कक्षा 11वीं इतिहास नोट्स: अध्याय 04 – तीन वर्ग (The Three Orders) – CBSE/RBSE/NCERT/RSCERT

कक्षा 11वीं इतिहास नोट्स: अध्याय 04 – तीन वर्ग (The Three Orders) – CBSE/RBSE/NCERT/RSCERT
अध्याय 6 – तीन वर्ग

अध्याय 6 – तीन वर्ग

बदलती परंपराएं: एक वैश्विक संदर्भ

नौवीं शताब्दी तक, एशिया में बड़े साम्राज्य स्थापित हो चुके थे, जिनमें से कुछ खानाबदोश थे और कुछ व्यापारिक नेटवर्क पर केंद्रित थे। इसके विपरीत, पश्चिमी यूरोप में शहरी केंद्र छोटे थे। रोमन साम्राज्य के विघटन के बाद, जर्मनिक जनजातियों ने अपने राज्य स्थापित किए, जिससे एक नई राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का उदय हुआ। नौवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, पश्चिमी यूरोप ने आधुनिक काल की नींव रखी, जिसमें वैज्ञानिक ज्ञान, सरकार के नए संगठन और तकनीकी सुधार शामिल थे।

1. सामंतवाद (Feudalism) का परिचय

परिभाषा और अवधि: यूरोपीय इतिहास में पाँचवीं से पंद्रहवीं शताब्दी की अवधि को मध्यकाल कहा जाता है। सामंतवाद (Feudalism) इस काल में प्रचलित आर्थिक, कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक संबंधों का वर्णन करता है जो भूमि के स्वामित्व और व्यक्तिगत निष्ठा पर आधारित थे।

शब्द की उत्पत्ति और क्षेत्र: यह शब्द जर्मन मूल के शब्द ‘फ्यूड’ (feud) से बना है, जिसका अर्थ है ‘भूमि का एक टुकड़ा’। इस प्रकार का समाज मध्यकालीन फ्रांस में विकसित हुआ, और बाद में इंग्लैंड व दक्षिणी इटली में भी फैला।

विद्वान कार्य: सामंतवाद पर काम करने वाले सबसे पहले विद्वानों में से एक मार्क ब्लॉक (Marc Bloch) थे, जो एनाल्स स्कूल (Annales School) के संस्थापक थे। उनके कार्य, फ्यूडल सोसायटी (Feudal Society) में, 900 से 1300 के बीच फ्रांसीसी समाज के सामाजिक संबंधों, पदानुक्रम, भूमि प्रबंधन और लोकप्रिय संस्कृति का विस्तृत वर्णन है।

प्रारंभिक यूरोपीय साम्राज्य:

पश्चिम में रोमन साम्राज्य के विघटन (पाँचवीं शताब्दी ईस्वी तक) के बाद, जर्मन लोगों ने अपने राज्यों का गठन किया। गॉल (Gaul), जो एक रोमन प्रांत था, को फ्रैंक (Franks) नामक जर्मन जनजाति द्वारा ‘फ्रांस’ नाम दिया गया।

प्रारंभिक फ्रांस की प्रमुख तिथियाँ
  • 481: क्लोविस (Clovis) फ्रैंक्स का राजा बना।
  • 496: क्लोविस और फ्रैंक्स ने ईसाई धर्म (Christianity) स्वीकार कर लिया, जिससे उन्हें रोमन चर्च का समर्थन मिला।
  • 751: पेपिन (Pepin) ने एक राजवंश (कैरोलिंगियन) की स्थापना की।
  • 800: पोप लियो तृतीय ने पेपिन के पुत्र शार्लमेन (Charlemagne) को पवित्र रोमन सम्राट (Holy Roman Emperor) का ताज पहनाया, जिसने रोमन साम्राज्य की विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
  • 1066: नॉर्मंडी के ड्यूक विलियम ने हेस्टिंग्स की लड़ाई में एंग्लो-सैक्सन को हराकर इंग्लैंड पर विजय प्राप्त की और वहां सामंती व्यवस्था लागू की।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • सामंतवाद की जड़ें: सामंतवाद का विकास रोमन साम्राज्य की संरक्षण (Patronage) प्रथा और जर्मनिक जनजातियों की निष्ठा (Comitatus) की परंपरा के मिश्रण से हुआ। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद, वाइकिंग्स, मग्यार और मुसलमानों के हमलों ने एक अराजक स्थिति पैदा कर दी। सुरक्षा के लिए, छोटे किसान और भूमिहीन लोग शक्तिशाली स्थानीय लॉर्ड्स (अभिजात वर्ग) की शरण में चले गए, जिन्होंने उन्हें सुरक्षा के बदले में अपनी भूमि पर काम करने के लिए मजबूर किया।
  • शार्लमेन का साम्राज्य और उसका विघटन: शार्लमेन ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद उसके पोतों के बीच हुए गृहयुद्ध के कारण 843 में वर्दन की संधि के तहत साम्राज्य तीन भागों में विभाजित हो गया। इस विखंडन ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया और स्थानीय लॉर्ड्स को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर दिया, जिससे सामंतवाद को मजबूती मिली।

