered, what impact will it have on Indian history writing?
भूमिका:
सिंधु सभ्यता की लिपि आज तक अपठित (undeciphered) है। लगभग 4000 मुहरों और अन्य वस्तुओं पर 400-600 विभिन्न चिह्न मिले हैं, लेकिन इन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। यदि यह लिपि पढ़ ली जाए, तो यह भारतीय और विश्व इतिहास में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी।
वर्तमान स्थिति – लिपि के बिना सीमाएं:
- केवल पुरातात्विक अवशेषों पर निर्भरता
- सिंधुवासियों की भाषा, विचार, धर्म अज्ञात
- राजनीतिक व्यवस्था, शासक, युद्ध के बारे में अनुमान
- सभ्यता के नाम (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो) आधुनिक, मूल नाम अज्ञात
लिपि पढ़ लेने पर संभावित प्रभाव:
1. भाषा और सांस्कृतिक पहचान:
- सिंधुवासियों की मातृभाषा ज्ञात होगी – द्रविड़, संस्कृत या कोई अन्य
- भारतीय भाषाओं के इतिहास पर नई रोशनी
- आर्य-द्रविड़ विवाद का समाधान
- भाषाई निरंतरता या विच्छेद की जानकारी
2. राजनीतिक इतिहास:
- शासकों के नाम और वंश
- राजनीतिक संरचना – राजतंत्र, गणतंत्र या पुरोहित शासन
- विभिन्न नगरों के बीच संबंध – एकीकृत साम्राज्य या स्वतंत्र नगर-राज्य
- युद्ध, संधियां, राजनयिक संबंध
- सभ्यता के पतन का सही कारण – आक्रमण, प्राकृतिक आपदा या आंतरिक पतन
3. धर्म और दर्शन:
- देवी-देवताओं के नाम और उनकी पूजा पद्धति
- धार्मिक ग्रंथ या मिथक
- हिंदू धर्म, जैन और बौद्ध धर्म से संबंध
- मुहरों पर ‘पशुपति’ – शिव या कोई अन्य देवता
- मातृदेवी पूजा का स्वरूप
4. सामाजिक संरचना:
- वर्ण/जाति व्यवस्था की उपस्थिति या अनुपस्थिति
- परिवार संरचना – मातृसत्तात्मक या पितृसत्तात्मक
- विवाह प्रथाएं, संपत्ति के अधिकार
- सामाजिक असमानता की प्रकृति
- दास प्रथा की उपस्थिति
5. आर्थिक गतिविधियां:
- व्यापारिक रिकॉर्ड – मुहरें व्यापारिक दस्तावेज हो सकती हैं
- मूल्य, कर प्रणाली, आर्थिक लेन-देन
- विदेशी व्यापार के विस्तृत विवरण
- भूमि स्वामित्व, कृषि उत्पादन के रिकॉर्ड
6. विज्ञान और प्रौद्योगिकी:
- गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा का ज्ञान
- माप-तौल की प्रणाली की सटीक जानकारी
- नगर नियोजन और स्थापत्य के सिद्धांत
- धातुकर्म और शिल्प तकनीक
7. अन्य सभ्यताओं से संबंध:
- मेसोपोटामिया के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के विवरण
- मेलुहा (सिंधु सभ्यता का मेसोपोटामियाई नाम) की पुष्टि
- अन्य समकालीन सभ्यताओं के साथ संबंध
