अध्याय 2: संघवाद
शक्ति-विभाजन की संवैधानिक व्यवस्था और भारतीय संदर्भ
1. संघवाद का परिचय
संघवाद शासन की वह व्यवस्था है जिसमें शक्ति संविधान द्वारा केंद्र और क्षेत्रीय सरकारों के बीच विभाजित होती है। यह प्रणाली विविधता में एकता बनाए रखते हुए स्थानीय स्वायत्तता को भी संरक्षित करती है।
संघवाद की परिभाषा
संघवाद एक ऐसी शासन प्रणाली है जहाँ:
- दो या अधिक स्तर की सरकारें होती हैं
- प्रत्येक स्तर का स्वतंत्र अधिकार-क्षेत्र होता है
- शक्ति-विभाजन संवैधानिक होता है
- न्यायपालिका संघीय संतुलन की रक्षा करती है
विश्व में संघीय व्यवस्था वाले देश
प्रमुख संघीय देश:
- Coming Together संघ: USA, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा
- Holding Together संघ: भारत, स्पेन, बेल्जियम
- लैटिन अमेरिकी संघ: ब्राज़ील, अर्जेंटीना, मेक्सिको
- यूरोपीय संघ: जर्मनी, ऑस्ट्रिया
विश्व की लगभग 40% जनसंख्या संघीय व्यवस्था वाले देशों में रहती है।
संघवाद = शक्ति का ऊर्ध्वाधर विभाजन
केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन, जिसमें दोनों स्तर संविधान से सीधे अधिकार प्राप्त करते हैं।
संघवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संघवाद की अवधारणा का विकास मध्यकालीन यूरोप में हुआ, जहाँ विभिन्न राज्यों ने सामूहिक सुरक्षा के लिए गठबंधन बनाए। आधुनिक संघवाद का जन्म अमेरिकी संविधान (1787) से माना जाता है।
भारतीय संदर्भ में विकास:
- कैबिनेट मिशन योजना (1946): भारत को एक संघ के रूप में प्रस्तावित किया
- संविधान सभा की बहस: एकात्मक बनाम संघीय – अंततः संघीय ढांचे को अपनाया
- डॉ. आंबेडकर का दृष्टिकोण: “भारत एक संघ है परंतु एकात्मक विशेषताओं के साथ”
क्यों भारत ने संघीय मॉडल चुना?
- विविधता: भाषायी, सांस्कृतिक, धार्मिक विविधता का सम्मान
- विशाल भूभाग: केंद्रीकृत प्रशासन की व्यावहारिक कठिनाई
- लोकतांत्रिक मूल्य: शक्ति के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता
- राष्ट्रीय एकता: क्षेत्रीय पहचान को बनाए रखते हुए एकता
नोट: यह सामग्री आपकी पाठ्यपुस्तक से परे है, लेकिन संघवाद की गहरी समझ के लिए महत्वपूर्ण है। परीक्षा में वर्णनात्मक उत्तरों में इसका उपयोग करें।
2. एकात्मक बनाम संघीय शासन
- एक स्तर की सरकार या केंद्र द्वारा नियंत्रित उपइकाइयाँ
- क्षेत्रीय सरकारें केंद्र के अधीन
- केंद्र सरकार सर्वोच्च
- निर्देश और आदेश की व्यवस्था
- उदाहरण: यूके, चीन, फ्रांस, जापान
- दो या अधिक स्तर की स्वतंत्र सरकारें
- प्रत्येक स्तर का स्वायत्त क्षेत्र
- शक्तियाँ संविधान से प्राप्त
- समन्वय और सहयोग की व्यवस्था
- उदाहरण: USA, भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया
एकात्मक व्यवस्था में क्षेत्रीय सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं, जबकि संघीय व्यवस्था में दोनों स्तर संविधान से स्वतंत्र अधिकार प्राप्त करते हैं।
विश्व के प्रमुख एकात्मक और संघीय देश
एकात्मक व्यवस्था के उदाहरण:
- यूनाइटेड किंगडम: संसदीय संप्रभुता का क्लासिक उदाहरण – संसद सर्वोच्च
- फ्रांस: मजबूत केंद्रीय सरकार, विभाग केंद्र के अधीन
- चीन: साम्यवादी दल का केंद्रीकृत नियंत्रण
- जापान: प्रीफेक्चर केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित
संघीय व्यवस्था की तुलना:
- 50 राज्य – शक्तिशाली राज्य सरकारें
- राज्यों के अपने संविधान
- अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास
- Presidential system