2. तीन वर्गों की परिभाषा

फ्रांसीसी पादरियों ने समाज को तीन “वर्गों” या सामाजिक श्रेणियों में विभाजित होने की अवधारणा दी: जो प्रार्थना करते थे (पादरी), जो युद्ध करते थे (अभिजात वर्ग), और जो श्रम करते थे (कृषक)। यह विभाजन ईश्वर द्वारा निर्धारित माना जाता था। बारहवीं सदी की एक बिशप हिल्डेगार्ड वॉन बिंगन ने तर्क दिया कि ईश्वर ने लोगों को बिना किसी भेद के बनाया है, इसलिए उनमें कोई सच्ची समानता नहीं है।

द्वितीय वर्ग: अभिजात वर्ग (Nobility)

वसलता/जागीरदारी (Vassalage): राजा और अभिजात वर्ग ‘वसलता’ नामक प्रथा से जुड़े थे, जो जर्मनिक प्रथा से ली गई थी। एक अभिजात व्यक्ति (वसल) अपने सीनियर (seigneur/स्वामी) के प्रति निष्ठा की शपथ लेता था और बदले में एक फ़ीफ़ (fief) (भूमि का एक टुकड़ा/जागीर) प्राप्त करता था। फ़ीफ़ के प्रतीक के रूप में उसे एक लिखित चार्टर, एक छड़ी या मिट्टी का एक ढेला दिया जाता था।

विशेषाधिकार: अभिजात वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त थे। उनके पास अपनी संपत्ति पर पूर्ण नियंत्रण, अपने काश्तकारों पर न्यायिक शक्ति, और अपना सिक्का ढालने का अधिकार होता था। वे ‘सामंती सैन्य दल’ (feudal levies) नामक सेना भी जुटा सकते थे।

द मैनर जागीर (The Manorial Estate): स्वामी (लॉर्ड) अपने मैनर-हाउस में रहता था और कई गाँवों पर नियंत्रण रखता था। जागीर में खेत, चरागाह, जंगल, लोहार, बढ़ई और एक चर्च शामिल होते थे, जिससे यह लगभग आत्मनिर्भर इकाई बन जाती थी। तेरहवीं शताब्दी तक, लॉर्ड्स की सुरक्षा और शक्ति के प्रतीक के रूप में बड़े-बड़े महल (castles) बनाए जाने लगे।

शूरवीर (Knights): नौवीं शताब्दी से लगातार स्थानीय युद्धों के कारण शूरवीरों का एक नया वर्ग पेशेवर सैनिकों के रूप में उभरा। एक शूरवीर को सैन्य सहायता के बदले में उसके स्वामी से एक फ़ीफ़ (अक्सर 1,000 से 2,000 एकड़) प्राप्त होता था, जिसे ‘नाइट्स-फ़ी’ कहा जाता था।

प्रथम वर्ग: पादरी वर्ग (Clergy)

चर्च का प्राधिकार: रोम में पोप के नेतृत्व वाला कैथोलिक चर्च पश्चिमी ईसाई जगत का केंद्र था। चर्च के अपने कानून थे, वह भूमि का स्वामी था, और कर लगाता था। यह एकमात्र संस्था थी जो साक्षरता और शिक्षा प्रदान करती थी।

कर और स्थिति: चर्च किसानों से टाइट/टायथ (tithe) नामक कर लेता था, जो उपज का दसवाँ हिस्सा होता था। बिशप ‘धार्मिक अभिजात वर्ग’ थे और भव्य महलों में रहते थे। पादरी विवाह नहीं कर सकते थे।