- सांस्कृतिक प्रभाव और उधार
8. भारतीय इतिहास की कालक्रम:
- सटीक तिथियां और घटनाक्रम
- वैदिक संस्कृति के साथ संबंध या अंतर
- आर्यों के आगमन का प्रश्न – मूल निवासी या बाहरी
- सभ्यता के विभिन्न चरणों की बेहतर समझ
9. साहित्य और कला:
- संभावित साहित्यिक परंपरा
- कविता, कथाएं, ऐतिहासिक वृत्तांत
- कला और मूर्तिकला के प्रतीकात्मक अर्थ
- संगीत और नृत्य की जानकारी
10. क्षेत्रीय इतिहास:
- विभिन्न सिंधु स्थलों के बीच संबंध
- स्थानीय शासन व्यवस्था
- क्षेत्रीय विविधता और एकरूपता
भारतीय इतिहास लेखन पर व्यापक प्रभाव:
- पूर्व-वैदिक इतिहास की पुनर्व्याख्या:
- भारतीय इतिहास 1500 ई.पू. से नहीं बल्कि 3300 ई.पू. से लिखित दस्तावेजों के साथ
- वैदिक और हड़प्पा संस्कृति का सटीक संबंध
- हिंदू धर्म की उत्पत्ति:
- हिंदू धर्म के तत्व – योग, शिव पूजा, देवी पूजा – सिंधु से या वैदिक
- धार्मिक निरंतरता या विच्छेद
- आर्य आगमन सिद्धांत:
- आर्य बाहरी आक्रमणकारी या मूल निवासी – स्पष्ट उत्तर
- भाषाई और सांस्कृतिक निरंतरता
- द्रविड़ संस्कृति:
- यदि भाषा द्रविड़ है तो द्रविड़ सभ्यता की प्राचीनता सिद्ध होगी
- उत्तर-दक्षिण सांस्कृतिक संबंध
- भारतीय विज्ञान और गणित:
- प्राचीन भारतीय ज्ञान की समृद्धि
- शून्य, दशमलव प्रणाली की प्राचीनता
विश्व इतिहास पर प्रभाव:
- प्राचीन सभ्यताओं के बीच संबंधों की नई समझ
- विश्व व्यापार का इतिहास
- मानव संस्कृति के विकास की बेहतर तस्वीर
चुनौतियां और सीमाएं:
- लिपि पढ़ लेना पर्याप्त नहीं – साहित्य की आवश्यकता
- मुहरों पर केवल संक्षिप्त लेख – सीमित जानकारी
- व्याख्या में विवाद संभव
- लंबे ग्रंथों की अनुपस्थिति
निष्कर्ष:
सिंधु लिपि को पढ़ लेना भारतीय इतिहास में एक नए युग की शुरुआत होगी। यह न केवल प्राचीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संरचना को स्पष्ट करेगा, बल्कि भारतीय संस्कृति की निरंतरता और विकास को समझने में मदद करेगा। आर्य-द्रविड़ विवाद, हिंदू धर्म की उत्पत्ति और भारतीय सभ्यता की प्राचीनता जैसे विवादास्पद प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे। यह भारतीय इतिहास लेखन को अधिक प्रामाणिक, विस्तृत और वैज्ञानिक बनाएगा। साथ ही, विश्व इतिहास में भारत की भूमिका और योगदान की नई पहचान होगी। सिंधु लिपि का रहस्य सुलझना इतिहासकारों का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बना हुआ है।
Analyse the contribution of Alvars and Nayanars to the early Bhakti movement.
