Class 10 Social Science (Political Science) Chapter 1 – सत्ता की साझेदारी (Power Sharing)

अध्याय I: सत्ता की साझेदारी

I. अवलोकन और बुनियादी अवधारणाएँ

  • मूल विचार: लोकतंत्र में, सत्ता सरकार के किसी एक अंग तक सीमित नहीं रहती।
  • आवश्यकता: विधायिका (legislature), कार्यपालिका (executive), और न्यायपालिका (judiciary) के बीच सत्ता का समझदारी भरा बँटवारा लोकतंत्र के कामकाज के लिए बहुत ज़रूरी है।
  • लोकतांत्रिक सिद्धांत: सत्ता की साझेदारी का विचार अविभाजित राजनीतिक सत्ता के विरोध में उभरा।
    • लोग ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत हैं।
    • सत्ता को अधिक से अधिक नागरिकों के बीच वितरित किया जाना चाहिए।
  • अध्याय का केंद्र: यह अध्याय सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए दो कहानियों (बेल्जियम और श्रीलंका) की पड़ताल करता है।
🔑 मुख्य शब्द: जातीय (Ethnic)

साझी संस्कृति पर आधारित एक सामाजिक विभाजन; किसी भी जातीय समूह के सभी सदस्य मानते हैं कि उनकी उत्पत्ति समान पूर्वजों से हुई है और इसी कारण उनकी शारीरिक बनावट और संस्कृति एक जैसी है; ज़रूरी नहीं कि वे एक ही धर्म के मानने वाले हों या उनकी राष्ट्रीयता एक हो।

विविध समुदाय का चित्रण: सत्ता-साझेदारी के मूल्य
सत्ता की साझेदारी विविध जातीय और सांस्कृतिक समूहों का सम्मान करती है और उन्हें शामिल करती है।

पुनरावलोकन फ्लोचार्ट: अवलोकन

लोकतंत्र (Democracy): मूल विचार
सत्ता किसी एक अंग में निहित नहीं होती
विधायिका • कार्यपालिका • न्यायपालिका में समझदारी भरा बँटवारा
मुख्य प्रश्न: यह साझेदारी क्यों ज़रूरी है?
अध्ययन पथ: बेल्जियम और श्रीलंका
💡 अतिरिक्त जानकारी: सत्ता-साझेदारी का ऐतिहासिक संदर्भ

सत्ता की साझेदारी का आधुनिक लोकतांत्रिक विचार ऐतिहासिक रूप से राजतंत्रों और कुलीन तंत्रों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में उभरा। पहले, सारी शक्ति एक राजा या एक छोटे कुलीन वर्ग के हाथों में केंद्रित होती थी। लोकतंत्र का उदय इसी शक्ति को तोड़ने और उसे नागरिकों या उनके प्रतिनिधियों के बीच बाँटने की माँग से जुड़ा हुआ है।

II. दो देशों का अध्ययन: बेल्जियम और श्रीलंका

A. बेल्जियम: विविधता की चुनौती

  • भूगोल/जनसांख्यिकी: यूरोप का छोटा सा देश; आबादी एक करोड़ से अधिक।
  • जातीय संरचना (जटिल):
    • 59% (फ्लेमिश क्षेत्र): डच (Dutch) बोलते हैं।
    • 40% (वॉलूनिया क्षेत्र): फ्रेंच (French) बोलते हैं।
    • 1%: जर्मन (German) बोलते हैं।
  • तनाव के बिंदु:
    • फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक थे लेकिन अपेक्षाकृत अमीर और शक्तिशाली थे।
    • डच भाषी इससे नाराज़ थे, जिन्हें आर्थिक लाभ/शिक्षा बाद में मिली।
    • ब्रुसेल्स (Brussels) में तनाव अधिक तीखा था: देश में डच बहुमत में थे, लेकिन राजधानी में वे 20% अल्पसंख्यक थे (जहाँ 80% फ्रेंच बोलते थे)।
बेल्जियम के भाषाई क्षेत्रों का नक्शा
💡 अतिरिक्त तथ्य
बेल्जियम में संवैधानिक संशोधन 1970, 1980, 1988–89, और 1993 में किए गए; इसी प्रक्रिया से संघीय ढाँचे का विकास हुआ। ब्रुसेल्स औपचारिक रूप से द्विभाषिक क्षेत्र है।

B. श्रीलंका: बहुसंख्यकवाद की चुनौती

  • भूगोल/जनसांख्यिकी: एक द्वीपीय राष्ट्र; आबादी करीब दो करोड़।
  • प्रमुख सामाजिक समूह:
    • सिंहली-भाषी (74%): अधिकतर बौद्ध (Buddhists)
    • तमिल-भाषी (18%): अधिकतर हिंदू (Hindus) या मुसलमान (Muslims)
  • तमिल उप-समूह:
    • श्रीलंकाई तमिल (13%): मूल निवासी, उत्तर और पूर्व में केंद्रित।
    • भारतीय तमिल (शेष): जिनके पूर्वज बागान श्रमिकों के रूप में भारत से आए थे।
  • अन्य समूह: लगभग 7% ईसाई (तमिल और सिंहली दोनों)।
श्रीलंका का जातीय वितरण दर्शाता नक्शा
💡 अतिरिक्त तथ्य
1956 का Sinhala Only Act राजभाषा नीति की धुरी रहा। गृहयुद्ध व्यापक रूप से 1983–2009 माना जाता है।

पुनरावलोकन फ्लोचार्ट: केस स्टडी

बेल्जियम 🇧🇪
जटिल जातीय संरचना (डच 59%, फ्रेंच 40%)
तनाव: फ्रेंच (अमीर) बनाम डच बहुमत
फोकस: ब्रुसेल्स में डच अल्पसंख्यक
श्रीलंका 🇱🇰
सिंहली 74% • तमिल 18%
विभाजन: बौद्ध/हिंदू/मुस्लिम
उप-समूह: श्रीलंकाई/भारतीय तमिल
💡 अतिरिक्त जानकारी: आर्थिक परिणाम