मठवाद (Monasticism): अत्यंत धार्मिक लोग भिक्षु (monks) और नन (nuns) बन जाते थे और मठों (monasteries) या एबी (abbeys) में एकांत जीवन व्यतीत करते थे। दो प्रसिद्ध मठ 529 में इटली में सेंट बेनेडिक्ट द्वारा और 910 में बरगंडी में क्लूनी में स्थापित किए गए थे। 13वीं शताब्दी में, फ्रायर्स (friars) नामक भिक्षुओं का एक नया समूह उभरा, जो मठों में रहने के बजाय घूम-घूम कर उपदेश देते थे और दान पर जीते थे।

तृतीय वर्ग: कृषक वर्ग (Peasants)

स्वतंत्र कृषक (Free Peasants): ये स्वामी के काश्तकार के रूप में अपनी जोत रखते थे। उन्हें सैन्य सेवा (वर्ष में 40 दिन) और अवैतनिक श्रम सेवाएँ (अक्सर सप्ताह में तीन दिन) देनी पड़ती थीं। वे राजा को टैले (taille) नामक एक प्रत्यक्ष कर भी चुकाते थे।

सर्फ/भूदास (Serfs): ये स्वामी की भूमि की खेती करते थे और उन्हें कोई मज़दूरी नहीं मिलती थी। वे भूमि से बंधे होते थे और स्वामी की अनुमति के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे। स्वामी का उनकी चक्की, भट्ठी और वाइन-प्रेस पर एकाधिकार होता था।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • वसलता की औपचारिक संविदा: यह एक संविदात्मक व्यवस्था थी जो स्वामी और उसके वसल के बीच स्थापित होती थी। इसमें होमज (श्रद्धा) की रस्म होती थी, जिसमें वसल स्वामी का ‘आदमी’ बनने की शपथ लेता था। इसके बाद निष्ठा शपथ (फ़ील्टी) ली जाती थी।
  • चर्च और समाज: चर्च ने कैलेंडर को भी प्रभावित किया। क्रिसमस (25 दिसंबर) ने एक पुराने पूर्व-रोमन त्योहार की जगह ले ली, और ईस्टर ईसा मसीह के सूली पर चढ़ने और पुनरुत्थान का प्रतीक बन गया। गाँव के लोग स्थानीय ‘पैरिश’ चर्च में एकत्रित होते थे, और तीर्थयात्रा एक महत्वपूर्ण धार्मिक गतिविधि थी।
  • भूदासों की स्थिति में लचीलापन: भूदासों को भूमि से स्वतंत्र रूप से बेचा नहीं जा सकता था; वे भूमि से बंधे थे। समय के साथ, कुछ भूदास मुक्ति (Manumission) के माध्यम से अपनी स्वतंत्रता खरीद सकते थे, जिसका अर्थ है कि भूदासता एक पूर्ण और अपरिवर्तनीय गुलामी नहीं थी।

3. सामाजिक और आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले कारक

पर्यावरणीय परिवर्तन:

पाँचवीं से दसवीं शताब्दी तक यूरोप में তীব্র ठंडा जलवायु काल रहा, जिससे कृषि सीमित थी। ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास, यूरोप में एक गर्म चरण (मध्यकालीन गर्म अवधि) शुरू हुआ, जिसके परिणामस्वरूप लंबे समय तक फसल उगाने का मौसम मिला और फसल की पैदावार में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई।

तकनीकी परिवर्तन:

ग्यारहवीं शताब्दी तक कृषि प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण सुधार हुए। लकड़ी के हल की जगह लोहे की भारी नोक वाले सांचेदार हल (Mouldboard Plough) का उपयोग शुरू हुआ। बैलों के स्थान पर घोड़ों का उपयोग बढ़ा, जो तेज और अधिक कुशल थे।