- 10 प्रांत और 3 क्षेत्र
- क्यूबेक को विशेष दर्जा (फ्रेंच भाषा)
- अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास
- Parliamentary system
- 6 राज्य और 2 क्षेत्र
- ब्रिटिश मॉडल से प्रभावित
- शक्तियों का स्पष्ट विभाजन
- Parliamentary system
भारत की अनूठी स्थिति:
भारतीय संविधान ने संघवाद और एकात्मकता का संतुलन बनाया है:
- संघीय तत्व: शक्ति विभाजन, स्वतंत्र राज्य सरकारें, संवैधानिक संरक्षण
- एकात्मक तत्व: आपातकाल, अखिल भारतीय सेवाएँ, एकल नागरिकता, एकल संविधान
- कारण: राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता दोनों की आवश्यकता
नोट: यह तुलनात्मक विश्लेषण पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त है। यह विश्व राजनीति और भारतीय संघवाद की बेहतर समझ के लिए उपयोगी है।
3. संघ-निर्माण के दो मार्ग
विशेषताएँ:
- स्वतंत्र राज्य मिलकर बड़ी इकाई बनाते हैं
- राज्यों के पास अधिक शक्तियाँ
- राज्य अपनी पहचान बनाए रखते हैं
- केंद्र अपेक्षाकृत कमजोर
उदाहरण:
- संयुक्त राज्य अमेरिका (1787)
- स्विट्जरलैंड (1848)
- ऑस्ट्रेलिया (1901)
विशेषताएँ:
- बड़ी इकाई विभाजित होकर संघ बनती है
- केंद्र के पास अधिक शक्तियाँ
- राज्यों की शक्तियाँ असमान हो सकती हैं
- केंद्र अपेक्षाकृत सशक्त
उदाहरण:
- भारत (1950)
- स्पेन
- बेल्जियम
भारत Holding Together संघ है। यहाँ केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली है, और राज्यों की शक्तियों में विविधता हो सकती है (जैसे अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा)।
4. संघवाद की मुख्य विशेषताएँ
सात आधारभूत स्तंभ
1. सरकार के दो या अधिक स्तर
भारत में तीन स्तर: केंद्र, राज्य, स्थानीय
2. स्वतंत्र अधिकार-क्षेत्र
प्रत्येक स्तर का निश्चित विषय-क्षेत्र, जिसमें अन्य हस्तक्षेप नहीं कर सकते
3. संवैधानिक आधार
शक्ति-विभाजन संविधान में स्पष्ट, साधारण कानून से परिवर्तन नहीं
4. संविधान की सर्वोच्चता
सभी स्तर संविधान के अधीन, कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता
5. कठोर संविधान
संशोधन के लिए विशेष बहुमत और कभी-कभी राज्यों की सहमति आवश्यक
6. न्यायपालिका की भूमिका
सर्वोच्च न्यायालय ‘अंपायर’ के रूप में संघीय संतुलन की रक्षा करता है
7. वित्तीय स्वायत्तता
प्रत्येक स्तर के पास स्वतंत्र राजस्व स्रोत
संघवाद की सफलता के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति और सहयोगात्मक दृष्टिकोण भी आवश्यक है।
संघवाद की गतिशीलता: सिद्धांत और व्यवहार
दोहरे संघवाद (Dual Federalism) बनाम सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)
1. दोहरे संघवाद (Layer Cake Model)
- केंद्र और राज्य की स्पष्ट और अलग भूमिकाएँ
- न्यूनतम अतिव्यापन (overlap)
- प्रत्येक अपने क्षेत्र में स्वतंत्र
- उदाहरण: प्रारंभिक अमेरिकी संघवाद (19वीं सदी)
2. सहकारी संघवाद (Marble Cake Model)
- केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं
- कार्यों में अतिव्यापन और समन्वय
- साझा उत्तरदायित्व और संसाधन
- भारत में: GST परिषद, NITI Aayog, राष्ट्रीय योजनाएँ
3. प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism)
- राज्य निवेश और विकास के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं
- सर्वोत्तम प्रथाओं (best practices) को अपनाना
- नीति नवाचार और प्रयोग की प्रयोगशाला
- भारत में: Ease of Doing Business rankings, विभिन्न राज्यों की नीतियाँ
संघीय संतुलन को प्रभावित करने वाले कारक:
- राजनीतिक दल प्रणाली: एक-दलीय प्रभुत्व बनाम बहु-दलीय व्यवस्था
- वित्तीय संसाधन: केंद्र की वित्तीय श्रेष्ठता का प्रभाव
- न्यायिक व्याख्या: न्यायालयों की भूमिका संतुलन बनाने में
- संकट काल: युद्ध, आपदा, आपातकाल में केंद्रीकरण
- लोकप्रिय भावना: क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एकता का संतुलन
असममित संघवाद (Asymmetric Federalism):
भारत में कुछ राज्यों को विशेष दर्जा:
- अनुच्छेद 370 (निरस्त): जम्मू-कश्मीर को विशेष स्वायत्तता
- अनुच्छेद 371: महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, कर्नाटक को विशेष प्रावधान
- 6वीं अनुसूची: पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त परिषदें
- कारण: सांस्कृतिक विविधता, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ, जनजातीय पहचान
नोट: यह उन्नत सामग्री है जो पाठ्यपुस्तक में विस्तार से नहीं दी गई है। यह संघवाद की गहन समझ और उच्च स्तरीय विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण है।
5. भारत: एक अनूठा संघ
संवैधानिक प्रावधान
विधायी शक्ति-विभाजन: तीन सूचियाँ
97 विषय (पहले 98, फिर 99, अब 97 – GST के बाद)
उदाहरण:
- रक्षा और विदेश नीति
- मुद्रा और बैंकिंग
- रेलवे और हवाई यातायात
- डाक और तार
- परमाणु ऊर्जा
61 विषय (पहले 66, अब 61)
उदाहरण:
- पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था
- कृषि और सिंचाई
- स्थानीय शासन
- सार्वजनिक स्वास्थ्य
- राज्य कर
47 विषय (पहले 52, पहले 47, अब 52 – GST के बाद)
उदाहरण:
- शिक्षा
- वन और वन्यजीव
- दीवानी और फौजदारी कानून
- विवाह और तलाक
- जनसंख्या नियंत्रण
टकराव का नियम: संसद का कानून प्रभावी रहेगा
अवशिष्ट शक्तियाँ
अनुच्छेद 248 और संघ सूची की प्रविष्ट 97:
- तीनों सूचियों में न आने वाले विषय संसद के अधिकार में
- उदाहरण: साइबर कानून, अंतरिक्ष कानून
- यह प्रावधान केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाता है
भाषाई प्रावधान
8वीं अनुसूची: 22 भाषाएँ (प्रारंभ में 14)
- हिंदी: संघ की राजभाषा (अनुच्छेद 343)
- अंग्रेजी: सहायक राजभाषा (1965 तक अस्थायी, अब स्थायी)
- राज्यों को अपनी भाषा चुनने का अधिकार
- भाषायी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा (अनुच्छेद 347, 350A, 350B)
भारतीय संघवाद में कुछ एकात्मक तत्व हैं:
- आपातकाल: अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय), 356 (राष्ट्रपति शासन), 360 (वित्तीय)
- अवशिष्ट शक्तियाँ: केंद्र के पास
- राज्यपाल: केंद्र द्वारा नियुक्त
- अखिल भारतीय सेवाएँ: IAS, IPS आदि
- एकल संविधान: राज्यों के लिए अलग संविधान नहीं
6. भारत में संघवाद का अभ्यास
भारत का राज्य पुनर्गठन: ऐतिहासिक विकास
तीन महत्वपूर्ण चरण:
- 1947: स्वतंत्रता – ब्रिटिश प्रांत + 562 रियासतें
- 1950: संविधान लागू – भाग A, B, C, D राज्य
- 1956: राज्य पुनर्गठन अधिनियम – भाषायी आधार पर 14 राज्य
विभाजन और स्वतंत्रता (1947)
प्रमुख चुनौतियाँ:
- 562 रियासतों का एकीकरण – सरदार पटेल की भूमिका
- भाषायी और क्षेत्रीय विविधता का प्रबंधन
- प्रशासनिक पुनर्गठन की तत्काल आवश्यकता
- राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए विविधता को सम्मान
भारत का वर्तमान राजनीतिक मानचित्र
वर्तमान संघीय संरचना (2025):
- 28 राज्य – पूर्ण राज्य सरकारों के साथ
- 8 केंद्र शासित प्रदेश – केंद्र सरकार द्वारा प्रशासित
- दिल्ली और पुडुचेरी को आंशिक राज्य का दर्जा
