अध्याय 5 – औद्योगीकरण का युग
परिचय: प्रगति और प्रौद्योगिकी का महिमामंडन
औद्योगीकरण के युग को अक्सर मशीनों, कारखानों और तकनीकी प्रगति के साथ जोड़ा जाता है। 1900 में, E.T. पॉल म्यूजिक कंपनी द्वारा प्रकाशित एक संगीत पुस्तक के कवर पर ‘सदी का उदय’ [Dawn of the Century] की घोषणा की गई थी। इस चित्र में, एक देवी जैसी आकृति, जिसे ‘प्रगति की दूत’ कहा गया, नई सदी का झंडा लिए हुए पंखों वाले पहिये (समय का प्रतीक) पर बैठी भविष्य की ओर उड़ रही है। उसके पीछे रेलवे, कैमरा, मशीनें और कारखाने जैसे प्रगति के चिह्न तैर रहे हैं।
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1.1 आदि-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation)
इंग्लैंड और यूरोप में कारखानों की स्थापना से बहुत पहले भी, अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता था, जो कारखानों पर आधारित नहीं था। इस चरण को इतिहासकार आदि-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) कहते हैं। (‘प्रोटो’ का अर्थ है ‘किसी चीज़ का पहला या प्रारंभिक रूप’)।
17वीं और 18वीं शताब्दी में, व्यापारी शहरों से गाँवों की ओर रुख करने लगे। इसका मुख्य कारण था शहरों में शक्तिशाली शहरी शिल्प और व्यापार गिल्ड (श्रेणियाँ) [Urban Craft and Trade Guilds] का होना। ये गिल्ड उत्पादकों के संगठन थे जो कारीगरों को प्रशिक्षित करते, उत्पादन पर नियंत्रण रखते, प्रतिस्पर्धा और कीमतों को विनियमित करते थे। शासकों से प्राप्त एकाधिकार अधिकारों के कारण वे नए व्यापारियों के प्रवेश को रोकते थे।
- औद्योगिक क्रांति की परिभाषा: इसका तात्पर्य उत्पादन प्रणाली में हुए उन मूलभूत परिवर्तनों से है, जिनके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए मशीनों का उपयोग, कारखानों की स्थापना और एक नए मजदूर वर्ग का उदय हुआ। “औद्योगिक क्रांति” शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांस के समाजवादी चिंतक लूई ब्लाँ ने 1837 में किया था, लेकिन इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय अंग्रेज इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयनबी को जाता है।
- ‘पुटिंग-आउट’ प्रणाली (Putting-out System): आदि-औद्योगीकरण की इस व्यवस्था को ‘पुटिंग-आउट’ या ‘घरेलू प्रणाली’ के रूप में भी जाना जाता है। इसमें व्यापारी (Merchant-capitalist) कच्चे माल को कारीगरों के घरों तक पहुँचाता था और तैयार उत्पाद वापस ले जाता था। इसमें कारीगर अपने घरों में अपने औजारों का उपयोग करके उत्पादन करते थे, जिससे व्यापारी को कारखानों में भारी पूंजी निवेश से राहत मिलती थी।
- नए शब्द और उनकी परिभाषा:
- स्टेपलर (Stapler): वह व्यक्ति जो ऊन को उसके रेशे की गुणवत्ता के अनुसार छाँटता है।
- फुलर (Fuller): वह व्यक्ति जो चुन्नटों (pleats) के सहारे कपड़े को समेटता है (fulling)।
- कार्डिंग (Carding): वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन जैसे रेशों को कताई से पहले सुलझाकर तैयार किया जाता है।
1.2 कारखानों का उदय
इंग्लैंड में पहले कारखाने 1730 के दशक में स्थापित हुए, लेकिन उनकी संख्या 18वीं शताब्दी के अंत में तेजी से बढ़ी।
यूरोप का मानचित्र
यूनाइटेड किंगडम का मानचित्र
कपास एक प्रतीक के रूप में: कपास (Cotton) नए युग का पहला प्रतीक था। 1760 में ब्रिटेन 2.5 मिलियन पाउंड कच्चे कपास का आयात करता था, जो 1787 तक बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गया। यह वृद्धि आविष्कारों की एक श्रृंखला के कारण हुई जिसने उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण की दक्षता बढ़ा दी।
1.3 औद्योगिक परिवर्तन की गति
औद्योगीकरण एक धीमी प्रक्रिया थी, न कि एक नाटकीय विस्फोट जैसा कि अक्सर माना जाता है।
- इंग्लैंड में ही औद्योगिक क्रांति क्यों हुई?