तीन-क्षेत्रीय फसल चक्रण प्रणाली: इस प्रणाली में, भूमि को तीन भागों में विभाजित किया जाता था। एक में सर्दियों में गेहूं, दूसरे में वसंत में मटर, सेम या जौ जैसी फसलें उगाई जाती थीं, और तीसरे को परती (खाली) छोड़ दिया जाता था। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी और उत्पादन में लगभग 50% की वृद्धि हुई।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • कृषि क्रांति के घटक: इन परिवर्तनों को सामूहिक रूप से ‘मध्यकालीन कृषि क्रांति’ कहा जाता है। इसके मुख्य घटक थे: (1) भारी हल का उपयोग, (2) घोड़े का कॉलर और नाल का उपयोग, जिससे घोड़ों को हल खींचने में आसानी हुई, (3) तीन-क्षेत्रीय फसल चक्रण प्रणाली, और (4) जलचक्की और पवनचक्की का बढ़ता उपयोग।
  • फलियों का महत्व: तीन-क्षेत्रीय प्रणाली में फलियां (मटर, बीन्स) उगाना एक महत्वपूर्ण नवाचार था। वे न केवल लोगों के आहार में प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत थीं, बल्कि वे नाइट्रोजन-फिक्सिंग फसलें भी थीं, जो मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक रूप से पुनर्स्थापित करती थीं।

4. एक चौथा वर्ग? नए नगर और नगरवासी

कृषि में विस्तार के साथ, जनसंख्या, व्यापार और नगरों में भी वृद्धि हुई। 1000 और 1300 ईस्वी के बीच, यूरोप की जनसंख्या लगभग 42 मिलियन से बढ़कर 73 मिलियन हो गई।

नगरों का विकास: कृषि अधिशेष के कारण, लोग अब अन्य गतिविधियों, जैसे शिल्प और व्यापार, में विशेषज्ञता हासिल कर सकते थे। इससे स्थायी बाजार केंद्रों और नगरों का विकास हुआ। एक प्रसिद्ध कहावत थी, ‘नगर की हवा स्वतंत्र करती है’ (‘Town air makes free’), क्योंकि यदि कोई सर्फ़ एक वर्ष और एक दिन तक अपने स्वामी से छिपकर किसी नगर में रह लेता, तो वह एक स्वतंत्र व्यक्ति बन जाता।

गिल्ड और कैथेड्रल-नगर: नगरों में आर्थिक संगठन गिल्ड पर आधारित था, जो शिल्पकारों और व्यापारियों का एक संघ था। वे गुणवत्ता और मूल्य को नियंत्रित करते थे। बारहवीं शताब्दी से फ्रांस में कैथेड्रल नामक बड़े चर्च बनाए गए, जो तीर्थयात्रा के केंद्र बन गए और उनके चारों ओर नगर विकसित हुए।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • मुद्रा अर्थव्यवस्था का उदय: नगरों और व्यापार के विकास से वस्तु विनिमय की जगह मुद्रा (सिक्कों) का उपयोग बढ़ा। लॉर्ड्स अब लगान नकदी में लेने लगे, जिससे सामंती व्यवस्था के व्यक्तिगत बंधन कमजोर पड़ने लगे।
  • मध्यम वर्ग (बुर्जुआ) का उत्थान: व्यापारियों, बैंकरों, वकीलों और कुशल कारीगरों के रूप में एक नया शहरी मध्यम वर्ग (Bourgeoisie) उभरा। यह वर्ग भूमि पर नहीं, बल्कि व्यापार और धन पर आधारित था, और इसने धीरे-धीरे सामंती अभिजात वर्ग को चुनौती देना शुरू कर दिया।
  • विश्वविद्यालयों की स्थापना: नगरों के विकास के साथ, यूरोप में पहले विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई (जैसे बोलोग्ना, पेरिस, ऑक्सफोर्ड), जो शिक्षा और बौद्धिक जीवन के नए केंद्र बने।

5. चौदहवीं सदी का संकट

चौदहवीं शताब्दी की शुरुआत तक, यूरोप का आर्थिक विस्तार धीमा पड़ गया।

संकट के कारण
  • जलवायु परिवर्तन: 13वीं सदी के अंत तक, उत्तरी यूरोप में गर्म ग्रीष्मकाल समाप्त हो गया और ठंडी, नम गर्मियाँ शुरू हो गईं, जिससे फसलें खराब होने लगीं।
  • अकाल: 1315 और 1317 के बीच यूरोप में भीषण अकाल पड़े, जिसके बाद बड़े पैमाने पर पशुओं की मौतें हुईं।
  • ब्लैक डेथ (1347–50): यह ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी थी जो मध्य एशिया से आने वाले जहाजों के साथ यूरोप पहुँची। इसने यूरोप की आबादी का 20% से 40% तक सफाया कर दिया।