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (2019 में अलग केंद्र शासित प्रदेश)
भाषायी पुनर्गठन
1920: नागपुर कांग्रेस अधिवेशन – भाषायी आधार पर प्रांतों की मांग
1956: राज्य पुनर्गठन अधिनियम
- 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश
- पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन – आंध्र प्रदेश का गठन (1953)
- फजल अली आयोग (1953) की सिफारिशें
प्रभाव:
- प्रशासन सुगम और प्रभावी
- भाषायी पहचान को मान्यता
- क्षेत्रीय दल और राजनीति का विकास
- राष्ट्रीय एकता को खतरा नहीं, बल्कि सुदृढ़ीकरण
भाषा नीति में लचीलापन
हिंदी के थोपे जाने का विरोध:
- दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में तीव्र विरोध
- 1963: राजभाषा अधिनियम – अंग्रेजी को जारी रखने का प्रावधान
- त्रिभाषा सूत्र: क्षेत्रीय भाषा, हिंदी, अंग्रेजी
- राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने की स्वतंत्रता
परिणाम: भाषायी विविधता का सम्मान, संघीय संतुलन बना रहा
गठबंधन युग और संघवाद
1990 के बाद: क्षेत्रीय दलों का उदय
- एकल-दलीय बहुमत का अंत
- गठबंधन सरकारों का दौर
- राज्यों की सौदेबाजी शक्ति में वृद्धि
- संघीय मामलों में अधिक परामर्श
संस्थागत तंत्र:
- अंतर-राज्यीय परिषद: अनुच्छेद 263 (1990 में गठित)
- नीति आयोग: योजना आयोग के स्थान पर (2015)
- GST परिषद: 101वाँ संशोधन, अनुच्छेद 279A (2016)
न्यायिक नियंत्रण
महत्वपूर्ण निर्णय:
- S.R. Bommai बनाम भारत संघ (1994):
- अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकने के दिशा-निर्देश
- राष्ट्रपति की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन
- राज्य विधानसभा भंग करने से पहले सदन का परीक्षण
- केशवानंद भारती केस (1973):
- संघवाद मूल ढांचे का हिस्सा
- संसद इसे नष्ट नहीं कर सकती
Cooperative Federalism: केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय
- GST परिषद में सर्वसम्मत निर्णय
- NITI Aayog की भागीदारी-आधारित योजना
- राष्ट्रीय आपदाओं में संयुक्त प्रयास
- समान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए साझा प्रयास
समकालीन चुनौतियाँ और सुधार
1. केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव के क्षेत्र
वित्तीय संघवाद की चुनौतियाँ
- ऊर्ध्वाधर असंतुलन: केंद्र के पास अधिक संसाधन, राज्यों के पास अधिक जिम्मेदारियाँ
- क्षैतिज असमानता: अमीर और गरीब राज्यों के बीच बढ़ती खाई
- सशर्त अनुदान: Centrally Sponsored Schemes में राज्यों की सीमित भूमिका
- GST क्षतिपूर्ति: राज्यों को समय पर मुआवजा न मिलना
राज्यपाल की भूमिका पर विवाद
- विधेयकों पर अनिश्चितकालीन विलंब
- राज्य सरकार और केंद्र के बीच संघर्ष में पक्षपात का आरोप
- पुंछी आयोग (2010): राज्यपाल सुधार की सिफारिशें
- सर्कारिया आयोग (1988): केंद्र-राज्य संबंधों पर महत्वपूर्ण रिपोर्ट
अनुच्छेद 356 का उपयोग और दुरुपयोग
- 1950-2000: 100+ बार लागू, अक्सर राजनीतिक कारणों से
- Bommai निर्णय के बाद: न्यायिक जवाबदेही बढ़ी
- हालिया रुझान: सावधानीपूर्वक उपयोग, न्यायिक समीक्षा का डर
2. उभरते मुद्दे और बहसें
- एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections):
- पक्ष: लागत बचत, निरंतर शासन, विकास कार्यों में निरंतरता
- विपक्ष: संघीय स्वायत्तता का उल्लंघन, क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा
- समान नागरिक संहिता (UCC):
- केंद्र-राज्य: कौन लागू करे?