- राजनीतिक स्थिरता: 17वीं सदी की क्रांति के बाद इंग्लैंड में एक स्थिर सरकार थी जो व्यापार का समर्थन करती थी।
- कृषि क्रांति: नई कृषि तकनीकों ने खाद्य उत्पादन बढ़ाया, जिससे जनसंख्या बढ़ी और शहरों के लिए श्रम उपलब्ध हुआ।
- प्राकृतिक संसाधन: इंग्लैंड में कोयला और लोहा प्रचुर मात्रा में थे, जो कारखानों और मशीनों के लिए आवश्यक थे।
- पूंजी और बैंकिंग प्रणाली: औपनिवेशिक व्यापार से प्राप्त धन और एक विकसित बैंकिंग प्रणाली ने निवेश के लिए पूंजी उपलब्ध कराई।
- वैज्ञानिक मानसिकता और आविष्कार: इंग्लैंड में एक वैज्ञानिक समाज था जिसने नवाचार को प्रोत्साहित किया।
- प्रमुख आविष्कार और उनका प्रभाव:
- स्पिनिंग जेनी (1764): जेम्स हरग्रीव्स (James Hargreaves) द्वारा आविष्कृत, यह मशीन एक साथ कई तकलियों (spindles) को घुमा सकती थी, जिससे एक ही समय में कई धागे बन सकते थे। प्रभाव: इसने कताई की प्रक्रिया को नाटकीय रूप से तेज कर दिया, लेकिन इससे बना धागा कमजोर था और केवल बाने (weft) के लिए उपयुक्त था।
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- वाटर फ्रेम (1769): रिचर्ड आर्कराइट द्वारा विकसित, यह पानी की शक्ति से चलती थी। प्रभाव: यह बहुत मजबूत धागा बनाती थी जो ताने (warp) के लिए उपयुक्त था। इसने पहली बार 100% सूती कपड़ा बनाना संभव बनाया। इसका आकार बड़ा होने के कारण इसे घरों में नहीं रखा जा सकता था, जिससे कारखानों (मिल्स) की स्थापना हुई।
- स्पिनिंग म्यूल (1779): सैमुअल क्रॉम्पटन (Samuel Crompton) ने जेनी की गति और वाटर फ्रेम की मजबूती को मिलाकर इस मशीन का निर्माण किया। प्रभाव: यह किसी भी प्रकार का महीन और मजबूत धागा बना सकती थी, जिससे ब्रिटिश कपड़ा उद्योग भारतीय मलमल जैसे उच्च गुणवत्ता वाले कपड़ों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो गया।
- पावर लूम (1785): एडमंड कार्टराइट (Edmund Cartwright) ने बुनाई को स्वचालित करने के लिए इसका आविष्कार किया। प्रभाव: इसने कताई और बुनाई के बीच की खाई को पाट दिया, जिससे कपड़ा उत्पादन की गति और बढ़ गई। हालांकि, शुरुआती मॉडल अक्षम थे और 19वीं सदी के मध्य तक हथकरघा बुनकर प्रतिस्पर्धा में बने रहे।
- स्पिनिंग जेनी (1764): जेम्स हरग्रीव्स (James Hargreaves) द्वारा आविष्कृत, यह मशीन एक साथ कई तकलियों (spindles) को घुमा सकती थी, जिससे एक ही समय में कई धागे बन सकते थे। प्रभाव: इसने कताई की प्रक्रिया को नाटकीय रूप से तेज कर दिया, लेकिन इससे बना धागा कमजोर था और केवल बाने (weft) के लिए उपयुक्त था।
वीडियो: प्रमुख आविष्कारों का कार्य और प्रभाव
2.1 हाथ के श्रम को वरीयता
विक्टोरियन ब्रिटेन में, उद्योगपति अक्सर मशीनों के बजाय हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे।