इन दो प्रतिक्रियाओं का देश के विकास पर गहरा असर पड़ा। बेल्जियम का समझदारी भरा मॉडल उसे एक स्थिर और समृद्ध राष्ट्र बनने में मदद करता है, और ब्रुसेल्स यूरोपीय संघ (EU) के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है। इसके विपरीत, श्रीलंका के गृहयुद्ध ने दशकों तक उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया, पर्यटन को नष्ट कर दिया और ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) को जन्म दिया, जिससे देश का विकास बाधित हुआ।

III. विविधता की प्रतिक्रियाएँ

दोनों देशों ने अपनी जातीय विविधता पर कैसे प्रतिक्रिया दी? उनके दृष्टिकोणों के परिणाम बहुत भिन्न थे।

🔑 मुख्य शब्द: बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism)

यह मान्यता कि अगर कोई समुदाय बहुसंख्यक है तो वह अपने मनचाहे ढंग से देश का शासन कर सकता है और इसके लिए वह अल्पसंख्यक समुदाय की ज़रूरतों या इच्छाओं की अवहेलना कर सकता है।

  • उठाए गए कदम (1948 के बाद):
    • सिंहली नेताओं ने बहुसंख्यकवादी उपायों के माध्यम से प्रभुत्व जमाने की कोशिश की।
    • 1956 के कानून ने तमिल की उपेक्षा करते हुए सिंहली को एकमात्र राजभाषा के रूप में मान्यता दी।
    • नौकरियों और विश्वविद्यालय पदों के लिए सिंहली आवेदकों को तरजीही नीतियां अपनाई गईं।
    • नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा करेगा और उसे बढ़ावा देगा।
  • परिणाम:
    • श्रीलंकाई तमिलों के बीच बेगानेपन (alienation) की भावना बढ़ी।
    • तमिलों ने तमिल को मान्यता, क्षेत्रीय स्वायत्तता और समानता के लिए संघर्ष शुरू किया।
    • स्वायत्तता की मांगों को बार-बार नकारा गया।
    • 1980 के दशक तक एक स्वतंत्र तमिल ईलम (Tamil Eelam) (राज्य) की मांग की जाने लगी।
    • अविश्वास एक गृहयुद्ध (Civil War) (देश के भीतर हिंसक संघर्ष) में बदल गया।
    • देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को भारी आघात लगा; 2009 में समाप्त हुआ।
💡 मुख्य दृष्टिकोण: समझदारी (Accommodation)

नेताओं ने सांस्कृतिक विविधताओं और क्षेत्रीय मतभेदों को मान्यता दी और एक ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास किया जिसमें सभी समूह एक साथ रह सकें।

  • संवैधानिक परिवर्तन: संविधान में चार बार (1970-1993) संशोधन किया गया ताकि पारस्परिक रूप से स्वीकार्य व्यवस्थाएँ की जा सकें।
  • “बेल्जियम मॉडल” के मुख्य तत्व:
    1. केंद्रीय सरकार: डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की समान संख्या। विशेष कानूनों के लिए प्रत्येक भाषाई समूह से बहुमत वोट की आवश्यकता, जिससे एकतरफा फैसले रुके।
    2. राज्य सरकारें: केंद्र सरकार की शक्तियाँ क्षेत्रीय राज्य सरकारों को दी गईं। राज्य सरकारें केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं।
    3. ब्रुसेल्स सरकार: अलग सरकार जिसमें दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व।
    4. सामुदायिक सरकार (Community Government): भाषा-समूह आधारित निकाय, जो सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा संबंधी मुद्दों को संभालती है।
  • परिणाम: इन जटिल व्यवस्थाओं ने नागरिक संघर्ष और भाषाई आधार पर देश के संभावित विभाजन को सफलतापूर्वक टाल दिया।

पुनरावलोकन फ्लोचार्ट: प्रतिक्रियाएँ

श्रीलंका: बहुसंख्यकवाद
राजभाषा/तरजीह नीतियाँ
बेगानापन • स्वायत्तता की मांग
परिणाम: गृहयुद्ध
बेल्जियम: समझदारी
चार संशोधन • विविधता की मान्यता
केंद्र/राज्य/ब्रुसेल्स/समुदाय
परिणाम: शांति और एकता
💡 अतिरिक्त जानकारी: ‘सामुदायिक सरकार’ की विशिष्टता

बेल्जियम की ‘सामुदायिक सरकार’ सत्ता-साझेदारी का एक अनूठा रूप है। यह किसी भौगोलिक क्षेत्र पर आधारित नहीं है, बल्कि भाषा समुदाय (डच, फ्रेंच और जर्मन-भाषी) पर आधारित है। यह सरकार, चाहे लोग देश के किसी भी हिस्से में रहते हों, उनके सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा संबंधी मामलों पर निर्णय लेती है। यह दर्शाता है कि जटिल जातीय मुद्दों को हल करने के लिए सत्ता-साझेदारी कितनी रचनात्मक हो सकती है।

IV. सत्ता की साझेदारी क्यों वांछनीय है?

“विभिन्न समुदायों के हितों का सम्मान करके ही एकता संभव है (बेल्जियम)। सत्ता साझा करने से इनकार करना एकता को कमजोर करता है (श्रीलंका)।”

सत्ता की साझेदारी क्यों वांछनीय है, इसके दो मुख्य कारण हैं:

कारण का प्रकार फोकस / परिभाषा तर्क (यह अच्छा क्यों है)
युक्तिपरक (Prudential) लाभ और हानि के सावधानीपूर्वक आकलन पर आधारित (बेहतर परिणाम लाता है)।
  • सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष की संभावना कम होती है।
  • राजनीतिक व्यवस्था का स्थायित्व बढ़ता है।
  • बहुमत की मनमानी दीर्घकाल में एकता को कमजोर करती है।
  • बहुसंख्यकवाद अंततः बहुसंख्यक को भी नुकसान पहुँचा सकता है।
नैतिक (Moral) सत्ता साझा करने के कार्य को ही मूल्यवान मानता है (लोकतंत्र की आत्मा)।
  • सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की आत्मा है।
  • शासन से प्रभावित लोगों के साथ सत्ता साझा करना आवश्यक है।
  • लोगों को यह अधिकार है कि उनसे परामर्श हो कि उन पर शासन कैसे किया जाए।
  • वैध (legitimate) सरकार नागरिक भागीदारी से उद्भूत होती है।

पुनरावलोकन फ्लोचार्ट: साझेदारी की वांछनीयता

1. युक्तिपरक कारण
(लाभ-हानि पर आधारित)
संघर्ष कम • स्थायित्व अधिक
लक्ष्य: बेहतर परिणाम
2. नैतिक कारण
(मूल्य पर आधारित)
लोकतंत्र की आत्मा • परामर्श का अधिकार
लक्ष्य: वैध सरकार
💡 अतिरिक्त जानकारी: ‘वैधता’ (Legitimacy) की अवधारणा

एक ‘वैध’ (legitimate) सरकार वह होती है जिसे नागरिकों की सहमति प्राप्त होती है और वे उसके शासन करने के अधिकार को स्वीकार करते हैं। सत्ता की साझेदारी सरकार की वैधता को बढ़ाती है। जब विभिन्न सामाजिक समूहों को लगता है कि सरकार में उनकी हिस्सेदारी है और उनकी आवाज़ सुनी जा रही है, तो वे व्यवस्था को ‘अपना’ मानते हैं और उसके कानूनों का पालन करने की अधिक संभावना रखते हैं। इस प्रकार, साझेदारी से न केवल स्थायित्व (युक्तिपरक) आता है, बल्कि वैधता (नैतिक) भी मजबूत होती है।

V. आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के रूप

आधुनिक लोकतंत्रों में, सत्ता की साझेदारी कई रूप ले सकती है। यहाँ चार मुख्य व्यवस्थाएँ दी गई हैं:

1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (नियंत्रण और संतुलन)

  • क्या: सत्ता को सरकार के विभिन्न अंगों के बीच साझा किया जाता है जो एक ही स्तर पर होते हैं।
  • अंग: विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive), और न्यायपालिका (Judiciary)
  • कार्य: यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी अंग असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता; प्रत्येक अंग दूसरों को जाँचता है, जिससे शक्ति का संतुलन (balance of power) बना रहता है।
    विधायिका <– (जाँच) –> कार्यपालिका <– (जाँच) –> न्यायपालिका

2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (संघीय सरकार)

  • क्या: सत्ता को विभिन्न स्तरों पर सरकारों के बीच साझा किया जाता है।
  • स्तर:
    • स्तर 1: केंद्रीय / संघ सरकार (Central/Union) (पूरे देश के लिए)
    • स्तर 2: राज्य सरकारें (State Governments) (प्रांतीय/क्षेत्रीय)
    • स्तर 3: नगर पालिका / पंचायत (स्थानीय सरकार)
  • तंत्र: संविधान विभिन्न स्तरों की शक्तियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।
  • विस्तार: इसे राज्य सरकारों से निचले स्तरों तक बढ़ाया जा सकता है, जैसा कि भारत में है।

3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच साझेदारी

  • क्या: धार्मिक और भाषाई समूहों के बीच सत्ता साझा करना।
  • व्यवस्थाएँ:
    • उदाहरण: बेल्जियम में ‘सामुदायिक सरकार’ (‘Community government’)
    • सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए संवैधानिक/कानूनी व्यवस्था (जैसे, भारत में ‘आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र’ (‘reserved constituencies’))।
  • लक्ष्य: विविध समूहों को सरकार/प्रशासन में स्थान देना; अल्पसंख्यकों को उचित हिस्सा सुनिश्चित करना।

4. राजनीतिक दलों और दबाव समूहों के बीच साझेदारी

  • तंत्र: विभिन्न दलों के बीच प्रतिस्पर्धा यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता एक हाथ में न रहे।
  • राजनीतिक दल:
    • विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के बीच सत्ता साझा की जाती है।
    • गठबंधन सरकार (Coalition Government): प्रत्यक्ष साझाकरण तब होता है जब दो या दो से अधिक दल चुनाव लड़ने के लिए गठबंधन बनाते हैं, और चुने जाने पर गठबंधन सरकार बनाते हैं।
  • हित/दबाव समूह (Interest/Pressure Groups): व्यापारी/किसान/श्रमिक समूह समितियों में भागीदारी या लॉबिंग के माध्यम से नीति-निर्माण को प्रभावित करते हैं।

पुनरावलोकन फ्लोचार्ट: Power-Sharing के रूप

1. क्षैतिज
विधायिका ↔ कार्यपालिका ↔ न्यायपालिका
Checks & Balances
2. ऊर्ध्वाधर
केंद्र ↓ राज्य ↓ स्थानीय
संघीय ढाँचा
3. सामाजिक समूह
भाषाई/धार्मिक समुदाय
उदा: सामुदायिक सरकार
4. दल/समूह
Political + Pressure Groups
उदा: गठबंधन सरकार
💡 अतिरिक्त जानकारी: गठबंधन सरकारें (Coalition Governments)

सत्ता-साझेदारी का चौथा रूप (राजनीतिक दलों के बीच) ‘गठबंधन सरकारों’ में सबसे स्पष्ट दिखता है। जब किसी एक पार्टी को चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो दो या दो से अधिक पार्टियां मिलकर सरकार बनाती हैं। ऐसा करने के लिए, उन्हें एक ‘साझा न्यूनतम कार्यक्रम’ पर सहमत होना पड़ता है, जो अनिवार्य रूप से सत्ता, नीतियों और मंत्रालयों का एक समझौता और बँटवारा है। यह लोकतंत्र में सत्ता के लचीले बँटवारे का एक प्रमुख उदाहरण है।

VI. अभ्यास और पुनरावलोकन

इस अध्याय की अपनी समझ को परखने के लिए निम्नलिखित प्रश्नों का अभ्यास करें।

प्रश्न 1 / 30
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

1. बेल्जियम की राजधानी का नाम बताइए।

ब्रुसेल्स।

2. श्रीलंका किस वर्ष स्वतंत्र हुआ?