- धर्म और व्यक्तिगत कानून: संघीय विविधता का प्रश्न
- अंतर-राज्यीय नदी विवाद:
- कावेरी, कृष्णा, महानदी – जल बंटवारा
- न्यायाधिकरणों की सीमित प्रभावशीलता
- डिजिटल संघवाद:
- डेटा स्थानीयकरण और गोपनीयता कानून
- ई-गवर्नेंस में केंद्र-राज्य समन्वय
3. सुझाए गए सुधार
संस्थागत सुधार
- अंतर-राज्यीय परिषद को मजबूत करना: नियमित बैठकें, बाध्यकारी सिफारिशें
- स्थायी वित्त आयोग: निरंतर निगरानी और समायोजन
- संघीय न्यायालय: केंद्र-राज्य विवादों के त्वरित समाधान के लिए
वित्तीय सुधार
- कर स्वायत्तता बढ़ाना: राज्यों को अधिक राजस्व स्रोत
- Centrally Sponsored Schemes में लचीलापन: राज्यों की प्राथमिकताओं का सम्मान
- प्रदर्शन-आधारित हस्तांतरण: दक्षता को प्रोत्साहित करना
4. भारतीय संघवाद का भविष्य
सकारात्मक संकेत:
- क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत – संतुलन की जाँच
- न्यायिक सक्रियता – संघीय सिद्धांतों की रक्षा
- सहकारी मंच – GST परिषद, NITI Aayog की सफलता
- नागरिक जागरूकता – संघीय अधिकारों के प्रति जागरूकता
चेतावनियाँ:
- अत्यधिक केंद्रीकरण की प्रवृत्ति
- क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि
- राजनीतिक ध्रुवीकरण से केंद्र-राज्य संघर्ष
समकालीन मुद्दों को अपने उत्तरों में शामिल करें। यह आपकी समझ को वर्तमान संदर्भ में दिखाता है और उत्तरों को अधिक प्रभावशाली बनाता है।
नोट: यह समकालीन विश्लेषण पाठ्यपुस्तक के दायरे से बाहर है, लेकिन UPSC, State PSC, और उच्च स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन मुद्दों की समझ आपको एक सूचित नागरिक भी बनाती है।
7. विकेंद्रीकरण: तीसरा स्तर
संवैधानिक दर्जा
73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992):
- 73वाँ: पंचायती राज संस्थाएँ (ग्रामीण)
- 74वाँ: नगरपालिकाएँ (शहरी)
- प्रभावी: 24 अप्रैल 1993 से
- स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा
पंचायती राज: त्रि-स्तरीय ढाँचा
- सरपंच/प्रधान: अध्यक्ष
- पंच: सदस्य
- ग्राम सभा: गाँव के सभी वयस्क मतदाता
- स्थानीय विकास और कल्याण
- कई ग्राम पंचायतों का समूह
- विकास योजनाओं का समन्वय
- जिला और गाँव के बीच कड़ी
- जिले में सर्वोच्च पंचायती निकाय
- विकास योजनाओं की निगरानी
- संसाधनों का वितरण
शहरी स्थानीय निकाय
- मेयर: प्रमुख
- जनसंख्या: 10 लाख+ आमतौर पर
- व्यापक शक्तियाँ और संसाधन
- अध्यक्ष/सभापति: प्रमुख
- संक्रमणकालीन क्षेत्र
- मध्यम आकार की सेवाएँ
- ग्रामीण से शहरी संक्रमण
- बुनियादी शहरी सेवाएँ
- सीमित संसाधन
प्रमुख प्रावधान
1. नियमित चुनाव
- हर 5 वर्ष में अनिवार्य चुनाव
- राज्य चुनाव आयोग (SEC) द्वारा संचालित
2. आरक्षण