- श्रम की प्रचुरता: नौकरी की तलाश में बड़ी संख्या में लोग शहरों में आते थे, जिससे मजदूरी कम थी। इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या उच्च मजदूरी की कोई समस्या नहीं थी।
- मौसमी मांग: गैस वर्क्स, ब्रुअरीज, बुक-बाइंडिंग और बंदरगाहों जैसे कई उद्योगों में काम मौसमी था। इन उद्योगों में उद्योगपति केवल सीजन के दौरान श्रमिकों को नियुक्त करना पसंद करते थे, न कि पूरे साल चलने वाली महंगी मशीनों में निवेश करना।
- डिज़ाइन और गुणवत्ता: कई उत्पादों, विशेष रूप से लक्जरी वस्तुओं के लिए, जटिल डिज़ाइन और विशिष्ट आकृतियों की आवश्यकता होती थी, जिन्हें केवल कुशल कारीगर ही हाथ से बना सकते थे। उदाहरण के लिए, 19वीं सदी के मध्य ब्रिटेन में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनती थीं। इन्हें मशीनों से बनाना संभव नहीं था।
- सामाजिक वर्ग का प्रतीक: विक्टोरियन ब्रिटेन के उच्च वर्ग—अभिजात और पूंजीपति—हाथ से बनी चीजों को परिष्कार और वर्ग का प्रतीक मानते थे। मशीन से बना सामान आमतौर पर उपनिवेशों में निर्यात के लिए होता था।
2.2 श्रमिकों का जीवन
श्रमिकों का जीवन कठिन था। नौकरी मिलना दोस्तों और रिश्तेदारों के नेटवर्क पर निर्भर करता था। जिनके पास कोई संपर्क नहीं था, उन्हें हफ्तों इंतजार करना पड़ता था, पुलों के नीचे या रैन बसेरों (Casual Wards) में रातें गुजारनी पड़ती थीं।
काम का मौसमी होना बेरोजगारी का एक बड़ा कारण था। बेरोजगारी के डर ने श्रमिकों को नई तकनीक के प्रति शत्रुतापूर्ण बना दिया। जब ऊनी उद्योग में स्पिनिंग जेनी को पेश किया गया, तो हाथ से कताई करने वाली महिलाओं ने इस पर हमला किया क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी खोने का डर था।
1840 के दशक के बाद, शहरों में निर्माण गतिविधियों (सड़कें, रेलवे, सुरंगें) में वृद्धि के कारण रोजगार के अवसर बढ़े, जिससे बेरोजगारी की समस्या कुछ हद तक कम हुई।
- लुडिज्म (Luddism): यह 1811-1816 के बीच इंग्लैंड में एक संगठित आंदोलन था, जहाँ कारीगरों ने मशीनों को तोड़ दिया, विशेष रूप से कपड़ा उद्योग में। वे प्रौद्योगिकी के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उन मशीनों के खिलाफ थे जो उनकी आजीविका छीन रही थीं और उनके कौशल को महत्वहीन बना रही थीं। इस आंदोलन का नेतृत्व एक पौराणिक नेता ‘जनरल नेड लुड’ के नाम पर किया गया था।
- शहरी जीवन की भयावहता: औद्योगिक शहरों में श्रमिकों के रहने की स्थिति बेहद खराब थी। वे भीड़भाड़ वाली बस्तियों में रहते थे जहाँ स्वच्छता, साफ पानी और ताजी हवा की कमी थी। इससे हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियाँ आम थीं। जीवन प्रत्याशा ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी कम थी।