1948 में।

3. बेल्जियम में कौन से तीन मुख्य भाषाई समूह हैं?

डच-भाषी, फ्रेंच-भाषी और जर्मन-भाषी।

4. ‘बहुसंख्यकवाद’ क्या है?

यह मान्यता कि बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों की इच्छाओं की अवहेलना करके मनचाहे ढंग से शासन कर सकता है।

5. श्रीलंका के दो प्रमुख जातीय समूह कौन से हैं?

सिंहली-भाषी (74%) और तमिल-भाषी (18%)।

6. सत्ता के क्षैतिज वितरण में कौन से तीन अंग शामिल हैं?

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका।

7. ‘गठबंधन सरकार’ किसे कहते हैं?

जब दो या दो से अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं।

8. सत्ता की साझेदारी का एक युक्तिपरक कारण बताइए।

यह सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष को कम करता है और राजनीतिक स्थायित्व लाता है।

9. सत्ता की साझेदारी का एक नैतिक कारण बताइए।

यह लोकतंत्र की आत्मा है और सरकार को वैधता प्रदान करता है।

10. बेल्जियम में ‘सामुदायिक सरकार’ का क्या कार्य है?

यह सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा संबंधी मामलों पर निर्णय लेती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

1. बेल्जियम की जातीय संरचना की जटिलता को स्पष्ट करें।

बेल्जियम की जातीय संरचना बहुत जटिल है। देश की कुल आबादी का 59% हिस्सा फ्लेमिश क्षेत्र में रहता है और डच बोलता है। 40% लोग वॉलूनिया क्षेत्र में रहते हैं और फ्रेंच बोलते हैं। शेष 1% लोग जर्मन बोलते हैं। हालाँकि, राजधानी ब्रुसेल्स में स्थिति उलटी है: यहाँ 80% लोग फ्रेंच-भाषी हैं जबकि 20% डच-भाषी हैं। यह असंतुलन (देश में डच बहुमत, राजधानी में फ्रेंच बहुमत) तनाव का मुख्य कारण था।

2. श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद को लागू करने के लिए उठाए गए तीन कदम बताइए।

श्रीलंका में सिंहली समुदाय के प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए:

  1. 1956 में, एक कानून पारित किया गया जिसने तमिल भाषा की उपेक्षा करते हुए सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया।
  2. विश्वविद्यालयों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों के लिए सिंहली आवेदकों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां अपनाई गईं।
  3. नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा करेगा और उसे बढ़ावा देगा।
3. ‘नियंत्रण और संतुलन’ (Checks and Balances) की व्यवस्था क्या है?

यह सत्ता के क्षैतिज वितरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें सरकार के विभिन्न अंग (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) एक ही स्तर पर रहकर अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक अंग दूसरे अंग पर नियंत्रण रखता है (जैसे न्यायपालिका, कार्यपालिका के कार्यों की जाँच कर सकती है)। यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी एक अंग असीमित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता, जिससे शक्ति का संतुलन बना रहता है।

4. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Division) क्या है?

सत्ता के ऊर्ध्वाधर वितरण में, सत्ता को सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच साझा किया जाता है। इसमें एक केंद्रीय या संघीय सरकार होती है जो पूरे देश के लिए जिम्मेदार होती है, और राज्य या प्रांतीय सरकारें होती हैं जो क्षेत्रीय मामलों को देखती हैं। भारत और बेल्जियम इसके उदाहरण हैं। इसमें शक्तियों का स्पष्ट विभाजन संविधान द्वारा किया जाता है, और निचले स्तर की सरकारें अपने कार्यों के लिए केंद्रीय सरकार के अधीन नहीं होती हैं।

5. बेल्जियम मॉडल की दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।

बेल्जियम मॉडल की दो मुख्य विशेषताएँ हैं:

  1. केंद्रीय सरकार में समान प्रतिनिधित्व: संविधान यह अनिवार्य करता है कि केंद्रीय सरकार में डच और फ्रेंच-भाषी मंत्रियों की संख्या समान होगी, ताकि कोई एक समुदाय एकतरफा फैसले न ले सके।
  2. सामुदायिक सरकार: एक तीसरी प्रकार की सरकार (केंद्रीय और राज्य के अलावा) जिसे ‘सामुदायिक सरकार’ कहते हैं। यह भाषा समुदाय (डच, फ्रेंच, जर्मन) द्वारा चुनी जाती है और सांस्कृतिक, शैक्षिक व भाषा संबंधी मुद्दों को संभालती है।
6. श्रीलंका में गृहयुद्ध के क्या परिणाम हुए?