भूमिका:
भक्ति आंदोलन का प्रारंभ दक्षिण भारत (तमिलनाडु) से 6वीं-9वीं शताब्दी में हुआ। अलवार और नयनार इस आंदोलन के अग्रदूत थे जिन्होंने धर्म, समाज और साहित्य में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए।
अलवार और नयनार कौन थे:
- अलवार: वैष्णव भक्त जो भगवान विष्णु की उपासना करते थे (12 अलवार – आंडाल, नम्मालवार, आदि)
- नयनार: शैव भक्त जो भगवान शिव की उपासना करते थे (63 नयनार – अप्पार, सुंदरर, संबंदर, आदि)
- काल: 6वीं से 9वीं शताब्दी CE
- क्षेत्र: मुख्यतः तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्र
1. धार्मिक योगदान:
- व्यक्तिगत भक्ति (Personal Devotion):
- ईश्वर से सीधा, व्यक्तिगत संबंध – बीच में पुरोहित की आवश्यकता नहीं
- भावनात्मक जुड़ाव – प्रेम, आत्मसमर्पण (प्रपत्ति)
- सगुण उपासना – मूर्ति और मंदिर की महत्ता
- बौद्ध और जैन धर्म का विरोध:
- 6वीं सदी में दक्षिण भारत में बौद्ध-जैन धर्म प्रभावशाली थे
- अलवारों और नयनारों ने वैदिक धर्म (हिंदू धर्म) को पुनर्जीवित किया
- मूर्तिपूजा का समर्थन (बौद्ध-जैन के विपरीत जो अनीश्वरवादी थे)
- परिणाम: दक्षिण भारत में हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना
- पवित्र स्थलों का महत्व:
- तीर्थ यात्रा की परंपरा – अलवारों ने 108 दिव्य देश (विष्णु मंदिर)
- नयनारों ने शिव के पवित्र स्थलों की यात्रा
- मंदिरों को धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाया
2. साहित्यिक योगदान:
- तमिल भक्ति साहित्य:
- अलवारों की रचनाएं: नालयिर दिव्य प्रबंधम (4000 पवित्र रचनाएं)
- नयनारों की रचनाएं: तेवारम और तिरुवासगम
- तमिल भाषा में – आम लोगों की भाषा, संस्कृत नहीं
- भावनात्मक कविताएं – ईश्वर के प्रति प्रेम, विरह, समर्पण
- भाषा का लोकतांत्रिकरण:
- संस्कृत केवल ब्राह्मणों की भाषा थी
- तमिल में रचनाएं सभी के लिए सुलभ
- तमिल को पवित्र भाषा का दर्जा
- महिला भक्तों का योगदान:
- आंडाल – एकमात्र महिला अलवार, तिरुप्पावई और नच्चियार तिरुमोलि की रचयिता
- कराईकल अम्मैयार – नयनार महिला भक्त
- स्त्री-भक्ति साहित्य – महिलाओं की धार्मिक भागीदारी
3. सामाजिक योगदान:
- जाति व्यवस्था का विरोध:
- अलवार और नयनार विभिन्न जातियों से थे
- निम्न जाति के भक्त: नन्दनार (चर्मकार), तिरुपान अलवार (पणन जाति)
- उच्च जाति के भक्त: संबंदर (ब्राह्मण)
- संदेश: भक्ति में जाति का कोई महत्व नहीं
- समानता का संदेश:
- ईश्वर के सामने सभी समान
- भक्ति किसी का एकाधिकार नहीं
- सामाजिक बाधाओं को चुनौती
- महिलाओं की भूमिका:
- आंडाल ने साबित किया कि महिलाएं भी आध्यात्मिक नेतृत्व कर सकती हैं
- महिला भक्तों का सम्मान
4. राजनीतिक प्रभाव:
- चोल राजाओं का समर्थन:
- चोल शासकों (9वीं-13वीं सदी) ने भक्ति आंदोलन को संरक्षण दिया
- भव्य मंदिरों का निर्माण – बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर)
- राजनीतिक एकीकरण में सहायक
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद:
- तमिल पहचान को मजबूत किया
- स्थानीय संस्कृति का गौरव
5. दार्शनिक योगदान:
- विशिष्टाद्वैत का आधार:
- रामानुज (11वीं-12वीं सदी) ने अलवारों के विचारों को दार्शनिक आधार दिया
- विशिष्टाद्वैत वेदांत – ईश्वर और जीव अलग लेकिन संबंधित
- प्रपत्ति (आत्मसमर्पण) मार्ग
- शैव सिद्धांत:
- नयनारों के विचार शैव सिद्धांत दर्शन में विकसित हुए
- शिव की कृपा (अनुग्रह) से मोक्ष
6. मंदिर परंपरा:
- मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र
- संगीत, नृत्य, कला का विकास – भरतनाट्यम की जड़ें
- मंदिर वास्तुकला का विकास – द्रविड़ शैली
7. संगीत और कला:
- भजन और कीर्तन परंपरा की शुरुआत
- कर्नाटक संगीत में भक्ति गीतों का समावेश
- मंदिर में देवदासी परंपरा – नृत्य के माध्यम से भक्ति
8. उत्तर भारत में प्रभाव:
- भक्ति आंदोलन 12वीं सदी में उत्तर भारत में फैला
- रामानंद, कबीर, तुलसीदास, सूरदास – सभी अलवार-नयनार परंपरा से प्रभावित
- निर्गुण और सगुण भक्ति दोनों की जड़ें दक्षिण में
9. चोल शासन में योगदान:
- राजराज चोल और राजेंद्र चोल ने भक्ति संतों का सम्मान किया
- तेवारम का संकलन राजाओं के संरक्षण में
- मंदिर निर्माण में प्रेरणा – बृहदेश्वर, गंगैकोंड चोलपुरम
10. आधुनिक प्रासंगिकता:
- आज भी तमिल वैष्णव और शैव इन संतों के गीत गाते हैं
- भरतनाट्यम में अलवार-नयनार की रचनाओं का प्रयोग
- तमिल साहित्य और पहचान का अभिन्न अंग
प्रमुख अलवार और नयनार:
| अलवार (वैष्णव) | नयनार (शैव) |
|---|---|
| 1. नम्मालवार (सबसे महान) | 1. अप्पार (तिरुनावुक्करसु) |
| 2. आंडाल (एकमात्र महिला) | 2. संबंदर (तिरुज्ञान संबंदर) |
| 3. तिरुप्पान अलवार | 3. सुंदरर (सुंदरमूर्ति) |
| 4. पेरियालवार (आंडाल के पिता) | 4. माणिक्कवासगर (तिरुवासगम के रचयिता) |
| 5. कुलशेखर अलवार | 5. नन्दनार (दलित भक्त) |
निष्कर्ष:
अलवारों और नयनारों ने भारतीय धार्मिक इतिहास में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। उन्होंने भक्ति को एक सरल, सुलभ और समावेशी मार्ग बनाया जो जाति, लिंग, भाषा की बाधाओं से परे था। उनके द्वारा रचित तमिल साहित्य आज भी जीवित है और दक्षिण भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने न केवल हिंदू धर्म को पुनर्जीवित किया बल्कि एक ऐसी परंपरा की नींव रखी जो पूरे भारत में फैली और मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का आधार बनी। उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है – ईश्वर की प्राप्ति केवल प्रेम और भक्ति से होती है, जन्म या सामाजिक स्थिति से नहीं।
भक्ति आंदोलन में कर्नाटक की वीरशैव परंपरा के योगदान का विश्लेषण कीजिए। 4 Marks
Analyse the contribution of the Veerashaiva tradition of Karnataka to the Bhakti movement.
भूमिका: वीरशैव या लिंगायत परंपरा भारतीय भक्ति आंदोलन की सबसे क्रांतिकारी और सामाजिक रूप से प्रगतिशील शाखाओं में से एक है। 12वीं शताब्दी में कर्नाटक के कल्याण (आधुनिक बसवकल्याण) में बसवण्णा (बसवेश्वर) के नेतृत्व में विकसित यह आंदोलन न केवल धार्मिक सुधार बल्कि एक व्यापक सामाजिक क्रांति था।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- काल: 12वीं शताब्दी (लगभग 1134-1196 ई.)