- चार्टिस्ट आंदोलन (Chartism): 1830 और 1840 के दशक में, श्रमिकों ने बेहतर काम करने की स्थिति और राजनीतिक अधिकारों (जैसे सभी पुरुषों के लिए मताधिकार) की मांग के लिए चार्टिस्ट आंदोलन जैसे बड़े पैमाने पर आंदोलन किए। हालांकि यह आंदोलन अपने तत्काल लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा, लेकिन इसने श्रमिक वर्ग में राजनीतिक चेतना पैदा की।
3.1 भारतीय वस्त्रों का युग
मशीन उद्योगों के आगमन से पहले, अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारतीय रेशम और सूती कपड़ों का दबदबा था। बेहतरीन किस्म के सूती कपड़े भारत से ही आते थे।
1750 के दशक तक, यूरोपीय कंपनियों द्वारा शक्ति प्राप्त करने के साथ ही यह नेटवर्क टूटने लगा। पुराने बंदरगाहों का पतन हो गया और बॉम्बे और कलकत्ता जैसे नए औपनिवेशिक बंदरगाहों का उदय हुआ, जिन पर यूरोपीय कंपनियों का नियंत्रण था।
3.1.1 ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजनीतिक सत्ता की स्थापना
18वीं शताब्दी के मध्य तक, ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी से एक राजनीतिक शक्ति में बदलने लगी थी। अन्य यूरोपीय कंपनियों (जैसे फ्रांसीसी और डच) के साथ प्रतिस्पर्धा और भारतीय शासकों के साथ संघर्षों के माध्यम से, कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाया।
निर्णायक युद्ध और उनके परिणाम
- प्लासी का युद्ध (1757): रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में, कंपनी ने षड्यंत्र के माध्यम से बंगाल के नवाब, सिराज-उद-दौला को हराया। इस जीत ने कंपनी को बंगाल पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण दे दिया, जो उस समय भारत का सबसे धनी प्रांत था।
- बक्सर का युद्ध (1764): इस युद्ध में कंपनी ने बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला, और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को निर्णायक रूप से हराया।
- इलाहाबाद की संधि (1765): बक्सर की जीत के बाद, कंपनी को मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार (राजस्व एकत्र करने का अधिकार) प्राप्त हुए। इसने कंपनी को कानूनी और राजनीतिक रूप से भारत में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
इन दीवानी अधिकारों ने कंपनी को भारत के विशाल राजस्व संसाधनों तक सीधी पहुँच प्रदान की। इस राजनीतिक और वित्तीय शक्ति का उपयोग करते हुए, कंपनी ने धीरे-धीरे व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित किया, प्रतिस्पर्धा को समाप्त किया और भारतीय अर्थव्यवस्था, विशेषकर कपड़ा उत्पादन, पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।
3.2 बुनकरों का क्या हुआ?
