पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ में कवि कहते हैं “हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया” अर्थात हरे वृक्षों और सुंदर लताओं की माला रमणीय है। यह पाठ पर्यावरण शुद्धता पर केंद्रित है।
(ii)‘बुद्धिर्बलवती सदा’ कथा कुतः संगृहीता?
(अ) हितोपदेशतः
(ब) शुकसप्ततितः
(स) बृहत्कथातः
(द) पंचतन्त्रतः
✅ उत्तरम्: (ब) शुकसप्ततितः
‘शुकसप्ततिः’ (तोते की सत्तर कहानियाँ) नामक कथा संग्रह से यह पाठ लिया गया है, जिसमें एक बुद्धिमती महिला अपनी बुद्धि से बाघ के भय से मुक्त होती है।
(iii)सर्वेष्वपत्येषु जननी कीदृशी भवति?
(अ) तुल्यवत्सला
(ब) प्रसन्ना
(स) कातरा
(द) असमम्
✅ उत्तरम्: (अ) तुल्यवत्सला
जननी (माता) सभी संतानों (अपत्येषु) पर समान स्नेह (तुल्यवत्सला) रखने वाली होती है, यद्यपि दुर्बल पुत्र पर उसका स्नेह अधिक होता है।
(iv)सम्पत्तौ विपत्तौ च केषाम् एकरूपता भवति?
(अ) धनिकानाम्
(ब) बालानाम्
(स) महताम्
(द) निर्धनानाम्
✅ उत्तरम्: (स) महताम्
श्लोक: “सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता”। महान लोग सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में समान (स्थिर) रहते हैं, जैसे सूर्य उगते और डूबते समय लाल रहता है।
(v)कः वातावरणं कर्कशध्वनिना आकुलीकरोति?
(अ) काकः
(ब) मयूरः
(स) कपोतः
(द) पिकः
✅ उत्तरम्: (अ) काकः
कौआ (काकः) अपनी कठोर (कर्कश) आवाज से वातावरण को व्याकुल करता है। कोयल (पिकः) की आवाज मधुर होती है।
(vi)आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात्?
(अ) हितम्
(ब) प्रियम्
(स) अहितम्
(द) अनुकूलम्
✅ उत्तरम्: (स) अहितम्
जो मनुष्य अपना भला (श्रेय) चाहता है, उसे दूसरों के लिए कभी भी अहितकर (बुरा) कर्म नहीं करना चाहिए।
‘विशीर्णाः’ का शाब्दिक अर्थ है ‘टूटा हुआ’, ‘बिखरा हुआ’ या ‘नष्ट हुआ’। यहाँ टूटी हुई सीढ़ियों के संदर्भ में है।
(viii)‘अम्भोदाः’ बहवो हि सन्ति – रेखाङ्कितपदस्य अर्थः?
(अ) खगाः
(ब) कमलानि
(स) पर्वताः
(द) मेघाः
✅ उत्तरम्: (द) मेघाः
शब्द व्युत्पत्ति: अम्भः (जल) + दा (देने वाला) = अम्भोदः। जल देने वाला कौन? मेघ (बादल)।
व्याकरण-सम्बन्धि-प्रश्नाः (Grammar Questions):
(ix)‘प्रकृतिः + एव’ इत्यस्य सन्धिपदं किम्?
(अ) प्रकृतिरेव
(ब) प्रकृति एव
(स) प्रकृतिमेव
(द) प्रकृत्यैव
✅ उत्तरम्: (अ) प्रकृतिरेव
नियम (ऋत्व विसर्ग सन्धि): यदि विसर्ग (:) से पहले ‘अ/आ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो और बाद में कोई भी स्वर या घोष वर्ण हो, तो विसर्ग का ‘र्’ हो जाता है। (प्रकृतिः + एव = प्रकृतिर् + एव = प्रकृतिरेव)।
(x)‘सञ्चरणम्’ इत्यस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति-
(अ) सम् + चरणम्
(ब) सत् + चरणम्
(स) सन् + चरणम्
(द) संच + रणम्
✅ उत्तरम्: (अ) सम् + चरणम्
नियम (अनुस्वार/परसवर्ण): ‘म्’ के बाद यदि कोई वर्गीय व्यंजन (जैसे ‘च’) आए, तो ‘म्’ उसी वर्ग के पंचम वर्ण (ञ्) में बदल जाता है। सम् + चरणम् = सञ्चरणम्।
(xi)पररूपसन्धेः उदाहरणमस्ति-
(अ) कोऽपि
(ब) वयमपि
(स) शकन्धुः
(द) राष्ट्रम्
✅ उत्तरम्: (स) शकन्धुः
वार्तिक: “शकन्ध्वादिषु पररूपम् वाच्यम्”। साधारणतः अ+अ = आ होता है, लेकिन शकन्धु, कर्कन्धु आदि शब्दों में यह ‘अ’ ही रहता है (पररूप हो जाता है)। शक + अन्धुः = शकन्धुः।
(xii)‘उपग्रामम्’ इति पदे कः समासः?