- स्थान: कल्याणी (कर्नाटक), कलचुरी वंश के राजा बिज्जल के शासनकाल में
- संस्थापक: बसवण्णा (1131-1167 ई.), जो स्वयं राजा के मंत्री थे
- सामाजिक संदर्भ: जाति-आधारित कठोर सामाजिक विभाजन, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का प्रभुत्व, महिलाओं की दयनीय स्थिति
2. प्रमुख नेतृत्वकर्ता और संत:
- बसवण्णा (बसवेश्वर): आंदोलन के मुख्य प्रणेता, ब्राह्मण परिवार में जन्मे लेकिन जातिवाद के विरोधी, प्रसिद्ध वचन “काय काविक काम अल्ल” (देह ही शिव का मंदिर है) के रचयिता
- अक्कमहादेवी: महिला संत कवयित्री, अत्यंत साहसी व्यक्तित्व, सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी, उनके वचन स्त्री मुक्ति के प्रतीक
- अल्लम प्रभु: रहस्यवादी संत, दार्शनिक विचारक, “अनुभव मंटप” (अनुभव का मंच) के प्रमुख सदस्य
- चेन्नबसवण्णा, सिद्धराम, माहादेव्यक्का: अन्य प्रमुख संत जिन्होंने आंदोलन को मजबूत किया
3. सामाजिक क्रांति और समानता:
- जाति व्यवस्था का कट्टर विरोध: बसवण्णा ने स्पष्ट घोषणा की – “जाति कोई बाधा नहीं, गुण और कर्म महत्वपूर्ण हैं”। उन्होंने विभिन्न जातियों के लोगों को समान मंच पर लाया।
- अनुभव मंटप (अनुभव का मंच): बसवण्णा ने कल्याण में एक अनूठी लोकतांत्रिक संस्था की स्थापना की जहां सभी वर्गों के लोग – ब्राह्मण, शूद्र, महिला, पुरुष – समान रूप से आध्यात्मिक चर्चा में भाग लेते थे।
- अंतर्जातीय विवाह: बसवण्णा ने एक ब्राह्मण लड़की और एक ‘अछूत’ लड़के के विवाह को मान्यता दी, जो उस समय अकल्पनीय था।
- व्यावसायिक समानता: सभी व्यवसायों को समान सम्मान – बुनकर, किसान, लोहार, कुम्हार सभी बराबर।
4. महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन:
- महिला संतों की भागीदारी: अक्कमहादेवी, माहादेव्यक्का, निलम्बिका जैसी महिलाएं आंदोलन की प्रमुख नेता थीं
- शिक्षा का अधिकार: महिलाओं को धार्मिक शिक्षा, वचन रचना और सार्वजनिक प्रवचन का अधिकार
- विवाह और पुनर्विवाह: महिलाओं को विवाह में चुनाव का अधिकार, विधवा पुनर्विवाह की अनुमति
- अक्कमहादेवी का साहस: उन्होंने पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खुली चुनौती दी, परंपरागत वस्त्रों को त्यागकर आध्यात्मिक मुक्ति की खोज की
5. वचन साहित्य – लोकभाषा में आध्यात्मिकता:
- वचन क्या है: कन्नड़ भाषा में रचित छोटी, मुक्त छंद की कविताएं (वचन = वचन, कहना)
- विशेषताएं: सरल भाषा, लयबद्ध, दार्शनिक गहराई, सामाजिक टिप्पणी, व्यक्तिगत अनुभव
- लोकतांत्रिक साहित्य: संस्कृत के स्थान पर कन्नड़ का उपयोग – आम जनता तक पहुंच
- संख्या: लगभग 50,000 से अधिक वचन संरक्षित, जिनमें बसवण्णा के लगभग 1300 वचन
- विषयवस्तु: ईश्वर प्रेम, सामाजिक न्याय, नैतिकता, कर्मकांड विरोध, जीवन दर्शन
6. धार्मिक दर्शन और विश्वास:
- “काय काविक काम अल्ल” (देह ही मंदिर है): बसवण्णा का प्रसिद्ध वचन – मानव शरीर ही शिव का मंदिर है, बाहरी पत्थर के मंदिरों की आवश्यकता नहीं
- कर्मकांड विरोध: मूर्तिपूजा, यज्ञ, तीर्थयात्रा, जप-तप को अनावश्यक माना। आंतरिक भक्ति और सच्चे कर्म पर जोर।