आर्थिक और सामाजिक परिणाम: जनसंख्या में भारी कमी से श्रम की भारी कमी हो गई, जिससे मजदूरों की मजदूरी बढ़ गई (इंग्लैंड में 250% तक)। स्वामियों ने पुराने श्रम-बंधनों को फिर से लागू करने की कोशिश की, जिसका किसानों ने कड़ा विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप फ्रांस (1358), फ़्लैंडर्स (1323), और इंग्लैंड (1381) में हिंसक किसान विद्रोह हुए।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • ब्लैक डेथ का फैलाव: यह महामारी येरसिनिया पेस्टिस नामक जीवाणु के कारण हुई, जो चूहों पर रहने वाले पिस्सुओं द्वारा फैलता था। यह व्यापार मार्गों के माध्यम से तेजी से पूरे यूरोप में फैल गया, क्योंकि उस समय स्वच्छता की स्थिति बहुत खराब थी।
  • सांस्कृतिक प्रभाव: ब्लैक डेथ का यूरोपीय समाज और संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। कला और साहित्य में मृत्यु और पीड़ा का चित्रण आम हो गया (जैसे डांस मैकाब्रे – Dance Macabre)। कुछ लोगों ने इसे ईश्वर का प्रकोप माना, जबकि अन्य ने पारंपरिक धार्मिक विश्वासों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया, जिससे चर्च का अधिकार कमजोर हुआ।
  • सौ वर्षीय युद्ध (1337-1453): इस संकट के साथ-साथ, इंग्लैंड और फ्रांस के बीच एक लंबा युद्ध भी चला, जिसने दोनों देशों के संसाधनों को और कम कर दिया और सामाजिक तनाव को बढ़ाया।

6. राजनीतिक परिवर्तन: नई राजशाही (New Monarchy)

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में, यूरोपीय शासकों ने अपनी सैन्य और वित्तीय शक्ति को मजबूत किया। फ्रांस में लुई XI, ऑस्ट्रिया में मैक्सिमिलियन, इंग्लैंड में हेनरी VII और स्पेन में इसाबेल और फर्डिनेंड जैसे शासकों को ‘नए राजा’ कहा गया।

शक्ति का केंद्रीकरण: इन शासकों ने सामंती व्यवस्था को कमजोर कर दिया और निरंकुश शासकों (absolute rulers) के रूप में खुद को स्थापित किया। उन्होंने पेशेवर, प्रशिक्षित नौकरशाही और एक स्थायी स्थायी सेना (standing army) का निर्माण किया।

वित्तपोषण और नियंत्रण: राजाओं ने अपनी सेनाओं को वित्तपोषित करने के लिए सीधे लोगों पर कर लगाना शुरू कर दिया, जिससे सामंती सैन्य दलों पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई। अभिजात वर्ग ने विरोध किया, लेकिन राजाओं ने धीरे-धीरे उनकी शक्ति को कुचल दिया।

फ्रांस बनाम इंग्लैंड: संसद का विकास

फ्रांस: फ्रांसीसी राजाओं ने अपनी परामर्शदात्री सभा, एस्टेट्स-जनरल (Estates-General), को बुलाए बिना ही शासन किया। यह 1614 में अंतिम बार आयोजित की गई और 1789 की क्रांति तक दोबारा नहीं बुलाई गई।

इंग्लैंड: इंग्लैंड में, राजा कोई भी कर लगाने से पहले संसद (Parliament) से परामर्श करने के लिए बाध्य था। संसद में हाउस ऑफ लॉर्ड्स (पादरी और अभिजात वर्ग) और हाउस ऑफ कॉमन्स (आम लोग) शामिल थे। जब राजा चार्ल्स प्रथम ने संसद के बिना 11 साल तक शासन करने की कोशिश की, तो एक गृहयुद्ध छिड़ गया और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण जानकारी
  • राष्ट्र-राज्य का उदय: ‘नए राजाओं’ द्वारा शक्ति के इस केंद्रीकरण ने आधुनिक राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की नींव रखी। उन्होंने सामंती निष्ठाओं को एक केंद्रीकृत शाही अधिकार और राष्ट्रीय पहचान से प्रतिस्थापित करने की कोशिश की।
  • सैन्य क्रांति: बारूद और तोपखाने के विकास ने युद्ध की प्रकृति को बदल दिया। पत्थर के महल अब तोपों के सामने कमजोर थे, जिससे सामंती लॉर्ड्स की सैन्य शक्ति कम हो गई। केवल राजा ही तोपखाने से लैस एक आधुनिक सेना को बनाए रखने का खर्च उठा सकते थे।
  • पुनर्जागरण और सुधार: इसी अवधि में पुनर्जागरण (Renaissance) और धर्म सुधार (Reformation) जैसे बौद्धिक और धार्मिक आंदोलनों ने भी सामंती विश्वदृष्टि को चुनौती दी और आधुनिक युग के विचारों की नींव रखी।