श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद के कारण शुरू हुए गृहयुद्ध के विनाशकारी परिणाम हुए। इसने हजारों लोगों की जान ली और अनगिनत परिवारों को विस्थापित किया, जिससे उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। गृहयुद्ध ने देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। इसने दशकों तक देश के विकास को बाधित किया, पर्यटन को नष्ट कर दिया और समुदायों के बीच अविश्वास को गहरा कर दिया।

7. युक्तिपरक और नैतिक कारणों में एक मुख्य अंतर बताइए।

मुख्य अंतर उनके आधार पर है। युक्तिपरक कारण लाभ-हानि के आकलन पर आधारित होता है; यह कहता है कि सत्ता-साझेदारी ‘बेहतर परिणाम’ लाती है (जैसे संघर्ष टालना और स्थायित्व लाना)। इसके विपरीत, नैतिक कारण ‘मूल्यों’ पर आधारित होता है; यह कहता है कि सत्ता-साझेदारी अपने आप में ‘अच्छी’ है, क्योंकि यह लोकतंत्र की आत्मा है और नागरिकों को शासन में भागीदारी का अधिकार देती है।

8. राजनीतिक दल और दबाव समूह सत्ता में साझेदारी कैसे करते हैं?

राजनीतिक दल सत्ता में प्रत्यक्ष रूप से साझेदारी करते हैं, खासकर ‘गठबंधन सरकारों’ में, जहाँ दो या अधिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं और नीतियां साझा करते हैं। दबाव समूह (जैसे व्यापारियों, किसानों या श्रमिकों के संगठन) सत्ता में अप्रत्यक्ष रूप से साझेदारी करते हैं। वे सरकार पर दबाव डालकर, लॉबिंग करके या सरकारी समितियों में भाग लेकर नीति-निर्माण को अपने पक्ष में प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

9. ब्रुसेल्स में तनाव का मुख्य कारण क्या था?

ब्रुसेल्स में तनाव का मुख्य कारण उसकी विशिष्ट जातीय संरचना थी, जो पूरे देश से उलटी थी। जहाँ पूरे बेल्जियम में डच-भाषी (59%) बहुमत में थे, वहीं राजधानी ब्रुसेल्स में वे केवल 20% अल्पसंख्यक थे, जबकि 80% लोग फ्रेंच बोलते थे। देश के बहुमत (डच) का राजधानी में अल्पसंख्यक होना और राजधानी के बहुमत (फ्रेंच) का देश में अल्पसंख्यक होना, तनाव का एक मुख्य बिंदु था।

10. ‘आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र’ सत्ता-साझेदारी का एक रूप कैसे हैं?

आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र (Reserved Constituencies) विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता-साझेदारी का एक उदाहरण हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों (जैसे भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों) को विधायिका और प्रशासन में उचित हिस्सा मिले। यह उन्हें शासन में एक आवाज देता है और उन्हें बेगानेपन की भावना से बचाता है, इस प्रकार यह सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूपों का वर्णन करें।

आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के चार मुख्य रूप हैं:

  1. क्षैतिज वितरण: इसमें सत्ता सरकार के विभिन्न अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच विभाजित होती है। ये सभी अंग एक ही स्तर पर होते हैं। यह ‘नियंत्रण और संतुलन’ की व्यवस्था सुनिश्चित करता है, ताकि कोई भी अंग असीमित शक्ति का प्रयोग न कर सके।
  2. ऊर्ध्वाधर वितरण: इसमें सत्ता सरकार के विभिन्न स्तरों—जैसे केंद्रीय (संघ) सरकार, राज्य सरकारें और स्थानीय सरकार (नगर पालिका/पंचायत)—के बीच विभाजित होती है। इसे संघीय ढाँचा भी कहते हैं। संविधान स्पष्ट रूप से विभिन्न स्तरों की शक्तियों को परिभाषित करता है।
  3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच: इसमें सत्ता विभिन्न सामाजिक, धार्मिक या भाषाई समूहों के बीच साझा की जाती है। बेल्जियम की ‘सामुदायिक सरकार’ या भारत में ‘आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र’ इसके उदाहरण हैं। इसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों को शासन में उचित प्रतिनिधित्व देना है।
  4. राजनीतिक दलों और दबाव समूहों के बीच: इसमें सत्ता राजनीतिक दलों और हित समूहों के बीच साझा होती है। यह प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सुनिश्चित होता है कि सत्ता एक हाथ में न रहे। ‘गठबंधन सरकारें’ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहाँ पार्टियां मिलकर सत्ता साझा करती हैं। दबाव समूह (जैसे किसान या मजदूर संघ) भी नीतियों को प्रभावित करके सत्ता में अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लेते हैं।
2. बेल्जियम द्वारा अपनाए गए समझदारी भरे मॉडल की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन करें।

बेल्जियम ने 1970 और 1993 के बीच अपने संविधान में चार संशोधन करके एक अभिनव सत्ता-साझेदारी मॉडल अपनाया, जिसे ‘बेल्जियम मॉडल’ कहा जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. केंद्रीय सरकार में समान प्रतिनिधित्व: केंद्रीय सरकार में डच और फ्रेंच-भाषी मंत्रियों की संख्या समान कर दी गई। इसका मतलब था कि कोई भी एक समुदाय एकतरफा फैसले नहीं ले सकता था, और प्रमुख कानूनों के लिए दोनों भाषाई समूहों के बहुमत की आवश्यकता होती थी।
  2. शक्तियों का विकेंद्रीकरण (ऊर्ध्वाधर वितरण): केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ देश के दो मुख्य क्षेत्रों (फ्लेमिश क्षेत्र और वॉलूनिया क्षेत्र) की राज्य सरकारों को दे दी गईं। ये राज्य सरकारें अब केंद्रीय सरकार के अधीन नहीं थीं, जिससे एकात्मक शासन से संघीय शासन की ओर बदलाव हुआ।
  3. ब्रुसेल्स के लिए अलग सरकार: राजधानी ब्रुसेल्स, जहाँ फ्रेंच-भाषी बहुमत में थे, के लिए एक अलग सरकार बनाई गई। इस सरकार में भी दोनों समुदायों (डच और फ्रेंच) को समान प्रतिनिधित्व दिया गया।
  4. सामुदायिक सरकार: एक तीसरे प्रकार की सरकार, ‘सामुदायिक सरकार’ का गठन किया गया। यह सरकार भाषा समुदाय (डच, फ्रेंच और जर्मन-भाषी) के आधार पर चुनी जाती है, चाहे वे देश में कहीं भी रहते हों। इस सरकार को सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा संबंधी मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया गया।