- इष्टलिंग: व्यक्तिगत शिवलिंग जिसे हर अनुयायी गले में धारण करता है – यह व्यक्तिगत आध्यात्मिकता का प्रतीक
- शरण (शरणार्थी): अनुयायियों को ‘शरण’ कहा गया – जो शिव की शरण में आए हैं
- निर्गुण भक्ति: निराकार शिव की भक्ति, रूप-रंग से परे
7. कायक और दासोह – श्रम की गरिमा:
- कायक (ईमानदार श्रम): प्रत्येक व्यक्ति को अपने हाथों से ईमानदारी से कमाना चाहिए। आलस्य पाप है। सभी व्यवसाय पवित्र हैं।
- दासोह (सेवा और दान): अपनी कमाई का एक हिस्सा समाज सेवा में लगाना। परोपकार और साझा भोजन (लंगर) की परंपरा।
- भिक्षावृत्ति का विरोध: भीख मांगने को हेय दृष्टि से देखा गया। हर व्यक्ति को कार्य करना चाहिए।
- आधुनिक प्रासंगिकता: यह सिद्धांत महात्मा गांधी के ‘ब्रेड लेबर’ (शारीरिक श्रम) के विचार से मिलता-जुलता है
8. भक्ति आंदोलन में विशिष्ट योगदान:
- सबसे कट्टरपंथी सुधार: अन्य भक्ति संतों की तुलना में वीरशैव आंदोलन ने सबसे मजबूत सामाजिक चुनौती दी
- संगठित आंदोलन: अनुभव मंटप जैसी संस्थागत संरचना – यह व्यवस्थित सामाजिक आंदोलन था
- स्थायी प्रभाव: आज भी लगभग 2 करोड़ लिंगायत समुदाय कर्नाटक में मौजूद है
- साहित्यिक धरोहर: कन्नड़ साहित्य का स्वर्ण युग – वचन साहित्य आज भी अध्ययन और प्रेरणा का स्रोत
9. ऐतिहासिक प्रभाव और आधुनिक प्रासंगिकता:
- सामाजिक सुधार परंपरा: 19वीं-20वीं सदी के सामाजिक सुधारकों (ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर) के लिए प्रेरणा
- महिला अधिकार: भारतीय इतिहास में महिला सशक्तीकरण का प्रारंभिक उदाहरण
- श्रम की गरिमा: कार्ल मार्क्स से पहले ही श्रम के महत्व पर बल
- धर्मनिरपेक्षता: धर्म को सामाजिक न्याय से जोड़ने की परंपरा
10. सीमाएं और आलोचना:
- राजनीतिक विरोध: कट्टरपंथी विचारों के कारण तत्कालीन सत्ता से टकराव, बसवण्णा को कल्याण छोड़ना पड़ा
- सीमित भौगोलिक प्रसार: मुख्यतः कर्नाटक तक सीमित रहा
- कालांतर में रूढ़िवाद: बाद में लिंगायत समुदाय भी कुछ हद तक जाति व्यवस्था में शामिल हो गया
निष्कर्ष: कर्नाटक की वीरशैव परंपरा ने भक्ति आंदोलन को केवल आध्यात्मिक आंदोलन तक सीमित नहीं रखा बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक क्रांति में रूपांतरित कर दिया। जाति उन्मूलन, लैंगिक समानता, श्रम की गरिमा, लोकभाषा साहित्य और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में इसका योगदान अद्वितीय है। यह परंपरा आधुनिक भारत में भी सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
(अ) मांडा (ब) मास्की (स) नासिक (द) अंबाला
Mark the following historical places in the outline map of India:
(A) Manda (B) Maski (C) Nasik (D) Ambala
परीक्षा में आपको भारत का रेखा-मानचित्र दिया जाएगा। निम्नलिखित स्थानों को सही स्थिति पर अंकित करें:
स्थलों की जानकारी और स्थिति:
- (अ) मांडा (Manda):
- राज्य: जम्मू-कश्मीर (अब जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश)
- नदी: चेनाब नदी के तट पर
- महत्व: हड़प्पा सभ्यता का उत्तरतम स्थल