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद, उसने बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
कंपनी ने पारंपरिक दलालों को खत्म कर बुनकरों की निगरानी करने, आपूर्ति एकत्र करने और गुणवत्ता की जांच करने के लिए गुमाश्ता (Gomastha) नामक वेतनभोगी नौकरों को नियुक्त किया। बुनकरों को अग्रिम (पेशगी) देकर उन्हें अन्य खरीदारों के साथ व्यापार करने से रोक दिया गया। इससे बुनकरों ने मोलभाव करने की अपनी शक्ति खो दी और वे कंपनी से ऋण में बंध गए। गुमाश्तों के अहंकारपूर्ण व्यवहार के कारण बुनकरों और कंपनी के बीच अक्सर टकराव होते थे।
3.3 मैनचेस्टर का भारत आना
19वीं सदी की शुरुआत तक, भारत से कपड़ा निर्यात में भारी गिरावट आई। इंग्लैंड में औद्योगिक समूहों ने सरकार पर आयात शुल्क लगाने के लिए दबाव डाला ताकि मैनचेस्टर का माल ब्रिटेन में बिना किसी प्रतिस्पर्धा के बिक सके। जल्द ही, भारत सस्ते, मशीन-निर्मित ब्रिटिश कपड़ों से भर गया।
1860 के दशक में अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण ब्रिटेन को कच्चे कपास की आपूर्ति बंद हो गई, तो ब्रिटेन ने भारत से कच्चे कपास का निर्यात बढ़ा दिया। इससे भारत में कच्चे कपास की कीमतें बढ़ गईं और बुनकरों के लिए कच्चा माल खरीदना मुश्किल हो गया।
- वि-औद्योगीकरण (De-industrialisation) का सिद्धांत: यह एक ऐतिहासिक बहस है कि क्या ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत में पारंपरिक उद्योगों का व्यापक पतन हुआ। राष्ट्रवादी इतिहासकारों (जैसे आर.सी. दत्त) का तर्क है कि मैनचेस्टर के आयात और औपनिवेशिक नीतियों ने भारतीय हस्तशिल्प को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया। हालांकि, कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि प्रभाव एक समान नहीं था – महीन कपड़े बनाने वाले बुनकरों को कम नुकसान हुआ, जबकि मोटे कपड़े बनाने वाले अधिक प्रभावित हुए, और कुछ क्षेत्रों में उत्पादन वास्तव में बढ़ा।
- 1813 का चार्टर एक्ट: इस अधिनियम ने चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर, भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। इसने अन्य ब्रिटिश व्यापारियों के लिए भारत में अपने माल को बेचने का रास्ता खोल दिया, जिससे मैनचेस्टर के कपड़ों का आयात और बढ़ गया। 1833 के चार्टर एक्ट ने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
- प्रसिद्ध भारतीय वस्त्र: भारत अपने उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था, जैसे ढाका का मलमल (जो इतना महीन होता था कि एक अंगूठी से निकल जाता था), कालीकट का कैलिको, और विभिन्न क्षेत्रों के छींट (Chintz)।
4.1 प्रारंभिक उद्यमी
भारत में पहली सूती मिल 1854 में बॉम्बे में स्थापित की गई, और पहली जूट मिल 1855 में बंगाल में।
हालांकि, औपनिवेशिक नियंत्रण ने भारतीय व्यापारियों के लिए अवसरों को सीमित कर दिया। प्रथम विश्व युद्ध तक, भारतीय उद्योगों के एक बड़े हिस्से को यूरोपीय प्रबंध एजेंसियों (European Managing Agencies) द्वारा नियंत्रित किया जाता था, जो पूंजी जुटाती और व्यावसायिक निर्णय लेती थीं।
4.2 श्रमिक कहाँ से आए?
कारखानों में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक आसपास के जिलों के किसान और कारीगर थे जो गाँवों में काम नहीं ढूंढ पाते थे। 1911 में, बॉम्बे की सूती मिलों में 50% से अधिक श्रमिक पड़ोसी जिले रत्नागिरी से आए थे।
उद्योगपतियों ने भर्ती के लिए एक जॉबर (Jobber) (एक पुराना, भरोसेमंद कार्यकर्ता) को नियुक्त किया। जॉबर अपने गाँव के लोगों को लाता, उन्हें नौकरी का आश्वासन देता, और शहर में बसने में मदद करता। समय के साथ, जॉबर एक शक्तिशाली और प्रभावशाली व्यक्ति बन गया, जो अक्सर पैसे और उपहारों की मांग करता और श्रमिकों के जीवन को नियंत्रित करता।