पुनरीक्षण नोट्स

I. बदलती परंपराएँ: वैश्विक संदर्भ और प्रारंभिक यूरोप (9वीं-17वीं शताब्दी)

वैश्विक साम्राज्य और नेटवर्क: नौवीं शताब्दी तक, एशिया में बड़े साम्राज्य थे (जैसे, मैसेडोनियन, रोमन, अरब, चीनी), जिनमें से कुछ खानाबदोश थे और कुछ व्यापारिक नेटवर्क पर केंद्रित थे। मंगोल साम्राज्य महाद्वीपीय था। सांस्कृतिक मुठभेड़ ऐतिहासिक विकास के लिए महत्वपूर्ण थे। पश्चिमी यूरोप में, रोमन साम्राज्य के विघटन के बाद स्थापित राज्यों ने जनजातियों की प्रशासनिक आवश्यकताओं को अपनाया। पश्चिमी यूरोप में शहरी केंद्र पूर्व की तुलना में छोटे थे। नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच, पश्चिमी यूरोपीय ग्रामीण इलाकों में प्रमुख विकास हुए।

यूरोप में परंपरा और परिवर्तन: विश्व इतिहास में परंपराएं विभिन्न तरीकों से बदलीं। नौवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, पश्चिमी यूरोप में आधुनिक समय का विकास हुआ, जिसमें प्रयोग पर आधारित वैज्ञानिक ज्ञान, धार्मिक विश्वास में बदलाव, सरकार के संगठन पर विचार, सिविल सेवाओं, संसदों और नए कानूनी कोड का निर्माण शामिल था। इन परिवर्तनों में उद्योग और कृषि में प्रयुक्त प्रौद्योगिकी में सुधार भी शामिल थे।

II. तीन वर्ग और सामंतवाद

सामंतवाद का परिचय: मध्यकाल (5वीं-15वीं शताब्दी) यूरोप में आर्थिक, कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक संबंधों का वर्णन करता है। यह ‘फ्यूड’ (भूमि का टुकड़ा) शब्द से लिया गया है और लॉर्ड्स तथा किसानों के बीच कृषि उत्पादन संबंधों पर आधारित था। इसकी उत्पत्ति फ्रैंकिश राजा शार्लमेन (742-814) के शासनकाल में हुई।

समाज के तीन वर्ग: फ्रांसीसी पादरियों ने समाज को तीन वर्गों में विभाजित किया: ईसाई पादरी (प्रथम वर्ग), भूमिधारक अभिजात वर्ग (द्वितीय वर्ग), और किसान (तृतीय वर्ग)। बारहवीं सदी की एक बिशप, एबेस हिल्डेगार्ड ऑफ बिngen, ने तर्क दिया कि ईश्वर ने लोगों को बिना किसी भेद के बनाया है, इसलिए उनमें कोई सच्ची समानता नहीं है।

द्वितीय वर्ग (अभिजात वर्ग): ‘वसलता’ की प्रथा के माध्यम से राजा से जुड़े थे। उन्हें एक फ़ीफ़ (भूमि) के बदले में निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती थी। seigneur (लॉर्ड) का अर्थ ‘रोटी प्रदान करने वाला’ है। वसल को भूमि के प्रतीक के रूप में एक चार्टर, छड़ी या मिट्टी का ढेला मिलता था। लॉर्ड के पास सेना जुटाने (‘सामंती सैन्य दल’), न्याय करने और सिक्के ढालने जैसे विशेषाधिकार थे। शूरवीर (Knights) दसवीं शताब्दी से एक पेशेवर योद्धा वर्ग के रूप में उभरे।