- SC/ST: जनसंख्या के अनुपात में
- OBC: राज्य के विवेक पर
- महिलाओं: न्यूनतम 33% (कई राज्यों में 50%)
- पदाधिकारियों (सरपंच, मेयर) में भी आरक्षण
3. राज्य वित्त आयोग (SFC)
- हर 5 वर्ष में गठन
- वित्तीय संसाधनों के हस्तांतरण की सिफारिश
- स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा
4. 11वीं और 12वीं अनुसूची
- 11वीं: पंचायतों के 29 विषय
- 12वीं: नगरपालिकाओं के 18 विषय
- उदाहरण: जल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़कें आदि
Funds-Functions-Functionaries की कमी:
- वित्त: अपर्याप्त संसाधन और राजस्व अधिकार
- कार्य: शक्तियों का वास्तविक हस्तांतरण अधूरा
- कर्मचारी: प्रशिक्षित कार्मिकों की कमी
- राज्य सरकारों की अनिच्छा
- जागरूकता और भागीदारी की कमी
- सहभागी लोकतंत्र: जमीनी स्तर पर भागीदारी
- महिला सशक्तिकरण: राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि
- स्थानीय समस्याओं का त्वरित समाधान
- संसाधनों का बेहतर उपयोग
- राजनीतिक नेतृत्व का प्रशिक्षण केंद्र
विकेंद्रीकरण: सफलता की कहानियाँ और सबक
1. केस स्टडी: सफल पंचायतें
केरल – कुडुम्बश्री मॉडल
- महिला स्वयं सहायता समूह आधारित विकास
- पंचायत स्तर पर सहभागी योजना
- गरीबी उन्मूलन में 40% सफलता
- सबक: महिला सशक्तिकरण + विकेंद्रीकरण = सतत विकास
राजस्थान – जल संरक्षण
- राजसमंद जिले की ग्राम पंचायतों ने जल संकट हल किया
- पारंपरिक जल संरचनाओं (तालाब, बावड़ी) का पुनर्निर्माण
- समुदाय की भागीदारी से स्थायी समाधान
- सबक: स्थानीय ज्ञान + सामुदायिक स्वामित्व
हिवरे बाजार गाँव, महाराष्ट्र
- सूखाग्रस्त गाँव से आदर्श ग्राम में परिवर्तन
- ग्राम सभा के सशक्त निर्णय – शराबबंदी, जल प्रबंधन
- प्रति व्यक्ति आय 200 रु से 30,000+ रु
- सबक: मजबूत ग्राम सभा = मजबूत गाँव
2. शहरी स्थानीय शासन में नवाचार
सूरत नगर निगम – स्वच्छता क्रांति
- 1994 प्लेग के बाद शहर का कायाकल्प
- Swachh Survekshan में लगातार शीर्ष स्थान
- नागरिक भागीदारी और जवाबदेही
भुवनेश्वर – स्मार्ट सिटी
- तकनीकी का उपयोग शहरी शासन में
- नागरिक सेवाओं में डिजिटल प्लेटफॉर्म
- पारदर्शिता और दक्षता में सुधार
3. विकेंद्रीकरण की चुनौतियाँ: वास्तविक तस्वीर
3F समस्या का विस्तृत विश्लेषण
Funds (धन):
- राज्य सरकारें 11वीं/12वीं अनुसूची के विषय स्थानांतरित नहीं करतीं
- SFC सिफारिशें लागू नहीं होतीं (कई राज्यों में 50% से कम)
- स्वतंत्र कर संग्रह क्षमता बहुत कम
- उदाहरण: ग्राम पंचायतों को बजट का केवल 3-5% मिलता है
Functions (कार्य):
- कागज पर 29/18 विषय, व्यवहार में 5-7 विषय
- राज्य विभाग समानांतर कार्य करते रहते हैं
- भ्रमित जिम्मेदारियाँ – कौन जवाबदेह?