(अ) द्वन्द्वः
(ब) अव्ययीभावः
(स) कर्मधारयः
(द) बहुव्रीहिः
✅ उत्तरम्: (ब) अव्ययीभावः
अव्ययीभाव समास: इसमें प्रथम पद अव्यय (उपसर्ग) होता है और प्रधान होता है। ‘उप’ का अर्थ समीप है। विग्रह: ‘ग्रामस्य समीपम्’ (गाँव के पास)। समस्त पद नपुंसकलिंग एकवचन होता है।
(xiii)‘परितः’ इति पदयोगे का विभक्तिः भवति?
(अ) प्रथमा
(ब) चतुर्थी
(स) षष्ठी
(द) द्वितीया
✅ उत्तरम्: (द) द्वितीया
उपपद विभक्ति: “अभितः परितः समया निकषा हा प्रतियोगेऽपि”। इन सभी शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। (जैसे: ग्रामं परितः वृक्षाः सन्ति)।
(xiv)‘दुह्’ धातुयोगे का विभक्तिः भवति?
(अ) द्वितीया
(ब) तृतीया
(स) चतुर्थी
(द) पंचमी
✅ उत्तरम्: (अ) द्वितीया
सूत्र “अकथितं च”: संस्कृत में 16 द्विकर्मक धातुएं हैं (दुह्, याच, पच्, दण्ड् आदि)। इनके साथ गौण कर्म में भी द्वितीया विभक्ति होती है। (जैसे: गां दोग्धि पयः – गाय से दूध दुहता है)।
(xv)अङ्गविकारे शब्दे का विभक्तिः भवति?
(अ) सप्तमी
(ब) पंचमी
(स) तृतीया
(द) चतुर्थी
✅ उत्तरम्: (स) तृतीया
सूत्र “येनाङ्गविकारः”: जिस अंग में कोई विकार (दोष) दिखाई दे, उस अंग वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। (जैसे: नेत्रेण काणः, पादेन खञ्जः)।
(xvi)_______ गृहं गम्यते। अत्र पूरणीयं पदं किम्?
(अ) अहम्
(ब) मया
(स) माम्
(द) आवाम्
✅ उत्तरम्: (ब) मया
वाच्य परिवर्तन: वाक्य में क्रिया ‘गम्यते’ (आत्मनेपद/कर्मवाच्य) है। कर्मवाच्य में कर्ता में हमेशा तृतीया विभक्ति होती है। ‘अस्मद्’ शब्द की तृतीया एकवचन ‘मया’ है।
(xvii)मम पिता प्रातः (5:15) वादने उत्तिष्ठति।
(अ) सपादषड्
(ब) सार्धपंच
(स) पादोनपंच
(द) सपादपंच
✅ उत्तरम्: (द) सपादपंच
समय लेखन: 15 मिनट = सपाद, 30 मिनट = सार्ध, 45 मिनट = पादोन। 5:15 का अर्थ है सवा पांच। संस्कृत में: सपाद (15) + पंच (5) = सपादपंचवादने।
वाक्य शुद्धि: क्रिया ‘आज्ञापयतु’ (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) है। कर्ता और क्रिया का वचन समान होना चाहिए। ‘भवन्तः’ बहुवचन है, इसका एकवचन रूप ‘भवान्’ है।
अनीयर प्रत्यय: यह ‘चाहिए’ या ‘योग्य’ अर्थ में आता है। शङ्क + अनीयर = शङ्कनीय। चूंकि ‘अत्यादरः’ पुंलिंग है, इसलिए यह ‘शङ्कनीयः’ बना। (ज्यादा आदर शंका के योग्य होता है)।
(ii)बालानां ________ कः न जानाति । (चपल + त्व)
✅ उत्तरम्: चपलत्वम्
त्व प्रत्यय: यह भाववाचक संज्ञा बनाता है और हमेशा नपुंसकलिंग में होता है। चपल + त्व = चपलत्वम् (चंचलता)।
(iii)शक्तिः सदा ________ भवति। (बल + मतुप्)
✅ उत्तरम्: बलवती
मतुप् प्रत्यय: ‘वाला’ अर्थ में। बल + मतुप् = बलवत्। विशेष्य ‘शक्तिः’ स्त्रीलिंग है, इसलिए विशेषण भी स्त्रीलिंग होगा। बलवत् -> बलवती।
(iv)________ कुशलं महाराजस्य ? (अपि, एव, विना)
✅ उत्तरम्: अपि
अव्यय प्रयोग: जब ‘अपि’ वाक्य के आरंभ में आता है, तो यह प्रश्नसूचक (क्या?) बन जाता है। “क्या महाराज कुशल हैं?”