मैनर जागीर: लॉर्ड की जागीर, जिसमें खेत, चरागाह, जंगल, गाँव और एक चर्च शामिल थे, लगभग आत्मनिर्भर थी। तेरहवीं शताब्दी तक, महल (castles) राजनीतिक और सैन्य शक्ति के केंद्र बन गए।

तृतीय वर्ग (किसान): इसमें स्वतंत्र किसान और सर्फ़ (भूदास) शामिल थे। स्वतंत्र किसानों को सैन्य सेवा (वर्ष में 40 दिन) और श्रम सेवाएँ देनी पड़ती थीं। वे ‘टैले’ नामक प्रत्यक्ष कर भी चुकाते थे। सर्फ़ भूमि से बंधे थे, उन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती थी और वे स्वामी की अनुमति के बिना जागीर नहीं छोड़ सकते थे।

III. चर्च (प्रथम वर्ग)

चर्च का अधिकार: पोप के नेतृत्व वाला कैथोलिक चर्च एक प्रमुख भूमिधारक और राजनीतिक शक्ति था। यह ‘टाइट’ (उपज का दसवां हिस्सा) नामक कर वसूलता था। सर्फ़ और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को पादरी बनने से प्रतिबंधित किया गया था।

भिक्षु और मठ: भिक्षु मठों में रहते थे और प्रार्थना, अध्ययन और शारीरिक श्रम में अपना जीवन समर्पित करते थे। ‘मठ’ शब्द ग्रीक शब्द ‘मोनोस’ (अकेला) से बना है। 13वीं शताब्दी में, फ्रायर्स (friars) घूम-घूम कर उपदेश देते थे और दान पर जीते थे। दो प्रसिद्ध मठ सेंट बेनेडिक्ट (इटली, 529) और क्लूनी (बरगंडी, 910) में स्थापित किए गए थे।

चर्च और समाज: ईसाई त्योहारों ने पुराने त्योहारों की जगह ले ली, और तीर्थयात्रा एक महत्वपूर्ण गतिविधि बन गई।

IV. सामाजिक और आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले कारक (11वीं-14वीं शताब्दी)

कृषि परिवर्तन: ग्यारहवीं शताब्दी में गर्म जलवायु चरण, लोहे के हल, घोड़े की नाल और तीन-क्षेत्रीय फसल चक्रण प्रणाली ने कृषि उत्पादकता में वृद्धि की।

नगरों का विकास (चौथा वर्ग): कृषि विस्तार से जनसंख्या (1200 में 62 मिलियन से 1300 में 73 मिलियन), व्यापार और नगरों में वृद्धि हुई। ‘नगर की हवा स्वतंत्र करती है’ कहावत लोकप्रिय हुई। गिल्ड ने आर्थिक संगठन को नियंत्रित किया। ग्यारहवीं शताब्दी से सामंतवाद का आधार कमजोर होने लगा और आर्थिक लेनदेन में धन का उपयोग बढ़ने लगा।

चौदहवीं सदी का संकट: 1300 के बाद जनसंख्या वृद्धि रुक गई। महान अकाल (1315-17) और ब्लैक डेथ (1347-50) ने यूरोप की आबादी को 73 मिलियन से घटाकर 45 मिलियन कर दिया। इस तबाही ने आर्थिक संकट और सामाजिक अव्यवस्था पैदा की।

सामाजिक अशांति: श्रम की कमी के कारण मजदूरी 250% तक बढ़ गई। लॉर्ड्स ने जब पुरानी श्रम-सेवाओं को फिर से लागू करने की कोशिश की, तो फ़्लैंडर्स (1323), फ्रांस (1358), और इंग्लैंड (1381) में किसान विद्रोह हुए।

V. राजनीतिक परिवर्तन और नई राजशाही

नई राजशाही का उदय: 15वीं और 16वीं शताब्दी में, फ्रांस में लुई XI, ऑस्ट्रिया में मैक्सिमिलियन I, इंग्लैंड में हेनरी VII और स्पेन में इसाबेल और फर्डिनेंड जैसे शक्तिशाली ‘नए राजाओं’ ने अपनी सैन्य और वित्तीय शक्ति को मजबूत किया। उन्होंने स्थायी सेनाओं और नौकरशाही का निर्माण किया।