Functionaries (कर्मचारी):
- तकनीकी कर्मचारी (इंजीनियर, डॉक्टर) स्थानांतरित नहीं
- प्रशिक्षण का अभाव
- कर्मचारियों पर स्थानीय निकाय का नियंत्रण सीमित
अन्य व्यावहारिक समस्याएँ
- जातिवाद और भाई-भतीजावाद: योग्यता के बजाय पक्षपात
- राजनीतिक हस्तक्षेप: MLA/MP का अनौपचारिक नियंत्रण
- महिला प्रतिनिधियों की सीमित भूमिका: “प्रॉक्सी” समस्या
- जागरूकता का अभाव: नागरिकों को अधिकारों की जानकारी नहीं
- भ्रष्टाचार: छोटे पैमाने पर, पर व्यापक
4. मजबूत विकेंद्रीकरण के लिए रोडमैप
- Activity Mapping: सभी राज्यों में 11वीं/12वीं अनुसूची का पूर्ण कार्यान्वयन
- कैडर-आधारित प्रशिक्षण: स्थानीय प्रशासकों के लिए नियमित प्रशिक्षण
- सामाजिक लेखा परीक्षा: सार्वजनिक जवाबदेही तंत्र
- ग्राम सभा/वार्ड समिति को सशक्त करना: बजट अनुमोदन शक्ति
- तकनीकी एकीकरण: पारदर्शिता के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म
- नागरिक शिक्षा: अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता
5. अंतर्राष्ट्रीय तुलना: सीखने योग्य सबक
- सहभागी बजट (Porto Alegre मॉडल)
- नागरिक सीधे बजट प्राथमिकताएँ तय करते हैं
- सबक: प्रत्यक्ष नागरिक भागीदारी
- बारंगे (गाँव) स्तर का सशक्त शासन
- 20% बजट स्थानीय निकायों को
- सबक: संवैधानिक वित्तीय गारंटी
- कैंटन (राज्य) का मजबूत स्थानीय शासन
- प्रत्यक्ष लोकतंत्र – जनमत संग्रह
- सबक: स्थानीय निर्णयों में सीधी भागीदारी
विकेंद्रीकरण केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं है – यह जमीनी लोकतंत्र है। सफल उदाहरणों से सीखें, चुनौतियों को समझें, और एक सक्रिय नागरिक के रूप में भागीदारी करें।
नोट: यह विस्तृत विश्लेषण और केस स्टडीज़ पाठ्यपुस्तक से अतिरिक्त हैं। ये व्यावहारिक समझ विकसित करने और वर्णनात्मक उत्तरों को समृद्ध बनाने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। UPSC मेन्स और साक्षात्कार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण।
8. अभ्यास और समीक्षा
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (10)
1. संघवाद को परिभाषित करें।
केंद्र व राज्यों के बीच शक्ति का संवैधानिक विभाजन (ऊर्ध्वाधर) – स्वतंत्र अधिकार-क्षेत्र।
2. Coming Together का उदाहरण।
USA, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया।
3. Holding Together का उदाहरण।
भारत, स्पेन, बेल्जियम।
4. विधायी सूचियाँ?
संघ, राज्य, समवर्ती; अवशिष्ट विषय संसद के।
5. अवशिष्ट शक्तियाँ?
Art. 248 + Union List Entry 97 → संसद।
6. स्थानीय निकाय-संवैधानिक दर्जा?
73वाँ/74वाँ CAA, 1992 (प्रभाव 1993)।
7. अनुसूचित भाषाएँ-कुल?
22 (हिंदी सहित)।
8. नगर निगम का प्रमुख?
मेयर (Mayor)।
9. ग्राम सभा के सदस्य?
गाँव के सभी वयस्क मतदाता।
10. न्यायिक मिसाल?