- उद्योगों का भौगोलिक संकेंद्रण: भारत में उद्योग कुछ विशेष क्षेत्रों में केंद्रित थे। सूती कपड़ा उद्योग बॉम्बे और अहमदाबाद में केंद्रित था, क्योंकि ये क्षेत्र कपास उत्पादक क्षेत्रों के करीब थे और बंदरगाहों तक आसान पहुँच थी। जूट उद्योग बंगाल में हुगली नदी के किनारे केंद्रित था, क्योंकि जूट की खेती वहीं होती थी।
- प्रबंधकीय पदानुक्रम और नस्लीय भेदभाव: भारतीय कारखानों में, शीर्ष प्रबंधन और तकनीकी पद लगभग हमेशा यूरोपीय लोगों के लिए आरक्षित थे, जबकि भारतीय केवल अधीनस्थ पदों पर ही काम कर सकते थे। यह नस्लीय भेदभाव औपनिवेशिक औद्योगिक संरचना का एक प्रमुख हिस्सा था।
- प्रारंभिक भारतीय उद्यम: जमशेदजी टाटा ने 1907 में जमशेदपुर में भारत की पहली बड़ी लौह और इस्पात कंपनी, टिस्को (TISCO – Tata Iron and Steel Company) की स्थापना की, जो भारतीय औद्योगीकरण में एक मील का पत्थर था। इसका उत्पादन 1912 में शुरू हुआ।
5. औद्योगिक विकास की विशिष्टताएँ
प्रारंभिक भारतीय सूती मिलों ने मैनचेस्टर से सीधे प्रतिस्पर्धा करने से परहेज किया। उन्होंने मुख्य रूप से मोटे सूती धागे का उत्पादन किया, जिसका उपयोग या तो भारतीय हथकरघा बुनकर करते थे या चीन को निर्यात किया जाता था।
5.4 लघु उद्योगों की प्रधानता
कारखाना उद्योग के विकास के बावजूद, 20वीं सदी में भी औद्योगिक कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा छोटी कार्यशालाओं और घरेलू इकाइयों में काम करता था।
कारखानों से प्रतिस्पर्धा के बावजूद, हथकरघा क्षेत्र का उत्पादन 20वीं सदी में वास्तव में बढ़ा। यह कई कारणों से संभव हुआ:
- प्रौद्योगिकी अपनाना: 1941 तक, 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाइंग शटल जैसी नई तकनीकें अपनाई गईं, जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ी।
- विशिष्ट बाजार: मिलें बनारसी या बालूचरी साड़ियों जैसी विशेष बुनाई की नकल नहीं कर सकती थीं। महीन किस्मों का उत्पादन करने वाले बुनकरों की बाजार में मांग बनी रही।
6. वस्तुओं के लिए बाज़ार
जब नए उत्पाद बनाए जाते हैं, तो लोगों को उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करना होता है। इसके लिए विज्ञापन (Advertisements) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- फ्लाइंग शटल (Fly Shuttle): यह 1733 में जॉन के द्वारा आविष्कृत एक बुनाई उपकरण था। यह बुनकर को धागे को एक तरफ से दूसरी तरफ फेंकने के लिए रस्सियों और पुलियों का उपयोग करने की अनुमति देता था, जिससे बुनाई बहुत तेज हो जाती थी और व्यापक कपड़ा बनाना संभव हो जाता था। भारत में त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर जैसे क्षेत्रों में इसका प्रसार 20वीं सदी में हुआ।
- भारत में औद्योगीकरण का प्रभाव: औद्योगीकरण ने स्लम पद्धति को जन्म दिया, जहाँ मजदूर शहरों में अस्वास्थ्यकर और भीड़भाड़ वाली बस्तियों में रहते थे। इसने एक नए श्रमिक वर्ग को भी जन्म दिया, जिसने धीरे-धीरे अपने अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू किया।
- प्रारंभिक श्रमिक कानून: श्रमिकों की दयनीय स्थिति के जवाब में, ब्रिटिश सरकार ने कुछ कानून पारित किए। पहला फैक्ट्री एक्ट 1881 में पारित किया गया, जिसमें 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के काम करने पर रोक लगाई गई और 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए काम के घंटे तय किए गए।
- श्रमिक आंदोलन का उदय: 31 अक्टूबर, 1920 को अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई, जिसके पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। यह भारत में संगठित श्रमिक आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक है।