(v)योजकः ________ दुर्लभः। (यत्, इव, तत्र)
✅ उत्तरम्: तत्र
यह प्रसिद्ध श्लोक का अंश है: “अमन्त्रम् अक्षरं नास्ति… योजकस्तत्र दुर्लभः”। तत्र का अर्थ है ‘वहाँ’ (उस स्थिति में)।
(ख) तत्र राजसिंहो नाम राजपुत्रः। -> कः? (पुंलिंग प्रथमा एकवचन)
(ग) विवेकेन निर्णयः शक्यः। -> केन? (तृतीया एकवचन)
11पाठसारः (Summary Writing)
प्रश्न: ‘जननी तुल्यवत्सला’ अथवा ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ का सार हिन्दी में लिखें।
जननी तुल्यवत्सला: यह पाठ महाभारत के वनपर्व से लिया गया है। इसमें बताया गया है कि माता का प्रेम सभी संतानों के लिए समान होता है। जब इन्द्र सुरभि (कामधेनु) से उसके रोने का कारण पूछते हैं, तो वह बताती है कि उसका एक कमजोर पुत्र (बैल) खेत में गिरने पर किसान द्वारा पीटा जा रहा है। यह सुनकर इन्द्र द्रवित हो जाते हैं। संदेश: माता का हृदय कमजोर संतान के प्रति अधिक दयालु होता है।
12गद्यांश-अवबोधनम् (Textual Passage)
विचित्रा दैवगतिः। तस्यामेव रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः… (चौर और अतिथि की कहानी)
(क) चौरः कुत्र प्रविष्टः?उत्तर: गृहाभ्यन्तरम् (घर के अंदर)।
(ख) यद्यपि कः एव चौरः आसीत्?उत्तर: यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौरः आसीत्।
भाषिक कार्य:
1. ‘उच्चैः’ का विशेषण? यह अव्यय है, पर यहाँ क्रिया-विशेषण की तरह है।
2. ‘पलायितः’ में क्रियापद? ‘पलायितः’ (भाग गया – क्त प्रत्यय युक्त क्रिया)।
(i) पेड़ के ऊपर पक्षी बैठे हैं। -> वृक्षस्य उपरि खगाः तिष्ठन्ति। (उपरि के योग में षष्ठी)
(ii) अनीता ने आज खाना नहीं खाया। -> अनीता अद्य भोजनं न अखादत्। (भूतकाल = लङ् लकार)
(iii) राजा प्रजा को धन देता है। -> नृपः प्रजाभ्यः धनं ददाति। (देने के योग में चतुर्थी)
(iv) हम दोनों गाना गाते हैं। -> आवां गीतं गायावः। (आवाम् = हम दोनों, उत्तम पुरुष द्विवचन)
(v) मेरे पिताजी डॉक्टर हैं। -> मम पिता चिकित्सकः अस्ति। (सम्बन्ध में षष्ठी – मम)
(vi) हम 10वीं कक्षा में पढ़ते हैं। -> वयं दशम्यां कक्षायां पठामः। (अधिकरण कारक – सप्तमी)
18कथा-क्रमसंयोजनम् (Story Ordering)
सही क्रम (Correct Sequence):
1. (v) एकदा एकः मकरः नद्यां वसति स्म। (एक बार एक मगरमच्छ नदी में रहता था।)
2. (i) नद्याः तटे फलोपेतः जम्बूवृक्षः आसीत्। (नदी तट पर जामुन का पेड़ था।)
3. (iii) तस्य शाखायां वानरः वसति स्म। (उसकी शाखा पर बंदर रहता था।)
4. (ii) मकरः वानरेण पातितानि मधुरफलानि आस्वाद्य अचिन्तयत्। (मगरमच्छ फल खाकर सोचा…)
5. (vi) “फलानि अतिमधुराणि” अतः वानर हृदयं खादामि। (फल मीठे हैं, तो बंदर का दिल खाऊंगा।)
6. (iv) वानरः मकरस्य प्रयासं बुद्धि चातुर्येण विफलीकृतवान्। (बंदर ने प्रयास विफल किया।)
सतां सङ्गतिः ‘सत्संगतिः’ कथ्यते। (सज्जनों की संगति को सत्संगति कहते हैं।) मानव जीवने सत्संगतेः महती आवश्यकता वर्तते। (मानव जीवन में सत्संगति की बहुत आवश्यकता है।) सत्संगतिः मानवाय यशं सुखं च ददाति। (सत्संगति मनुष्य को यश और सुख देती है।) एषा मानवानां दोष निवारणः करोति। (यह मनुष्यों के दोषों का निवारण करती है।) सत्संगत्या एव विचारधारा पवित्रा भवति। (सत्संगति से ही विचारधारा पवित्र होती है।) अतः मानवः सर्वदा गुणयुक्तः भवेत्। (इसलिए मनुष्य को हमेशा गुणवान होना चाहिए।)
I am a Rajasthan Educational Service (RES) educator with a Master’s and UGC-NET in History and English, backed by BA and B.Ed. With 10+ years of experience in content development, design, and edu-technology, I blend traditional teaching with AI-driven innovations to create engaging, future-ready learning.