- मानचित्र में स्थिति: भारत के सबसे उत्तर में, जम्मू के पास
- (ब) मास्की (Maski):
- राज्य: कर्नाटक
- जिला: रायचूर जिला
- महत्व: अशोक का लघु शिलालेख – यहां पहली बार ‘अशोक’ नाम मिला
- मानचित्र में स्थिति: कर्नाटक में, बेल्लारी-रायचूर क्षेत्र में
- (स) नासिक (Nasik):
- राज्य: महाराष्ट्र
- नदी: गोदावरी नदी के तट पर
- महत्व: प्राचीन व्यापारिक केंद्र, बौद्ध गुफाएं, कुंभ मेला स्थल
- मानचित्र में स्थिति: महाराष्ट्र में, मुंबई के पूर्वोत्तर में
- (द) अंबाला (Ambala):
- राज्य: हरियाणा
- महत्व: 1857 के विद्रोह का महत्वपूर्ण केंद्र, सैन्य छावनी
- मानचित्र में स्थिति: हरियाणा में, चंडीगढ़ के दक्षिण में
- पहले राज्यों की सीमाएं और प्रमुख नदियां पहचानें
- स्थलों को छोटे बिंदु (•) से अंकित करें
- नाम स्पष्ट और सुपाठ्य लिखें
- तीर का निशान लगाकर नाम लिखें यदि स्थान छोटा है
- एटलस और मानचित्रों का नियमित अभ्यास करें
- हड़प्पा स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा, धौलावीरा, बनावाली
- अशोक के अभिलेख: मास्की, गुर्जरा, कालसी, टोपरा, मेरठ
- बौद्ध स्थल: सांची, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, अमरावती
- 1857 स्थल: मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, झांसी, बरेली
- राष्ट्रीय आंदोलन: चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद, दांडी, बारडोली
भारत के रेखा-मानचित्र में निम्नलिखित ऐतिहासिक स्थलों को अंकित कीजिए: 4 Marks
(अ) मिताथल (ब) कलिंग (स) अमरावती (द) सहारनपुर
Mark the following historical places in the outline map of India:
(A) Mitathal (B) Kalinga (C) Amaravati (D) Saharanpur
स्थलों की जानकारी और स्थिति:
- (अ) मिताथल (Mitathal):
- राज्य: हरियाणा
- जिला: भिवानी जिला
- महत्व: हड़प्पा सभ्यता का स्थल
- मानचित्र में स्थिति: हरियाणा में, दिल्ली के पश्चिम में
- (ब) कलिंग (Kalinga):
- प्राचीन क्षेत्र: वर्तमान ओडिशा और आंध्र प्रदेश का तटीय भाग
- महत्व: 261 ई.पू. में अशोक और कलिंग के बीच प्रसिद्ध युद्ध
- मानचित्र में स्थिति: ओडिशा तट, पुरी-भुवनेश्वर क्षेत्र
- (स) अमरावती (Amaravati):
- राज्य: आंध्र प्रदेश
- नदी: कृष्णा नदी के तट पर
- महत्व: प्राचीन बौद्ध स्तूप, सातवाहन काल का महत्वपूर्ण केंद्र
- मानचित्र में स्थिति: आंध्र प्रदेश में, विजयवाड़ा के पास
- (द) सहारनपुर (Saharanpur):
- राज्य: उत्तर प्रदेश
- महत्व: मुगलकालीन शहर, 1857 के विद्रोह का केंद्र
- मानचित्र में स्थिति: उत्तर प्रदेश के सबसे उत्तर में, दिल्ली के उत्तर-पूर्व में
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नियमित अध्ययन और अभ्यास से ही परीक्षा में सफलता मिलती है।
This complete model paper with 53 solved questions will help you prepare thoroughly for your exams.
कुल प्रश्न / Total Questions: 53 | कुल अंक / Total Marks: 80 | समय / Duration: 3:15 hours
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