इस जटिल लेकिन सफल मॉडल ने बेल्जियम को गृहयुद्ध से बचाया और देश की एकता को बनाए रखा।

3. श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद के उदय और उसके परिणामों की व्याख्या करें।

1948 में अपनी स्वतंत्रता के बाद, श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के नेताओं ने अपनी संख्या के बल पर शासन पर प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया। इस ‘बहुसंख्यकवाद’ की नीति के तहत कई कदम उठाए गए:

  • 1956 का कानून: सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित कर दिया गया, जिससे तमिल भाषा की पूरी तरह अवहेलना हुई।
  • तरजीही नीतियां: सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए सिंहली आवेदकों को प्राथमिकता दी जाने लगी।
  • धार्मिक संरक्षण: नए संविधान ने राज्य को बौद्ध धर्म की रक्षा करने और उसे बढ़ावा देने का निर्देश दिया, जो कि अधिकांश सिंहलियों का धर्म था।

परिणाम:

इन कदमों के विनाशकारी परिणाम हुए। श्रीलंकाई तमिलों ने खुद को अलग-थलग और उपेक्षित महसूस किया। उन्हें लगा कि कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल उनकी भाषा और संस्कृति के प्रति संवेदनशील नहीं है।

  • शुरुआत में, तमिलों ने भाषा की मान्यता, क्षेत्रीय स्वायत्तता और अवसरों की समानता की मांग की, लेकिन उनकी मांगों को लगातार नकारा गया।
  • 1980 के दशक तक, अविश्वास इतना बढ़ गया कि तमिलों ने एक स्वतंत्र ‘तमिल ईलम’ (राज्य) की मांग के लिए राजनीतिक संगठन बनाए।
  • यह टकराव जल्द ही एक भयंकर गृहयुद्ध में बदल गया, जो लगभग तीन दशकों (1983-2009) तक चला। इस गृहयुद्ध ने हजारों लोगों की जान ले ली, देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया और समाज में गहरी दरारें पैदा कर दीं।
4. सत्ता की साझेदारी क्यों वांछनीय है? युक्तिपरक और नैतिक तर्कों के आधार पर समझाइए।

सत्ता की साझेदारी दो मुख्य प्रकार के तर्कों के कारण वांछनीय है: युक्तिपरक और नैतिक।

1. युक्तिपरक (Prudential) तर्क:

यह तर्क परिणामों या लाभ-हानि पर आधारित है। इसके अनुसार, सत्ता की साझेदारी इसलिए अच्छी है क्योंकि यह बेहतर परिणाम लाती है।

  • सामाजिक शांति: यह विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष और टकराव की संभावना को कम करता है। जब सभी को लगता है कि उनकी हिस्सेदारी है, तो वे व्यवस्था के खिलाफ नहीं जाते।
  • राजनीतिक स्थायित्व: जब सत्ता साझा की जाती है, तो सरकार अधिक स्थिर होती है। बहुसंख्यक की मनमानी अल्पावधि में आकर्षक लग सकती है, लेकिन दीर्घावधि में यह देश की एकता को कमजोर करती है (जैसा कि श्रीलंका में हुआ)।
  • बेहतर निर्णय: जब विभिन्न समूह निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं, तो विविध दृष्टिकोण सामने आते हैं, जिससे अधिक संतुलित और बेहतर निर्णय होते हैं।

2. नैतिक (Moral) तर्क:

यह तर्क सत्ता-साझेदारी को उसके परिणामों के कारण नहीं, बल्कि उसे अपने आप में एक मूल्यवान चीज मानता है।

  • लोकतंत्र की आत्मा: सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है। एक लोकतांत्रिक सरकार वह होती है जिसमें नागरिक भागीदारी के माध्यम से शासन का हिस्सा बनते हैं।
  • वैधता (Legitimacy): सत्ता-साझेदारी सरकार को वैधता प्रदान करती है। जब लोग (या विभिन्न समूह) महसूस करते हैं कि वे शासन में शामिल हैं, तो वे सरकार को ‘अपनी’ सरकार मानते हैं और उसके निर्णयों को स्वीकार करते हैं। यह सहमति ही सरकार की वैधता का आधार है।
  • नागरिकों का अधिकार: लोगों को यह अधिकार है कि उनसे परामर्श किया जाए कि उन पर शासन कैसे किया जाएगा। सत्ता की साझेदारी इस अधिकार का सम्मान करती है।
5. बेल्जियम और श्रीलंका द्वारा अपनाए गए सत्ता-साझेदारी के मॉडलों की तुलना करें।

बेल्जियम और श्रीलंका, दोनों ही जातीय रूप से विविध देश हैं, लेकिन उन्होंने अपनी विविधता को संभालने के लिए बिल्कुल विपरीत रास्ते अपनाए।

श्रीलंका का मॉडल (बहुसंख्यकवाद):

  • दृष्टिकोण: श्रीलंका ने ‘बहुसंख्यकवाद’ का रास्ता अपनाया, जहाँ बहुसंख्यक सिंहली समुदाय ने अपनी संख्या के बल पर अल्पसंख्यकों (तमिलों) पर अपनी इच्छा थोपने की कोशिश की।
  • कार्रवाई: 1956 के कानून के तहत सिंहली को एकमात्र राजभाषा बनाया गया, बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया गया और नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता दी गई।
  • परिणाम: इस मॉडल ने तमिलों के बीच बेगानेपन की भावना पैदा की, जिससे अविश्वास बढ़ा और अंततः देश एक विनाशकारी गृहयुद्ध में फँस गया। इसने देश की एकता और अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया।

बेल्जियम का मॉडल (समझदारी/Accommodation):