फ्रांस बनाम इंग्लैंड: फ्रांस में, राजा ने एस्टेट्स-जनरल (1614 के बाद 1789 तक नहीं बुलाई गई) के बिना शासन किया। इंग्लैंड में, राजा को कर लगाने के लिए संसद से परामर्श करना पड़ता था, जो हाउस ऑफ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ कॉमन्स में विभाजित थी। चार्ल्स प्रथम ने जब संसद के बिना शासन करने की कोशिश की, तो गृहयुद्ध हुआ और उन्हें फांसी दे दी गई।

VI. यूरोप, पुनर्जागरण और वैश्विक संपर्क (लगभग 1300-1700)

पुनर्जागरण और खोज: चौदहवीं शताब्दी से, विशेष रूप से इतालवी नगरों में, मानवतावाद और दुनिया की खोज (पुनर्जागरण) को बढ़ावा मिला। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक, स्पेनियों और पुर्तगालियों ने भारत और अमेरिका के लिए समुद्री मार्गों की खोज की (कोलंबस 1492, वास्को डी गामा 1498, मैगलन 1519)।

प्रमुख खोजें और संपर्क: यूरोपीय मुठभेड़ अक्सर शोषणकारी थे। पुर्तगालियों ने हथियारों के बल पर व्यापार एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश की। अमेरिका में, यूरोपीय बीमारियों ने स्थानीय आबादी के 90% से अधिक को खत्म कर दिया।

VII. समयरेखा के मुख्य बिंदु (लगभग 1300 से 1700)

यूरोप और अफ्रीका
  • 1325–50: यूरोप में प्लेग (ब्लैक डेथ) का प्रसार (1347–50)।
  • 1338–1461: इंग्लैंड और फ्रांस के बीच सौ वर्षीय युद्ध।
  • 1381: इंग्लैंड में किसान विद्रोह।
  • 1475–1500: यूरोप में पहली मुद्रित पुस्तक; लियोनार्डो दा विंची (1452–1519)।
  • 1517: मार्टिन लूथर द्वारा कैथोलिक चर्च में सुधार का प्रयास।
  • 1543: कोपरनिकस द्वारा सौर मंडल का सिद्धांत (सूर्य-केंद्रित)।
  • 1550–75: विलियम शेक्सपियर (1564–1616), नाटककार, इंग्लैंड में।
  • 1625–50: विलियम हार्वे ने प्रदर्शित किया कि रक्त हृदय द्वारा शरीर में पंप किया जाता है (1628)।
  • 1425–50: पुर्तगालियों ने दास व्यापार शुरू किया (1442)।
एशिया और दक्षिण एशिया
  • 1325–50: विजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336)।
  • 1350–75: चीन में मिंग राजवंश (1368 से)।
  • 1450–75: ओटोमन तुर्कों ने कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्जा किया (1453)।
  • 1475–1500: वास्को डी गामा भारत पहुंचा (1498)।
  • 1525–50: बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई (1526) के बाद उत्तर भारत में मुगल नियंत्रण स्थापित किया।
  • 1550–75: अकबर ने मुगल शासन को मजबूत किया (1556-1605)।
  • 1600–25: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (1600); जापान में तोकुगावा शोगुनेट की स्थापना (1603)।
  • 1625–50: ताजमहल का निर्माण (1632-53)।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया/प्रशांत द्वीप समूह
  • 1300–25: मेक्सिको में एज़्टेक राजधानी टेनोच्टिट्लान (1325), मंदिरों का निर्माण, सिंचाई और लेखा प्रणाली (क्विपु) का विकास।
  • 1450–75: इंका ने पेरू पर नियंत्रण स्थापित किया (1465)।
  • 1475–1500: कोलंबस वेस्ट इंडीज पहुंचा (1492)।
  • 1500–25: स्पेन द्वारा मेक्सिको पर विजय (1521)।
  • 1600–25: इंग्लैंड ने उत्तरी अमेरिका में अपनी पहली कॉलोनियां स्थापित कीं (1607); पहले गुलाम पश्चिम अफ्रीका से वर्जीनिया लाए गए (1619)।
  • 1625–50: डचों ने न्यू एम्स्टर्डम (बाद में न्यूयॉर्क) की स्थापना की (1626)।

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