S.R. Bommai (1994)-Art. 356 पर नियंत्रण।
लघु उत्तरीय प्रश्न (10)
1. संघीय बनाम एकात्मक-मूल अंतर?
एकात्मक में केंद्रीकरण/निर्देश; संघीय में संवैधानिक शक्ति-विभाजन, राज्यों के निज अधिकार-क्षेत्र।
2. Coming vs Holding-मुख्य निहितार्थ।
Coming: राज्यों का सशक्तिकरण/समानता; Holding: असमान शक्तियाँ/केंद्र-झुकाव संभव।
3. समवर्ती सूची-टकराव नियम।
केंद्र/राज्य दोनों कानून; टकराव पर संसद का कानून प्रबल।
4. 73वाँ/74वाँ-तीन विशेषताएँ।
नियमित चुनाव; आरक्षण (SC/ST/OBC/महिला); SEC/SFC संस्थाकरण।
5. भाषाई पुनर्गठन-प्रभाव।
प्रशासन सुगम; पहचान-सम्मान; एकता सुदृढ़।
6. न्यायपालिका-‘अंपायर’ भूमिका।
संवैधानिक व्याख्या/न्यायिक समीक्षा-संघीय संतुलन।
7. GST परिषद-संघवाद में स्थान।
Cooperative federalism का मंच; Art. 279A; 101st CAA।
8. नीति-आयोग-कार्य।
सहारात्मक/परामर्शी नीति-निर्माण; राज्यों के साथ भागीदारी।
9. महिला आरक्षण-स्थानीय निकाय।
न्यूनतम 33%; कई राज्यों में 50%।
10. आपात प्रावधान-संघीय प्रभाव।
Art. 352/356/360-केंद्र शक्तियाँ; प्रकृति/नियंत्रण/न्यायिक समीक्षा का विवेचन।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10)
1. संघवाद की सात विशेषताएँ-व्याख्या सहित।
स्तर, अधिकार-क्षेत्र, संवैधानिक सुरक्षा, संशोधन-कठोरता, न्यायिक अंपायर, वित्तीय स्वायत्तता, एकता+विविधता-उदाहरण/आर्टिकल्स सहित।
2. “लोकतांत्रिक राजनीति से संघवाद सफल”-आलोचनात्मक विश्लेषण।
भाषाई पुनर्गठन, भाषा-नीति लचीलापन, गठबंधन युग, न्यायिक निगरानी-प्रयोगात्मक साक्ष्यों सहित।
3. 1992 के बाद पंचायती राज-आकलन।
त्रि-स्तरीय ढाँचा; चुनाव/आरक्षण/SEC/SFC; funds-functions-functionaries गैप; सुधार सुझाव।
4. Coming vs Holding-व्यावहारिक निहितार्थ।
शक्ति-संतुलन, समान/असमान अधिकार, पहचान-सुरक्षा, नीति-वैविध्य-केस-आधारित विवेचन।
5. समवर्ती सूची-उपयोगिता/टकराव-तंत्र।
साझा हितों पर लचीलापन; टकराव-प्राथमिकता; न्यायिक सीमा-निर्धारण।
6. भारतीय संघवाद में न्यायपालिका-भूमिका।
Basic Structure, Bommai, न्यायिक सक्रियता/संयम-संतुलन।
7. वित्त आयोग + GST परिषद-संघीय वित्त।
कर-बँटवारा/अनुदान-मानदंड vs सहमति-आधारित अप्रत्यक्ष कर; क्षतिपूर्ति तंत्र का संदर्भ।
8. Art. 356-इतिहास व वर्तमान।
ऐतिहासिक उपयोग/दुरुपयोग; न्यायिक परीक्षण; संघीय नैतिकता; आज की प्रवृत्तियाँ।
9. शहरी स्थानीय निकाय-सुदृढीकरण योजना।
स्वतंत्र राजस्व, SFC सिफारिशें, e-गवर्नेंस, भागीदारी, समयबद्ध हस्तांतरण।
10. सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद-संतुलन रणनीति।
समन्वय मंच + स्वस्थ प्रतिस्पर्धा-समावेशी विकास व दक्षता का संगम।