  • दृष्टिकोण: बेल्जियम ने ‘समझदारी’ (Accommodation) का रास्ता अपनाया। उन्होंने क्षेत्रीय मतभेदों और सांस्कृतिक विविधताओं को पहचाना और स्वीकार किया।
  • कार्रवाई: उन्होंने संविधान में चार बार संशोधन करके एक जटिल व्यवस्था बनाई, जिसमें केंद्रीय सरकार में समान प्रतिनिधित्व, शक्तियों का विकेंद्रीकरण (राज्य सरकारों को शक्ति देना), ब्रुसेल्स के लिए अलग सरकार और एक ‘सामुदायिक सरकार’ (सांस्कृतिक मामलों के लिए) शामिल थी।
  • परिणाम: इस मॉडल ने विभिन्न भाषाई समूहों को एक साथ रहने में मदद की। इसने देश के संभावित विभाजन और गृहयुद्ध को सफलतापूर्वक टाल दिया, जिससे देश में शांति और राजनीतिक स्थायित्व बना रहा।

निष्कर्ष: बेल्जियम का मॉडल दिखाता है कि सत्ता की साझेदारी देश की एकता को मजबूत करती है, जबकि श्रीलंका का मॉडल दिखाता है कि सत्ता साझा करने से इनकार करना अंततः देश की एकता को कमजोर करता है।

6. सत्ता के क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर वितरण के बीच अंतर स्पष्ट करें।

सत्ता का क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर वितरण, सत्ता-साझेदारी के दो मूलभूत रूप हैं, जो सरकार की संरचना को परिभाषित करते हैं:

1. क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution):

  • स्तर: इसमें सत्ता सरकार के विभिन्न अंगों के बीच साझा की जाती है जो एक ही स्तर पर होते हैं।
  • अंग: ये अंग हैं – विधायिका (कानून बनाने वाली), कार्यपालिका (कानून लागू करने वाली), और न्यायपालिका (न्याय करने वाली)।
  • तंत्र: इसे ‘नियंत्रण और संतुलन’ (Checks and Balances) की व्यवस्था कहा जाता है। प्रत्येक अंग दूसरे पर नियंत्रण रखता है (जैसे, न्यायपालिका, विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा कर सकती है)।
  • उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि कोई भी एक अंग असीमित शक्ति प्राप्त न कर सके।

2. ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Division):

  • स्तर: इसमें सत्ता सरकार के विभिन्न स्तरों (ऊपर से नीचे) के बीच साझा की जाती है।
  • अंग: ये स्तर हैं – केंद्रीय (या संघीय) सरकार, राज्य (या प्रांतीय) सरकारें, और स्थानीय सरकारें (जैसे नगर पालिका या पंचायत)।
  • तंत्र: इसे ‘संघीय ढाँचा’ (Federalism) कहा जाता है। संविधान स्पष्ट रूप से प्रत्येक स्तर की शक्तियों को परिभाषित करता है।
  • उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को स्थानीय स्तर पर ही प्रभावी ढंग से हल किया जा सके और राष्ट्रीय एकता बनी रहे।

संक्षेप में, क्षैतिज वितरण ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) से संबंधित है, जबकि ऊर्ध्वाधर वितरण ‘शक्तियों के विकेंद्रीकरण’ (Decentralization of Powers) से संबंधित है।

7. जातीय विविधता वाले देशों में सत्ता की साझेदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

जातीय विविधता वाले देशों (जैसे भारत, बेल्जियम, श्रीलंका) में सत्ता की साझेदारी केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। इसके कई कारण हैं:

  1. संघर्ष की रोकथाम (युक्तिपरक): जातीय विविधता अक्सर सामाजिक तनाव और संघर्ष का स्रोत हो सकती है। सत्ता की साझेदारी विभिन्न समूहों को शासन में हिस्सेदारी देकर उनके बीच संघर्ष की संभावना को कम करती है। जब समूहों को लगता है कि उनकी आवाज़ सुनी जा रही है, तो वे हिंसक रास्ते अपनाने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करते हैं।
  2. देश की एकता (युक्तिपरक): यदि बहुसंख्यक समुदाय, अल्पसंख्यक समुदायों पर अपनी इच्छा थोपता है (जैसा कि श्रीलंका में हुआ), तो इससे अल्पसंख्यकों में बेगानेपन की भावना पैदा होती है। यह अंततः देश के विभाजन या गृहयुद्ध की ओर ले जा सकता है। सत्ता-साझेदारी सभी को एक साथ लाकर देश की एकता को मजबूत करती है।
  3. सरकार की वैधता (नैतिक): लोकतंत्र का अर्थ है सभी की सहमति का शासन। एक विविधतापूर्ण देश में, सरकार केवल तभी वैध मानी जाती है जब उसमें सभी प्रमुख सामाजिक और जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व हो। यह ‘लोकतंत्र की आत्मा’ को दर्शाता है।
  4. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: सत्ता-साझेदारी यह सुनिश्चित करती है कि बहुसंख्यक समुदाय की ‘मनमानी’ या ‘अत्याचार’ से अल्पसंख्यक समूहों के हितों, उनकी संस्कृति और भाषा की रक्षा हो सके। बेल्जियम का मॉडल इसका एक आदर्श उदाहरण है।
8. “सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की आत्मा है।” इस कथन की व्याख्या करें।

यह कथन सत्ता-साझेदारी के ‘नैतिक’ (Moral) तर्क को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि सत्ता-साझेदारी के बिना लोकतंत्र का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है:

  1. लोकतंत्र का मूल अर्थ: लोकतंत्र का अर्थ है ‘लोगों का शासन’। लोग ही सारी राजनीतिक शक्ति का स्रोत हैं। एक सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ लोग स्व-शासन की संस्थाओं के माध्यम से शासन करते हैं।
  2. भागीदारी का अधिकार: एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, नागरिकों को यह अधिकार है कि उनसे परामर्श किया जाए कि उन पर शासन कैसे किया जाएगा। सत्ता की साझेदारी यह सुनिश्चित करती है कि शासन से प्रभावित होने वाले लोग (या उनके प्रतिनिधि) निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल हों।
  3. वैधता का आधार: एक वैध सरकार वह होती है जिसे नागरिकों की सहमति प्राप्त हो। जब सत्ता को विभिन्न समूहों और नागरिकों के बीच साझा किया जाता है, तो वे सरकार को स्वीकार करते हैं और उसे ‘अपनी’ सरकार मानते हैं। यह सहमति ही सरकार की वैधता का आधार है।
  4. अविभाजित सत्ता के विरुद्ध: लोकतंत्र का विचार ही अविभाजित राजनीतिक सत्ता (जैसे राजतंत्र या तानाशाही) के विरुद्ध है। यदि सत्ता एक व्यक्ति या एक समूह के हाथ में केंद्रित रहती है, तो वह लोकतंत्र नहीं हो सकता। इसलिए, सत्ता का बँटवारा ही लोकतंत्र को कार्यात्मक और सार्थक बनाता है।
9. विभिन्न सामाजिक समूहों और राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की साझेदारी के तरीकों की तुलना करें।

यह सत्ता-साझेदारी के तीसरे और चौथे रूप की तुलना है, जो दोनों ही समाज में शक्ति के वितरण के लिए महत्वपूर्ण हैं:

1. सामाजिक समूहों के बीच साझेदारी (रूप 3):

  • फोकस: इसका फोकस समाज के स्थायी भाषाई, धार्मिक या जातीय समूहों पर होता है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक या ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समूहों को शासन में उचित प्रतिनिधित्व और सुरक्षा प्रदान करना है, ताकि वे बेगानापन महसूस न करें।
  • तंत्र: यह अक्सर संवैधानिक या कानूनी व्यवस्थाओं के माध्यम से किया जाता है।
    • उदाहरण 1: बेल्जियम की ‘सामुदायिक सरकार’, जो भाषाई समूहों को सांस्कृतिक मामलों पर शक्ति देती है।
    • उदाहरण 2: भारत में ‘आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र’, जो अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विधायिका में सीटें सुनिश्चित करते हैं।

2. राजनीतिक दलों और दबाव समूहों के बीच साझेदारी (रूप 4):

  • फोकस: इसका फोकस विचारधारा या साझा हितों पर आधारित संगठनों (पार्टियों, संघों) पर होता है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता एक हाथ या एक विचारधारा में केंद्रित न हो, और सरकार पर विभिन्न हितों का दबाव बना रहे।
  • तंत्र: यह मुख्य रूप से चुनावी और राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से होता है।
    • उदाहरण 1: ‘गठबंधन सरकारें’, जहाँ विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियां बहुमत न मिलने पर सत्ता साझा करने के लिए एक साथ आती हैं।
    • उदाहरण 2: ‘हित/दबाव समूह’ (जैसे किसान संघ, व्यापार मंडल) जो लॉबिंग या विरोध प्रदर्शन के माध्यम से सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं।

मुख्य अंतर: सामाजिक समूहों के बीच साझेदारी समाज के ‘होने’ (identity) पर आधारित है, जबकि राजनीतिक दलों के बीच साझेदारी ‘करने’ (ideology/interests) पर आधारित है।

10. आप क्यों मानते हैं कि आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी अनिवार्य है?

आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी कई कारणों से अनिवार्य है, जो युक्तिपरक और नैतिक दोनों हैं:

  1. विविधता का प्रबंधन: आज के अधिकांश देश जातीय, सांस्कृतिक और भाषाई रूप से अत्यंत विविध हैं। इस विविधता को संभालने, संघर्ष को रोकने और सभी को एक साथ रखने के लिए सत्ता-साझेदारी सबसे अच्छा तरीका है। यह राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करती है।
  2. तानाशाही की रोकथाम: ‘नियंत्रण और संतुलन’ (क्षैतिज वितरण) की व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सरकार का कोई एक अंग (जैसे कार्यपालिका) बहुत अधिक शक्तिशाली न हो जाए और तानाशाही का रूप न ले ले। यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
  3. सरकार की वैधता और प्रभावशीलता: जब सत्ता का विकेंद्रीकरण (ऊर्ध्वाधर वितरण) होता है और स्थानीय सरकारें मजबूत होती हैं, तो निर्णय उन लोगों के करीब लिए जाते हैं जो उनसे प्रभावित होते हैं। इससे न केवल निर्णय बेहतर होते हैं, बल्कि लोग उन्हें अधिक आसानी से स्वीकार भी करते हैं (वैधता)।
  4. लोकतांत्रिक भावना का सम्मान: लोकतंत्र का मूल विचार ही ‘सहमति का शासन’ है। सत्ता की साझेदारी यह सुनिश्चित करती है कि शासन केवल बहुमत की इच्छा से नहीं, बल्कि एक आम सहमति से चले, जिसमें अल्पसंख्यकों की राय का भी सम्मान हो।
  5. जटिल समस्याओं का समाधान: आधुनिक समाजों की समस्याएं (जैसे जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता) इतनी जटिल हैं कि कोई एक समूह या पार्टी उनका समाधान नहीं कर सकती। विभिन्न दलों, विशेषज्ञों और हित समूहों के बीच साझेदारी से ही बेहतर और स्थायी समाधान निकलते हैं।

इस प्रकार, सत्ता की साझेदारी केवल एक “अच्छा विचार” नहीं है, बल्कि यह आधुनिक, विविध और जटिल लोकतंत्रों को स्थिर, वैध और कार्यात्मक बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।

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ई-अध्याय: सत्ता की साझेदारी (लोकतांत्रिक राजनीति)

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